

डॉ. सुशीला तिवारी राजकीय चिकित्सालय, हल्द्वानी—कुमाऊँ की स्वास्थ्य-रीढ़—आज इलाज से अधिक अव्यवस्था का प्रतीक बनता जा रहा है। दूरस्थ पहाड़ी अंचलों से आने वाले गरीब, सीधे-साधे मरीजों के लिए यह अस्पताल आख़िरी उम्मीद है, लेकिन इसी उम्मीद के दरवाज़े पर उन्हें सबसे पहले जिस चीज़ से टकराना पड़ता है, वह है—सूचना का अभाव, दिशाहीनता और प्रशासनिक असंवेदनशीलता। यह संपादकीय बीते एक साल में सामने आई उन्हीं विफलताओं का लेखा-जोखा है, जो सीधे-सीधे स्वास्थ्य मंत्री और अस्पताल के शीर्ष प्रशासन की जवाबदेही तय करती हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
मरीजों की भीड़, व्यवस्था की कमी
प्रतिदिन लगभग 2500 मरीज ओपीडी में और औसतन 500 मरीज भर्ती—यह कोई छोटी संख्या नहीं। इसके साथ स्वामी राम कैंसर इंस्टीट्यूट और टीबी एवं श्वास रोग विभाग जैसे सुपर-स्पेशियलिटी यूनिट्स भी इसी परिसर में संचालित हैं। इतनी भारी आवाजाही के बीच यदि एक सुव्यवस्थित, 24×7 मरीज सहायता केन्द्र (May I Help You Counter) नहीं है, तो इसे महज़ चूक नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता कहा जाएगा।
हकीकत यह है कि बुजुर्ग, महिलाएँ, दिव्यांग और पहाड़ी क्षेत्रों से आए मरीज घंटों इधर-उधर भटकते रहते हैं—कौन-सी ओपीडी, कहाँ पंजीकरण, किस ब्लॉक में भर्ती, किस मंज़िल पर जांच—इन बुनियादी सवालों के जवाब किसी के पास नहीं। क्या यह वही स्वास्थ्य व्यवस्था है, जिसके दावों के पुलिंदे हर बजट भाषण में खोले जाते हैं?




