रुद्रपुर के डीडी चौक क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण के लिए झाड़ी वाले बाबा मंदिर परिसर में खड़े विशाल पीपल के वृक्ष का कटान हो गया। सरकारी कागजों में यह शायद सड़क विस्तार की प्रक्रिया का एक हिस्सा भर हो, लेकिन रुद्रपुर के पुराने निवासियों के लिए यह केवल एक पेड़ का कटना नहीं है। यह शहर की स्मृतियों, आस्था, पर्यावरण और उस रुद्रपुर के एक हिस्से का खो जाना है, जिसे पुरानी पीढ़ी ने अपनी आंखों के सामने बनते-बढ़ते देखा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
उस पीपल के नीचे छोटा-सा मंदिर था। वहां से गुजरने वाला कोई व्यक्ति कुछ क्षण रुक जाता था। किसी ने वहां माथा टेका होगा, किसी ने मन की बात कही होगी, किसी ने गर्मी में उसकी छांव में बैठकर थकान मिटाई होगी और किसी ने शायद उस वृक्ष के नीचे बैठकर अपने जीवन के महत्वपूर्ण फैसले भी लिए होंगे।
पीपल केवल लकड़ी, पत्तियों और तने का नाम नहीं है। भारतीय परंपरा में पीपल को जीवन, प्राणवायु और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना गया है। गांवों और पुराने शहरों में पीपल के पेड़ के नीचे बैठना अपने आप में एक सामाजिक परंपरा रही है। वहां मंदिर भी होते थे, चौपाल भी होती थी और लोगों के सुख-दुख की बातचीत भी।
आज वही पीपल सड़क की चौड़ाई में बाधा बन गया।
सवाल यह नहीं है कि सड़क चौड़ी होनी चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या विकास की हर रेखा पेड़ काटकर ही खींची जाएगी?
क्या इंजीनियरिंग ऐसी नहीं हो सकती कि जहां संभव हो, पुराने वृक्षों को बचाकर सड़क का डिजाइन तैयार किया जाए?
क्या शहर के विकास की कीमत उसकी हरियाली और उसकी स्मृतियों से ही वसूली जाएगी?
पहाड़ से लेकर मैदान तक विकास के नाम पर पेड़ों का दोहन लगातार चिंता पैदा कर रहा है। सड़कें चाहिए, पुल चाहिए, उद्योग चाहिए, आवास चाहिए, लेकिन क्या हमें यह भी तय नहीं करना चाहिए कि विकास के साथ प्रकृति की कीमत कितनी होगी?
रुद्रपुर आज तेजी से फैलता हुआ औद्योगिक और कारोबारी शहर है। लेकिन विकास की इस दौड़ में एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है।
जहां सड़क के किनारे खड़ा एक पुराना पीपल विकास में बाधा बन जाता है, वहीं शहर की बेशकीमती जमीनों पर बड़े-बड़े निर्माण खड़े होते दिखाई देते हैं। जिन जमीनों को कभी सार्वजनिक उपयोग, जल संरक्षण या शहर के सामुदायिक हित से जोड़ा जाता था, उन पर कब्जे और उपयोग परिवर्तन के सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं।
तालाबों और जलस्रोतों की जमीन को लेकर भी गंभीर सवाल उठते रहे हैं। कहीं जमीन के स्वरूप बदलने के आरोप लगते हैं, कहीं बड़े रिसॉर्ट और मॉल खड़े होते हैं और कहीं शहर की बेशकीमती संपत्तियों के इस्तेमाल को लेकर जनता जवाब मांगती है।
तब सवाल और बड़ा हो जाता है—
क्या विकास का पैमाना सिर्फ यह है कि सड़क कितनी चौड़ी हुई और कितनी जमीन पर निर्माण हुआ?
अगर ऐसा है तो रुद्रपुर को स्मार्ट सिटी कहने से पहले यह भी देखना होगा कि शहर में पेड़ कितने बचे हैं, तालाब कितने बचे हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए खुली सांस लेने की जगह कितनी बची है।
रुद्रपुर के पुराने लोग शायद इस पीपल को सिर्फ पेड़ नहीं मानते थे। उनके लिए यह शहर के पुराने दिनों की पहचान था। आज जब वे उस जगह से गुजरेंगे तो उन्हें सड़क शायद कुछ ज्यादा चौड़ी दिखाई दे, लेकिन उस चौड़ी सड़क के किनारे एक खालीपन भी नजर आएगा।
वह खालीपन केवल जमीन का नहीं होगा।
वह उस छांव का होगा, जिसमें कभी कोई बुजुर्ग बैठा होगा।
वह उस मंदिर का होगा, जहां किसी ने दीप जलाया होगा।
वह उस पीपल की सरसराहट का होगा, जिसे सुनते हुए किसी ने सुबह की शुरुआत की होगी।
और वह उन यादों का होगा, जिन्हें किसी सरकारी नक्शे में दर्ज नहीं किया जा सकता।
विडंबना देखिए—हम विकास की परिभाषा में करोड़ों-अरबों रुपये के प्रोजेक्ट गिनते हैं, लेकिन एक सौ साल पुराने वृक्ष की कीमत तय करने में हमारे पास कोई पैमाना नहीं है।
एक पेड़ लगाने के लिए अभियान चलाया जाता है। पौधारोपण के फोटो खिंचते हैं। सोशल मीडिया पर पर्यावरण संरक्षण के संदेश चलते हैं। लेकिन जब वही पेड़ बड़ा होकर शहर की पहचान बन जाता है और किसी परियोजना के रास्ते में आ जाता है, तो उसकी कहानी अक्सर मशीन के सामने खत्म हो जाती है।
यह केवल रुद्रपुर का सवाल नहीं है।
यह उत्तराखंड के उस विकास मॉडल का सवाल है जिसमें पहाड़ों में सड़क और परियोजनाओं के नाम पर जंगलों पर दबाव बढ़ता है और मैदानों में शहरी विस्तार के नाम पर पुराने पेड़, तालाब और खुले स्थान सिकुड़ते जाते हैं।
सरकार और जनप्रतिनिधियों से सवाल होना चाहिए कि विकास के नाम पर पर्यावरण की कीमत तय करने का अधिकार आखिर किसके पास है?
जनता को सड़क भी चाहिए और पेड़ भी।
शहर को विकास भी चाहिए और तालाब भी।
नई इमारतें भी चाहिए और पुरानी छांव भी।
रुद्रपुर को स्मार्ट बनाने के नाम पर अगर उसकी आत्मा ही काट दी गई, तो फिर स्मार्ट सिटी किसके लिए होगी?
झाड़ी वाले बाबा मंदिर का वह पीपल अब नहीं है। उसकी जगह सड़क चौड़ी हो गई है। यातायात शायद बेहतर होगा। सफर कुछ आसान भी हो सकता है।
लेकिन रुद्रपुर के पुराने बाशिंदों से कोई पूछे कि उस पीपल की छांव की कीमत कितनी थी?
रुद्रपुर के डीडी चौक स्थित झाड़ी वाले बाबा मंदिर परिसर में खड़ा यह विशाल पीपल का पेड़ अब सड़क विस्तार के चलते इसे काट दिया गया। स्थानीय लोगों के अनुसार यह केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि लंबे समय से हिंदू आस्था और धार्मिक विश्वास का केंद्र रहा है। प्रत्येक शनिवार को बड़ी संख्या में हिंदू महिलाएं यहां पहुंचकर पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाती थीं और पूजा-अर्चना करती थीं। लोगों का कहना है कि इस पेड़ के नीचे श्रद्धा से मांगी गई कई मनोकामनाएं भी पूरी हुईं। पेड़ कटने के बाद स्थानीय श्रद्धालुओं में भावनात्मक पीड़ा और नाराजगी देखी जा रही है।
शायद उसका जवाब किसी सरकारी फाइल में नहीं मिलेगा।
वह जवाब उन आंखों में मिलेगा, जो अब वहां से गुजरते हुए अनायास उस जगह को तलाशेंगी जहां कभी एक विशाल पीपल खड़ा था।
विकास की सड़क आगे बढ़ गई है, लेकिन पीछे छूट गई है रुद्रपुर की एक जीवित स्मृति।
अब कम से कम सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे पुराने और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व वाले वृक्षों की कटाई अंतिम विकल्प हो, पहला नहीं। जहां वृक्ष हटाना अपरिहार्य हो, वहां उसके बदले केवल पौधे लगाने की औपचारिकता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक वृक्ष संरक्षण की ठोस नीति लागू हो।
क्योंकि पौधा लगाना आसान है।
लेकिन एक पीपल को सदियों की स्मृति बनने में सदियां लगती हैं।
