वन भूमि अतिक्रमण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, उत्तराखंड सरकार को फटकारगोडावण संरक्षण के निर्देशों का उत्तराखंड पर भी पड़ेगा असर

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नई दिल्ली / देहरादून।सुप्रीम कोर्ट ने वन भूमि पर अतिक्रमण के मामलों में उत्तराखंड सरकार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि राज्य सरकार और उसके अधिकारी “मूकदर्शक” बने रहे। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसकी आंखों के सामने वन भूमि पर अतिक्रमण होता रहा, लेकिन सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इसी के चलते अदालत को स्वयं संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज करना पड़ा।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की अवकाशकालीन पीठ ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को निर्देश दिए कि वे एक तथ्य अन्वेषण जांच समिति गठित करें और शीघ्र ही रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। पीठ ने कहा कि यह बेहद चौंकाने वाला है कि वन भूमि जैसे संवेदनशील विषय पर सरकार की निष्क्रियता सामने आई है।
निर्माण पर पूर्ण रोक, तीसरे पक्ष के अधिकार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि जब तक अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक:
वन भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं होगा
किसी तीसरे पक्ष के अधिकार नहीं बनाए जाएंगे
खाली पड़ी जमीनों पर वन विभाग तत्काल कब्जा लेगा
केवल पहले से बने आवासीय मकानों को फिलहाल छूट दी जाएगी
यह मामला उत्तराखंड में वन भूमि के बड़े हिस्से पर कथित अवैध कब्जों को लेकर अनीता कांडवाल द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। अदालत ने अगली सुनवाई छुट्टियों के बाद तय की है।
गोडावण संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश
इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) और लेसर फ्लोरिकन जैसे विलुप्तप्राय पक्षियों के संरक्षण को लेकर भी ऐतिहासिक निर्देश जारी किए हैं।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने राजस्थान और गुजरात में कुल 14,753 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में:
बड़े सोलर पार्क
पवन ऊर्जा परियोजनाएं
हाईटेंशन ओवरहेड बिजली लाइनें
पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं, ताकि इन पक्षियों का प्राकृतिक आवास सुरक्षित रह सके।
उत्तराखंड पर क्या पड़ेगा असर?
भले ही गोडावण का मुख्य आवास राजस्थान और गुजरात में है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ये निर्देश उत्तराखंड के लिए भी नजीर (precedent) साबित होंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार:
उत्तराखंड में प्रस्तावित वन क्षेत्रों से सटे सोलर और पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट्स अब और अधिक न्यायिक निगरानी में आएंगे
हाईटेंशन बिजली लाइनों, सड़क चौड़ीकरण और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से पुनर्विचार करना पड़ेगा
हाथी, बाघ, हिम तेंदुआ, मोनाल जैसे संरक्षित वन्यजीवों के आवासों पर किसी भी विकास परियोजना से पहले पर्यावरणीय मंजूरी और अदालत की कसौटी और कड़ी होगी
विशेष रूप से तराई-भाबर क्षेत्र, कॉर्बेट परिक्षेत्र, राजाजी नेशनल पार्क और पर्वतीय वन क्षेत्रों में चल रही परियोजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट के इन आदेशों का सीधा प्रभाव पड़ेगा।
स्पष्ट संदेश
सुप्रीम कोर्ट के इन आदेशों ने साफ कर दिया है कि:
विकास की आड़ में वन भूमि और जैव विविधता से कोई समझौता नहीं होगा।
अब उत्तराखंड सरकार के लिए यह महज चेतावनी नहीं, बल्कि कानूनी जवाबदेही का सवाल बन चुका है।
वन भूमि अतिक्रमण और पर्यावरणीय लापरवाही पर आने वाले दिनों में और सख्त कदम तय माने जा रहे हैं।
✍️ — अवतार सिंह बिष्ट
(उत्तराखंड विशेष संवाददाता)


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