

रुद्रपुर/भाषा ही हमारी अस्मिता की आत्मा है, और जो अपनी भाषा को बचा लेता है, वह अपनी पहचान को भी अमर कर देता है।” — यही संदेश समेटे तीन दिवसीय कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन का समापन गरिमामय और भावनात्मक माहौल में हुआ। यह सम्मेलन न केवल कुमाऊँ की मिट्टी, बोली और संस्कृति का उत्सव था, बल्कि यह अपने भीतर एक आंदोलन की चेतना भी समेटे हुए था — मातृभाषा को सम्मान और शिक्षा प्रणाली में उसका अधिकार दिलाने की दिशा में एक ठोस प्रयास।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
समापन सत्र की अध्यक्षता पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर डी.एस. बिष्ट ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सम्मेलन को “उत्तराखंड की आत्मा के पुनर्जागरण” की संज्ञा दी। बिष्ट ने कहा — “कुमाऊँनी भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि यह पीढ़ियों के अनुभव, लोकज्ञान और भावनाओं की थाती है। जब तक हम अपनी भाषा को जीवित रखेंगे, हमारी संस्कृति, हमारी पहचान जीवित रहेगी।”
उन्होंने सम्मेलन की सफलता के लिए आयोजक मंडल, भाषा प्रेमियों, लेखकों, छात्रों और आम जनता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मेलन उत्तराखंड में भाषा संरक्षण के एक नए अध्याय की शुरुआत है।
न्यायपालिका, कार्यपालिका और शिक्षाविदों की साझी उपस्थिति?इस सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता रही — समाज के हर वर्ग की सहभागिता। न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका तक के प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश प्रफुल्ल चंद्र पंत, जो कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष एभी रह चुके हैं, ने अपने संबोधन में राज्य आंदोलन के दिनों को याद करते हुए कहा कि “उत्तराखंड राज्य के निर्माण में जिस भावनात्मक एकता की भूमिका थी, वह एकता हमारी मातृभाषाओं — कुमाऊँनी और गढ़वाली — में निहित है।”उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब सरकार को इन भाषाओं को केवल सांस्कृतिक विषय न मानकर, प्रशासनिक और शैक्षणिक स्तर पर मान्यता देनी चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि कुमाऊँनी भाषा का व्याकरणिक ढांचा और मानक शब्दावली (Standard Vocabulary) तैयार करने की दिशा में एक संयुक्त समिति का गठन हो, ताकि भाषा को राजकीय पाठ्यक्रम में शामिल करने की प्रक्रिया तेज हो सके।
भाषा सम्मेलन में व्याकरण और अनुसंधान पर गहन विमर्श?समापन दिवस पर प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में सम्मेलन के तीनों दिनों के विमर्श का सार भी रखा गया। कई विद्वानों ने कुमाऊँनी भाषा के व्याकरणिक स्वरूप, उपभाषाओं और ध्वन्यात्मक विशेषताओं पर शोधपत्र प्रस्तुत किए।
प्रो. बिष्ट ने अपने भाषण में कहा कि कुमाऊँनी भाषा की व्याकरणिक संरचना संस्कृत और अपभ्रंश से विकसित हुई है, और इसमें प्रकृति, पशु-पक्षियों, ऋतु, खेती-बाड़ी और जीवन दर्शन से जुड़ी सैकड़ों मूल शब्द आज भी प्रयोग में हैं। उन्होंने कहा कि यदि भाषा की शिक्षा को प्राथमिक कक्षाओं में शामिल किया जाए, तो बच्चों में स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक संवेदना दोनों को सुदृढ़ किया जा सकता है।
सम्मेलन में ‘कुमाऊँनी व्याकरण कोश’ और ‘लोककथाओं का संकलन’ जैसे दो प्रमुख प्रस्ताव पारित हुए, जिन्हें उत्तराखंड भाषा संस्थान, देहरादून, को सौंपा जाएगा।
सोशल मीडिया से लेकर गांव तक पहुँची भाषा की लहर?इस सम्मेलन की चर्चा केवल सभागार तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर “#KumaoniLanguageConference” ट्रेंड करता रहा। सैकड़ों युवाओं ने अपने पोस्ट और वीडियोज़ के माध्यम से कुमाऊँनी बोलियों, कहावतों और लोकगीतों को साझा किया।
फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ‘भाषा बचाओ, पहचान बचाओ’ जैसे अभियानों ने नई पीढ़ी में उत्साह जगाया। सम्मेलन में उपस्थित कई युवाओं ने कहा कि अब वे अपनी रोजमर्रा की बातचीत में कुमाऊँनी भाषा को प्राथमिकता देंगे।
सरकार से अपेक्षाएँ और भविष्य की राह?सम्मेलन के समापन पर पारित प्रस्तावों में राज्य सरकार से कुछ प्रमुख मांगें रखी गईं —
- कुमाऊँनी भाषा को राज्य की द्वितीय राजभाषा घोषित किया जाए।
- कक्षा 1 से 5 तक के स्तर पर कुमाऊँनी भाषा को वैकल्पिक विषय के रूप में जोड़ा जाए।
- भाषा शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाएं।
- उत्तराखंड भाषा संस्थान को अधिक बजट और संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
- कुमाऊँनी फिल्म, नाटक, संगीत और साहित्य को बढ़ावा देने के लिए वार्षिक राज्य पुरस्कार की घोषणा की जाए।
प्रो. बिष्ट ने अपने संबोधन में कहा — “यदि सरकार यह समझे कि भाषा किसी क्षेत्रीयता का नहीं, बल्कि एकता का प्रतीक है, तो कुमाऊँनी और गढ़वाली दोनों को समान रूप से संरक्षण मिलेगा।”
भाषा से संस्कृति और संस्कृति से स्वाभिमान?सम्मेलन के समापन पर वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि भाषा ही संस्कृति की नींव है।
लोकगीतकारों ने कहा कि “जो अपनी मातृभाषा भूल जाता है, वह अपने पुरखों की आवाज़ खो देता है।”
कुमाऊँनी भाषा में लिखे साहित्य को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की योजना भी बनाई गई, ताकि यह भाषा तकनीकी युग में भी प्रतिस्पर्धा कर सके।

डॉ. किशोर चंदोला, वसुंधरा नर्सिंग होम एवं होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज के निदेशक, कार्यक्रम में बतौर मीडिया सलाहकार विशेष रूप से उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में पर्यावरण संरक्षण को मानव जीवन से जुड़ा सर्वोच्च दायित्व बताया। डॉ. चंदोला ने कहा कि प्रकृति के संतुलन के बिना स्वास्थ्य की कल्पना संभव नहीं है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को वृक्षारोपण, जल-संरक्षण और स्वच्छता के प्रति गंभीरता से योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ-साथ प्रकृति आधारित जीवनशैली ही दीर्घकालिक स्वास्थ्य का आधार है। कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों, छात्रों और समाजसेवियों को उन्होंने पर्यावरण रक्षक बनने का संकल्प दिलाया। अपने सरल लेकिन प्रभावशाली संदेश के माध्यम से डॉ. के.सी. चंदोला ने जनमानस को यह अहसास कराया कि “स्वस्थ समाज का आधार स्वस्थ पर्यावरण है” — और इसके संरक्षण में हर नागरिक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

१७वां राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन – रुद्रपुर में भाषा-संरक्षण का एक ऐतिहासिक संगम,रुद्रपुर। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), रुद्रपुर में 7 से 9 नवंबर 2025 तक आयोजित 17वें राष्ट्रीय कुमाऊनी भाषा सम्मेलन ने कुमाऊनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण का सशक्त संदेश दिया। कार्यक्रम के संरक्षक डॉ. हयात सिंह रावत (सदस्य, उत्तराखंड भाषा संस्थान व संस्थापक संपादक पहरू मासिक पत्रिका) के मार्गदर्शन में यह सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। मुख्य संयोजक डॉ. बी.एस. बिष्ट (पूर्व कुलपति, पंतनगर विश्वविद्यालय) और सह संयोजक डॉ. ललित मोहन उप्रेती (पूर्व निदेशक, स्वास्थ्य विभाग) ने समूचे आयोजन का संयोजन किया।राष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन 2025 में रुद्रपुर के नेत्रदान संगठन को उत्कृष्ट सामाजिक कार्य हेतु सम्मानित किया गया। संगठन के निदेशक डॉ. एल.एम. उप्रेती, डॉ. दीपक भट्ट, हेम पंत और विक्की पाठक को समाज सेवा में योगदान के लिए मंच पर सम्मान मिला। डॉ. उप्रेती ने अपने संबोधन में नेत्रदान और अंगदान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “अंगदान से कोई मरता नहीं, बल्कि किसी को नई रोशनी मिलती है।” सम्मेलन में कुमाऊँनी भाषा संरक्षण के साथ मानवीय सेवा का यह संगम समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन गया।
प्रचार-प्रसार समिति में डॉ. के.सी. चंदोला (प्रबंध निदेशक, चंदोला होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज), पत्रकार अवतार सिंह बिष्ट, महेश चंद्र पंत, ललित मोहन पांडे, संदीप यादव (टीवी 100) एवं रजत बिष्ट (अध्यक्ष, छात्र संघ, भगत सिंह महाविद्यालय) की भूमिका उल्लेखनीय रही। आवास व्यवस्था का प्रबंधन योगेश वर्मा व हेम पंत ने किया।
प्रबंध एवं स्वागत समिति में लक्ष्मी चंद्र पंत, अजंता बिष्ट (प्रधानाचार्य, डायट), भरत लाल शाह, गोपाल सिंह पटवाल, दिवाकर पांडे, दिनेश बम (शैल सांस्कृतिक समिति), गिरीश चंद्र जोशी (पर्वतीय समाज समिति), रविंद्र आर्य, डा. नवीन उपाध्याय, गजेंद्र सिंह बिष्ट (पर्वतीय उत्थान समिति), आर.पी. शर्मा (पूर्व अपर पुलिस अधीक्षक), आनंद सिंह धामी, के.एस. नेगी, योगेश वर्मा, शंभु दत्त पांडे (शैलेय), पी.सी. शर्मा, दयाल चंद्र पांडे, बी.डी. भट्ट, रजत सिंह बिष्ट, चेतन भट्ट (छात्र संघ), आलोक मिश्रा (डायट), नारायण सिंह खोलिया, हरीश चंद्र उपाध्याय, योगेश बिष्ट, डा. विमला बिष्ट, खड़क सिंह कार्की व त्रिलोचन पनेरू ने मिलकर कार्यक्रम को उत्कृष्ट ढंग से संगठित किया।
यह सम्मेलन कुमाऊनी भाषा को राजभाषा का दर्जा दिलाने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हुआ।
अंत में—“हम कुमाऊँनी बोलने में शर्म नहीं, गर्व महसूस करें”?सम्मेलन के अंतिम क्षणों में जब सभागार में सामूहिक रूप से यह पंक्तियाँ गूंजने लगीं —
“जो बोली म्यर दद्यू बोली, जो बोली म्यर माई,
तिनकै बिना सूनी लागे, धरती और परछाई।”
तो हर आंख में भावनाओं की नमी थी।
डी.एस. बिष्ट ने कहा — “अब वक्त आ गया है जब हम अपने बच्चों को अंग्रेज़ी या हिंदी बोलने पर ही नहीं, बल्कि कुमाऊँनी बोलने पर भी प्रोत्साहित करें। मातृभाषा को सम्मान देना ही सच्चा उत्तराखंडी स्वाभिमान है।”
सम्मेलन के साथ यह संकल्प लिया गया कि 2026 में होने वाला अगला कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन और भी व्यापक स्तर पर आयोजित किया जाएगा — जिसमें शोधपत्र, कविता, लोककला, और डिजिटल नवाचार को जोड़कर भाषा को आधुनिक युग से जोड़ा जाएगा।
कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि यह “मातृभाषा से मातृभूमि के जुड़ाव” का सशक्त प्रतीक बन गया। इसने यह सिद्ध कर दिया




