

उत्तराखंड में गणतंत्र दिवस जैसे सर्वोच्च राष्ट्रीय पर्व से जुड़ा एक मामला केवल दो आईपीएस अधिकारियों की व्यक्तिगत लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक अनुशासन, संस्थागत संस्कृति और वर्दी की मर्यादा पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जिस दिन पूरा देश संविधान, लोकतंत्र और राष्ट्र के प्रति निष्ठा का सार्वजनिक प्रदर्शन करता है, उसी दिन यदि जिम्मेदारी के उच्चतम पदों पर बैठे अधिकारी औपचारिकताओं को बोझ समझें, तो यह चिंताजनक है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
गणतंत्र दिवस परेड में सेरेमोनियल यूनिफॉर्म पहनना या स्वयं कार्यक्रम में उपस्थित रहना कोई औपचारिक रस्म भर नहीं है। यह उस अनुशासन का प्रतीक है, जिसकी अपेक्षा पुलिस बल आम नागरिकों से करता है। हरिद्वार में तैनात आईपीएस जितेंद्र मेहरा द्वारा निर्धारित सेरेमोनियल यूनिफॉर्म के बजाय सामान्य ड्यूटी यूनिफॉर्म पहनना और देहरादून में तैनात आईपीएस कुश मिश्रा का कार्यक्रम में अनुपस्थित रहना, दोनों ही घटनाएं संदेश देती हैं कि नियम शायद केवल अधीनस्थों के लिए हैं।
यह सवाल स्वाभाविक है कि जब अनुशासन की सबसे बड़ी मिसाल बनने वाले अधिकारी ही प्रोटोकॉल को हल्के में लेने लगें, तो मैदान में खड़े जवानों से सख्ती और नियम पालन की उम्मीद किस आधार पर की जाए? वर्दी केवल अधिकार का प्रतीक नहीं होती, वह जिम्मेदारी और अनुकरण का भी प्रतीक होती है।
पुलिस मुख्यालय द्वारा मामले की जांच और आईजी मुख्यालय को जिम्मेदारी सौंपना एक जरूरी कदम है, लेकिन असली कसौटी जांच रिपोर्ट के बाद होने वाली कार्रवाई होगी। यदि यह प्रकरण भी केवल “स्पष्टीकरण लेकर फाइल बंद” करने तक सीमित रह गया, तो यह भविष्य में ऐसी लापरवाहियों को मौन स्वीकृति देने जैसा होगा।
गणतंत्र दिवस किसी सरकार या अधिकारी का निजी कार्यक्रम नहीं, बल्कि संविधान और राष्ट्र के प्रति सामूहिक सम्मान का दिन है। इस दिन की गरिमा से समझौता, अनजाने में ही सही, संस्थागत मूल्यों को कमजोर करता है। उत्तराखंड पुलिस जैसे अनुशासित बल से अपेक्षा है कि वह न केवल कानून लागू करे, बल्कि राष्ट्रीय प्रतीकों और पर्वों के प्रति आदर्श व्यवहार भी प्रस्तुत करे।




