

इनमें रेस्टोरेंट, सड़क किनारे के ढाबे, कैटरर्स, बेकरी और क्लाउड किचन शामिल हैं। इनमें से कई व्यवसायों के लिए कुकिंग गैस सिर्फ एक और इनपुट लागत नहीं है। यह तो खुद उनका व्यवसाय ही है। दिल्ली में अब कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 3,071.50 रुपये हो गई है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
चेन रिएक्शन का खतरा
इस झटके को और भी ज्यादा असरदार बनाने वाली बात है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत के छोटे व्यवसाय पहले से ही कम उपभोक्ता मांग, कच्चे माल की बढ़ी हुई कीमतों और अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कम होते मुनाफे से जूझ रहे थे। अब कमर्शियल ईंधन की कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी से चेन रिएक्शन शुरू होने का खतरा है। यह इस तरह होगा:
- खाने की कीमतें बढ़ेंगी।
- ग्राहकों की आवाजाही कम होगी।
- आय पर दबाव पड़ेगा।
- कर्मचारियों की छंटनी होगी।
- फिर स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में महंगाई का नया दबाव पैदा होगा।
हालांकि, पेट्रोल और डीजल की कीमतें जस की तस बनी हुई हैं। इसलिए कागज पर यह कदम आम परिवारों को महंगाई के एक और झटके से बचाता है। वैसे संकेत दिए गए हैं कि निकट भविष्य में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी होने के आसार हैं।
उद्योग जगत ने पहले ही उस चिंता को जाहिर करना शुरू कर दिया था जो भारत के खाद्य व्यवसाय इकोसिस्टम में फैल गई थी। खासकर उन छोटे ऑपरेटरों के बीच जिनके पास लंबे समय तक चलने वाले लागत के झटकों या सप्लाई में रुकावटों को झेलने के लिए बहुत कम वित्तीय सहारा था।
उद्योग के जानकारों की चेतावनी
स्पेशलिटी रेस्टोरेंट्स के संस्थापक अंजन चटर्जी ने इस क्षेत्र में बढ़ रहे तनाव की गंभीर तस्वीर पेश की। टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) से बात करते हुए चटर्जी ने पहले कहा था कि रेस्टोरेंट मालिक ‘दर-दर भटक रहे थे’ क्योंकि सप्लाई और परिचालन लागत को लेकर अनिश्चितता गहरी होती जा रही थी। उन्होंने चेतावनी दी कि इसका असर सिर्फ व्यवसायों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तेजी से उस चेन के सबसे निचले पायदान पर मौजूद कर्मचारियों तक भी पहुंचेगा।
चटर्जी ने कहा, ‘अगर रेस्टोरेंट और खाने-पीने की जगहें अपना व्यवसाय नहीं कर पाएंगी तो सबसे पहले मार उन लोगों पर पड़ेगी जो सबसे निचले पायदान पर हैं।’
इस दबाव को सबसे ज्यादा छोटे रेस्टोरेंट, सड़क किनारे के ढाबे, कैटरर्स और क्लाउड किचन ने महसूस किया है। ये आम तौर पर बहुत कम मुनाफे पर काम करते हैं। रोजाना के कैश फ्लो पर बहुत ज्यादा निर्भर रहते हैं। शुक्रवार की बढ़ोतरी उनकी कमाई और परिचालन पर और भी ज्यादा दबाव डालेगी।
चटर्जी ने बताया कि जैसे-जैसे हालात बिगड़ते गए ऐसे कई ऑपरेटर पहले से ही अपने काम का दायरा कम कर रहे थे या अस्थायी रूप से बंद कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘हालांकि हमें उम्मीद है कि सप्लाई जल्द ही बेहतर हो जाएगी। लेकिन, अभी हमें नहीं पता कि आगे क्या होगा। जमीनी स्तर पर, खासकर स्थानीय और सड़क किनारे खाने-पीने की जगहों के लिए, हालात बहुत ज्यादा खराब हैं।’
फैल रही है परेशानी
यह परेशानी केटरिंग इंडस्ट्री में भी फैल रही है। वहां ऑपरेटरों का कहना है कि सामान मिलने में हो रही देरी से उन पर आर्थिक बोझ और बढ़ रहा है। फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया केटरर्स के किरित बुधदेव ने मार्च में टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि सप्लायर अब समय पर डिलीवरी की गारंटी नहीं दे पा रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘सप्लायर हमसे 15 दिन इंतजार करने को कह रहे हैं। जमीनी हालात बहुत मुश्किल हैं। हमारे कई सदस्यों के लिए तो ये और भी खराब होते जा रहे हैं।’
क्या पीएनजी है विकल्प?
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत सरकार किसी तरह कमर्शियल जगहों को ज्यादा पीएनजी कनेक्शन लेने के लिए बढ़ावा दे रही है? कमर्शियल एलपीजी की कीमतों में हाल में हुई भारी बढ़ोतरी से उस बदलाव की रफ्तार भी तेज हो सकती है। इसके लिए नीति-निर्माता और शहर के गैस डिस्ट्रीब्यूटर युद्ध शुरू होने के बाद से ही जोर दे रहे हैं। यानी कारोबारों को सिलेंडरों से हटाकर पाइप वाली नेचुरल गैस (पीएनजी) की ओर ले जाना।
दिल्ली समेत कई शहरी केंद्रों में अधिकारियों ने कमर्शियल और इंडस्ट्रियल संस्थानों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि जहां भी पाइपलाइन इन्फ्रास्ट्रक्चर हो, वहां वे कमर्शियल एलपीजी सप्लाई पाने के लिए पीएनजी कनेक्शन के लिए आवेदन करें। इस नीति का मकसद घनी आबादी वाले इलाकों में सिलेंडरों पर निर्भरता कम करना है। साथ ही शहरों में साफ-सुथरे ईंधन के नेटवर्क का विस्तार करना है।
रेस्टोरेंट, होटल, कैंटीन, अस्पताल और रिटेल संस्थानों के लिए पीएनजी ऐसा विकल्प है जो इस्तेमाल में ज्यादा आसान है। इसकी कीमतें भी शायद कम ऊपर-नीचे होती हैं। एलपीजी सिलेंडरों के उलट जिन्हें बार-बार भरवाना पड़ता है, एक जगह से दूसरी जगह ले जाना पड़ता है और जहां-तहां रखना पड़ता है, पीएनजी पाइपलाइनों के जरिए 24 घंटे लगातार ईंधन की सप्लाई देती है। कारोबारों को अचानक होने वाली कमी, सामान रखने की दिक्कतों या किसी रुकावट के समय बैकअप सिलेंडर रखने की चिंता करने की जरूरत नहीं होती।
आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को भी अब कारोबारों के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। पीएनजी सिस्टम से कम जगह वाली कमर्शियल रसोई में सामान रखने की जगह बच जाती है। भारी सिलेंडरों को उठाने-रखने से जुड़े जोखिम भी कम हो जाते हैं।
इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि पीएनजी को ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। कारण है कि यह हवा से हल्की होती है। लीक होने पर तेजी से हवा में घुल जाती है। जबकि इसके उलट एलपीजी बंद जगहों में जमा हो सकती है।
बदलाव नहीं है आसान
हालांकि, यह बदलाव बिल्कुल भी आसान नहीं है। हजारों छोटे खाने के ठिकाने और अनौपचारिक कारोबार अब भी बड़े पैमाने पर कमर्शियल सिलेंडरों पर निर्भर हैं। बड़े शहरी इलाकों के बाहर पीएनजी कनेक्टिविटी अब भी अधूरी है। कई छोटे कारोबारियों के लिए बुनियादी ढांचा बदलना या मंजूरी लेना अपने आप में एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकता है। खासकर सड़क किनारे की दुकानों और छोटी कैटरिंग यूनिट्स के लिए। यह ऐसे समय में हो रहा है जब पहले से ही काम करने की लागत तेजी से बढ़ रही है।
अब दो ऐसे सवाल हैं जिन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। हो सकता है कि आखिर में दोनों का नतीजा एक ही निकले। कारोबार खुद को बचाने के लिए क्या करेंगे और ग्राहकों पर कीमतों का दबाव कैसे पड़ेगा?
अगर ध्यान से सोचा जाए तो इसका जवाब ज्यादा मुश्किल नहीं है। कारोबार कीमतें बढ़ा देंगे। ग्राहकों को ज्यादा पैसे देने पड़ेंगे। आखिर में महंगाई और बढ़ जाएगी।
कुछ कारोबार खाने की मात्रा कम कर देंगे। दूसरे चुपचाप कीमतें 5 या 10 रुपये बढ़ा देंगे।
शुरू होने जाएगी महंगाई की कहानी
और यहीं से महंगाई की कहानी और गहरी हो जाती है। जब खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ती हैं तो ग्राहकों का व्यवहार तेजी से बदलता है। जैसा कि सरकार ने अप्रैल की ‘आर्थिक समीक्षा’ में कहा था। इसके मुताबिक, ‘अर्थव्यवस्था में सप्लाई में कमी साफ तौर पर दिख रही है।’ समीक्षा में यह भी कहा गया है कि ऊंची कीमतों, बढ़ती महंगाई और आर्थिक गतिविधियों की धीमी रफ्तार को देखते हुए मांग में कमी आना गंभीर चिंता का विषय है।
रेस्तरां पर निर्भर रहने वाले छोटे सप्लायर, जैसे सब्जी बेचने वाले, दूध बेचने वाले, ट्रांसपोर्टर, पैकेजिंग यूनिट्स और स्थानीय थोक विक्रेता देखने लगते हैं कि उनके ऑर्डर कम हो रहे हैं। हॉस्पिटैलिटी और खाने-पीने की सेवाओं से जुड़े छोटे और मंझोले कारोबार (SMEs) को कैश फ्लो में सुस्ती का सामना करना पड़ सकता है। अनौपचारिक कामगार काम की शिफ्ट कम होने और कमाई घटने के खतरे का सामना करने लगते हैं। इनमें से कई को रोजाना या हफ्ते के हिसाब से मजदूरी मिलती है।
गरीबों पर होगा सबसे ज्यादा असर
अर्थशास्त्री अक्सर महंगाई को एक ऐसे टैक्स के तौर पर बताते हैं जिसका सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ता है। लेकिन, भारत में कमर्शियल ईंधन की महंगाई एक और खतरा पैदा करती है। यह उस अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर देती है जो देश में रोजगार के लिए एक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ (झटके को सहने वाले) का काम करती है।
पिछले एक साल की रिपोर्टों में भारत की ग्रोथ स्टोरी के पीछे छिपे एक परेशान करने वाले पैटर्न को बार-बार उजागर किया गया है। औपचारिक क्षेत्र और बड़ी कंपनियां तो लगातार आगे बढ़ रही हैं, जबकि छोटे कारोबार मुनाफे और मांग में कमी से जूझ रहे हैं।
बड़े रेस्तरां चेन अपने बड़े पैमाने और कीमतों पर नियंत्रण की ताकत के दम पर शायद इस मुश्किल दौर से निकल जाएं। लेकिन, छोटे कारोबारी ऐसा नहीं कर सकते। किसी मोहल्ले में चलने वाले छोटे ढाबे या सड़क किनारे की दुकान के पास लागत को बारीकी से संभालने की सुविधा नहीं होती। उनका टिके रहना रोजाना होने वाली नकद कमाई पर निर्भर करता है। इसीलिए कीमतों में मौजूदा बढ़ोतरी का खतरा सिर्फ रेस्तरां तक सीमित नहीं है। यह एक बड़े आर्थिक संकट का रूप ले सकता है।
विकास के मॉडल पर पड़ेगी चोट
भारत का विकास मॉडल अब भी लाखों कम और मध्यम आय वाले ग्राहकों पर बहुत ज्यादा निर्भर है। ये अक्सर छोटी-छोटी रकम खर्च करते रहते हैं। रोजमर्रा के खाने-पीने और सेवाओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से लोग अपनी मर्जी से होने वाले खर्च में कटौती करने लगते हैं। समय के साथ, इससे स्थानीय मांग का चक्र कमजोर पड़ सकता है। यह पूरे शहरी और अर्ध-शहरी भारत में छोटे व्यवसायों को सहारा देता है।
अभी के लिए परिवारों को घरेलू एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी से बचाने के सरकार के फैसले से लोगों का तत्काल गुस्सा टल गया है। लेकिन, आर्थिक तकलीफ शायद किसी दूसरे रास्ते से आ रही हो। कमर्शियल रसोई, छोटे उद्यमों और अनौपचारिक क्षेत्र के जरिए। ये ऐसे क्षेत्र हैं जो शायद ही कभी सुर्खियों में आते हैं। लेकिन, भारत के शहरों को चलाते रहते हैं।
मैक्रोइकोनॉमिक डेटा में एक सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी शायद बहुत बड़ी बात न लगे। लेकिन जमीनी स्तर पर यह चुपचाप उन झटकों में से एक बन सकती है जो हर जगह फैल जाते हैं।




