

उत्तराखंड हिन्दू धर्म में ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि संचार, सत्य और ज्ञान के उस शाश्वत प्रवाह का प्रतीक है, जिसकी नींव स्वयं देवर्षि नारद ने रखी थी। 2026 में मनाई जा रही नारद जयंती हमें केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखती, बल्कि यह आधुनिक पत्रकारिता के चरित्र और कर्तव्य पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
नारद जी को अक्सर “पहला पत्रकार” कहा जाता है। वे त्रिलोक में विचरण करते हुए देवताओं, ऋषियों और असुरों तक सूचनाएं पहुंचाते थे। लेकिन यह केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं था—यह सत्य, संतुलन और धर्म के पक्ष में खड़ा होने का साहस भी था। आज जब पत्रकारिता TRP, क्लिकबेट और राजनीतिक दबावों के बीच उलझती जा रही है, तब नारद जी का आदर्श और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।
पूजा और आध्यात्मिकता: एक पवित्र आरंभ
इस वर्ष नारद जयंती पर ब्रह्म मुहूर्त से लेकर अभिजीत मुहूर्त तक पूजा के विशेष संयोग बन रहे हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु की आराधना के साथ नारद जी का पूजन करने से भक्ति, ज्ञान और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। तुलसी पत्र अर्पित करना, मंत्र जाप करना और दान-पुण्य करना इस दिन के प्रमुख अंग हैं।
लेकिन सवाल यह है—क्या केवल विधि-विधान से नारद जी प्रसन्न होंगे, या उनके आदर्शों को जीवन में उतारना भी आवश्यक है?
कलयुग में ‘नारद’ बनाम ‘फोटोस्टेट पत्रकार’
आज के दौर में पत्रकारिता का एक बड़ा वर्ग “सूचना वाहक” से अधिक “सूचना व्यापारी” बनता जा रहा है। प्रेस रिलीज़ को ज्यों का त्यों छाप देना, सत्ता के इशारों पर खबरों का रुख बदल देना—यह प्रवृत्ति उस नारदीय परंपरा के विपरीत है, जिसमें सत्य सर्वोपरि था।
देवर्षि नारद कभी भी किसी एक पक्ष के नहीं थे—वे केवल धर्म और सत्य के पक्षधर थे। वे जहां अन्याय देखते, वहां संवाद के माध्यम से समाधान की दिशा बनाते। आज का पत्रकार अगर वास्तव में “नारद” बनना चाहता है, तो उसे—
सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखना होगा
समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बनना होगा
सूचना को सत्यता और जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करना होगा
भरत मुनि की भूमिका और पत्रकारिता का रंगमंच
यहां एक और दृष्टिकोण उभरता है—पत्रकार केवल सूचना देने वाला नहीं, बल्कि समाज का “नाट्य निर्देशक” भी है। जैसे भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र के माध्यम से समाज को दिशा दी, वैसे ही पत्रकारिता आज के युग का जीवंत रंगमंच है।
हर खबर एक “अंक” है, हर घटना एक “दृश्य” और हर रिपोर्टर एक “सूत्रधार”। लेकिन अंतर यह है कि यहां अभिनय नहीं, बल्कि वास्तविकता प्रस्तुत करनी होती है। यदि पत्रकार इस मंच पर सत्य के बजाय भ्रम का नाटक करने लगे, तो समाज का पतन निश्चित है।
नारद बनने की चुनौती: पत्रकारिता का धर्म
कलयुग में “नारद” बनना आसान नहीं है। इसके लिए केवल ज्ञान नहीं, बल्कि तप, संयम और निष्पक्षता की आवश्यकता है।
आज का पत्रकार यदि वास्तव में नारद जी के मार्ग पर चलना चाहता है, तो उसे—
सूचना का संतुलन बनाए रखना होगा
नैतिकता को प्राथमिकता देनी होगी
जनहित को सर्वोपरि रखना होगा
और सबसे महत्वपूर्ण—स्वार्थ से ऊपर उठकर सत्य का साथ देना होगा: पूजा से आगे बढ़कर उप आचरण की आवश्यकता
नारद जयंती एक चेतना है—एक स्मरण है कि संचार का उद्देश्य सूचना देना समाज को जागरूक और जागृत करना है।
आज जब हम नारद जयंती पर दीप जलाते हैं, मंत्र जाप करते हैं, तो हमें यह भी संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने-अपने क्षेत्र में “नारद” बनने का प्रयास करेंगे—चाहे वह पत्रकारिता हो, समाज सेवा हो या व्यक्तिगत जीवन।
क्योंकि अंततः, सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है—और वही नारद जी की सबसे बड़ी शिक्षा।
संपादकीय: उत्तराखंड की पत्रकारिता में ‘नारद’ की जीवंत परंपरा,नारद जयंती के पावन अवसर पर आकाश आहूजा, अजय जोशी, पूरन रावत और रूपेश कुमार को हार्दिक शुभकामनाएं। आज जब पत्रकारिता अनेक दबावों और चुनौतियों के दौर से गुजर रही है, तब आप जैसे निर्भीक और जनसरोकारों से जुड़े पत्रकार वास्तव में देवर्षि नारद की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना केवल भौगोलिक गठन नहीं, बल्कि जनभावनाओं, संघर्ष और सच्चाई की आवाज़ को मंच देने का संकल्प था। आप सभी ने उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना को सुनकर और उसे समाज तक पहुंचाकर पत्रकारिता के उस धर्म को निभाया है, जो आज दुर्लभ होता जा रहा है।
आपका कार्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना है। यही सच्चे अर्थों में कलयुग के “नारद” हैं—जो सत्य, साहस और समर्पण के साथ जनहित की मशाल जलाए हुए हैं।




