

रुद्रपुर का ट्रांजिट कैंप शनिवार रात राजनीति, सत्ता और पुलिस के बीच एक ऐसी जंग का मैदान बन गया जिसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर उत्तराखंड की राजनीति किस दिशा में बढ़ रही है। दर्जा राज्य मंत्री उत्तम दत्ता के पुत्र पर महिला से छेड़छाड़ और जबरन ले जाने जैसे गंभीर आरोप लगे, तो इसके जवाब में भाजपा कार्यकर्ताओं ने थाने को प्रदर्शनस्थल बना दिया। पुलिस पर दबाव, नेताओं की मौजूदगी, और अंततः “समझौते” के नाम पर मामला शांत कर देना—यह सब कुछ भारतीय लोकतंत्र और कानून-व्यवस्था के लिए गहरे सवाल खड़े करता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
मामला क्या था??विवेक नगर ट्रांजिट कैंप निवासी युवक ने आरोप लगाया कि उसकी मामी के मोबाइल पर लगातार कॉल कर उसे परेशान किया जा रहा था। फोन करने वाला कथित रूप से दर्जाधारी मंत्री का पुत्र था, जिसने महिला को चामुंडा मंदिर के पास बुलाकर एक घंटे के लिए 10 हजार रुपये देने की बात कही। आरोप के अनुसार, जब युवक अपनी मामी को लेकर वहां पहुँचा, तो बुलेट सवार युवक महिला को जबरन ले जाने लगे। विरोध करने पर युवक के साथ मारपीट की गई।
शोरगुल मचने पर स्थानीय लोग इकट्ठा हुए और कथित आरोपितों की पिटाई कर दी। यहीं से यह प्रकरण और उलझ गया। घायल युवक ने घटना की जानकारी अपने परिजनों को दी और देखते-देखते मामला दर्जाधारी मंत्री के दरबार तक पहुँच गया। भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं का दल-बल थाने में पहुँच गया।
थाने में शक्ति प्रदर्शन?थाने के भीतर जो हुआ, वह पुलिस-राजनीति के रिश्तों की सबसे कड़वी सच्चाई है। भाजपा कार्यकर्ताओं ने पुलिस से धक्का-मुक्की की, आरोप लगाया कि दर्जाधारी और उनके समर्थकों के साथ अभद्रता हुई। जब एसआई ने भीड़ को बाहर जाने को कहा और कथित रूप से दर्जाधारी को धक्का लगा, तो स्थिति और भड़क गई।
यही वह पल था जब राजनीति ने कानून को सीधे चुनौती दी। पुलिस की भूमिका कानून-व्यवस्था बनाए रखने की होती है, लेकिन यहाँ पुलिस को अपनी पहचान और आचरण समझाने की स्थिति आ गई। बाद में जब नगर निगम मेयर विकास शर्मा और जिलाध्यक्ष कमल जिंदल जैसे भाजपा के बड़े नेता थाने पहुँचे, तो उन्होंने पुलिस पर ही सवाल उठाए कि दर्जाधारी मंत्री के पुत्र के मामले में कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है।
सत्ता का कवच और पुलिस की मजबूरी?इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यही है कि मामला दर्ज कराने, जांच करने और न्याय दिलाने के बजाय “समझौते” का रास्ता अख्तियार किया गया। पुलिस ने दोनों पक्षों को बुलाकर समझौते के बाद मामले को शांत कर दिया।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर आरोप सही थे, तो पुलिस ने कार्रवाई क्यों नहीं की? और अगर आरोप झूठे थे, तो प्राथमिकी दर्ज कर झूठे आरोप लगाने वालों के खिलाफ केस क्यों नहीं बनाया गया? सच्चाई यह है कि जब सत्ता और संगठन का दबाव पुलिस पर हावी हो जाता है, तब कानून की धाराएं महज़ किताबों तक सिमटकर रह जाती हैं।
भाजपा कार्यकर्ताओं का आक्रोश या शक्ति प्रदर्शन?भाजपा कार्यकर्ताओं का थाने में पहुँचना और हंगामा करना सिर्फ आक्रोश नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन भी था। यह दिखाना था कि सत्ता में बैठे नेताओं और उनके परिवारों पर कोई उंगली उठाए, तो संगठन खड़ा होकर जवाब देगा। लोकतांत्रिक राजनीति में कार्यकर्ताओं की भूमिका जनता के बीच सेवा, जनसमस्याओं का समाधान और पार्टी की विचारधारा को फैलाने की होती है। लेकिन यहाँ कार्यकर्ताओं का रूप “दबंग समर्थक” जैसा दिखा, जो अपने नेता की छवि बचाने के लिए पुलिस को भी कटघरे में खड़ा कर रहे थे।
दर्जाधारी की “पहचान” और पुलिस की “माफी”यह दृश्य भी अपने आप में विडंबनापूर्ण रहा कि थाने में मौजूद पुलिसकर्मी दर्जाधारी मंत्री को पहचान ही नहीं पाए। उन्हें भीड़ के साथ बाहर जाने को कह दिया गया। जब पहचान हुई, तब जाकर माफी माँगी गई। यह वाकया बताता है कि सत्ता और पुलिस का रिश्ता कितना असंतुलित हो चुका है। पुलिस को इस बात की चिंता रहती है कि कहीं गलती से सत्ता पक्ष नाराज़ न हो जाए।
राजनीति और नैतिकता का सवाल?यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सत्ता और संगठन का इस्तेमाल किसी नेता के परिवारजन को बचाने के लिए किया जाना चाहिए? अगर दर्जाधारी मंत्री का पुत्र निर्दोष है, तो कानून की जांच उसे बरी कर देती। लेकिन अगर दोषी है, तो उसे भी कानून के अनुसार सज़ा मिलनी चाहिए। यही लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।
लेकिन इस घटना ने यह साफ कर दिया कि राजनीति में नैतिकता की जगह अब शक्ति और दबाव ने ले ली है। थाने में कार्यकर्ताओं का जमावड़ा और हंगामा करना पुलिस की निष्पक्षता पर ही नहीं, लोकतंत्र की गरिमा पर भी चोट करता है।
भाजपा के लिए चुनौती?यह घटना भाजपा के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार संगठन और कार्यकर्ताओं को “सेवा” और “संपर्क” की राजनीति करने की बात कहते हैं। लेकिन जब कार्यकर्ता कानून को दबाने का औज़ार बनते हैं, तो यह संगठन की छवि को गहरी चोट पहुँचाता है।
जनता यह संदेश लेकर जाती है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं की प्राथमिकता जनता की समस्याओं के बजाय नेताओं और उनके परिवारों को बचाना हो गई है। यह स्थिति भाजपा की उस “सेवा, संगठन और संकल्प” वाली छवि के बिल्कुल उलट है, जिस पर पार्टी गर्व करती है।
समाज पर असर?ऐसी घटनाएँ समाज में गलत संदेश फैलाती हैं। आम आदमी को लगता है कि अगर किसी का सत्ता से संबंध है, तो उस पर कानून लागू नहीं होता। यह “दो तरह के न्याय” की धारणा पैदा करता है। एक ओर सामान्य नागरिक मामूली आरोपों पर जेल जाता है, दूसरी ओर सत्ता के करीब बैठे लोग गंभीर आरोपों के बावजूद बच निकलते हैं।
उत्तराखंड की राजनीति का आईना?उत्तराखंड जैसे छोटे और संवेदनशील राज्य में जहाँ जनता आज भी राज्य निर्माण के आदर्शों—साफ शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही—की उम्मीद लगाए बैठी है, वहाँ इस तरह की घटनाएँ बेहद निराशाजनक हैं। सत्ता और संगठन का मिलकर पुलिस पर दबाव बनाना, फिर समझौते के नाम पर मामले को दबा देना, राज्य की राजनीति को भ्रष्ट और अविश्वसनीय बनाता है।
रुद्रपुर का यह प्रकरण सिर्फ एक थाने का हंगामा नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीति और शासन व्यवस्था का आईना है। सत्ता, पुलिस और समाज के बीच जिस विश्वास की डोर पर लोकतंत्र टिका है, उसे बार-बार ऐसे घटनाक्रम काटते हैं।
भाजपा को चाहिए कि वह अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को स्पष्ट संदेश दे—पार्टी जनता की सेवा के लिए है, न कि नेताओं के परिवारों को बचाने के लिए। पुलिस को भी यह साहस दिखाना होगा कि वह सत्ता और संगठन के दबाव से ऊपर उठकर निष्पक्ष कार्रवाई करे।
लोकतंत्र में “समझौते” का नाम न्याय नहीं हो सकता। न्याय तभी संभव है जब हर आरोपी और हर पीड़ित को कानून की नज़र से बराबरी का दर्जा मिले। अगर यह सिद्धांत टूटेगा, तो जनता का विश्वास न राजनीति में बचेगा, न पुलिस में, न ही लोकतंत्र में।




