हल्द्वानी | उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय महामंत्री सुशील उनियाल ने प्रयागराज में परम पूज्यनीय जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन द्वारा किए गए व्यवहार की कड़े शब्दों में निंदा की है। उन्होंने इसे केवल दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार और सुनियोजित षड्यंत्र का घिनौना उदाहरण बताया।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सुशील उनियाल ने कहा कि सनातन धर्म के सर्वोच्च धर्माचार्य के साथ इस प्रकार की अभद्रता यह दर्शाती है कि वर्तमान शासन-प्रशासन संत समाज और धार्मिक परंपराओं के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील हो चुका है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कोई साधारण प्रशासनिक भूल नहीं है, बल्कि उसी मानसिकता की पुनरावृत्ति है, जो पूर्व में दिल्ली में योगगुरु स्वामी रामदेव के साथ आधी रात को बल प्रयोग के रूप में सामने आई थी।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि समय रहते स्थिति को न रोका जाता, तो जगद्गुरु शंकराचार्य जी के साथ और भी गंभीर घटनाएं घट सकती थीं। यह अत्यंत चिंताजनक है कि जिन संत-महात्माओं ने देश की संस्कृति, आत्मा और राष्ट्रभाव को जीवित रखा, आज उन्हीं को सत्ता के इशारे पर अपमानित किया जा रहा है। पुलिस प्रशासन का रवैया यह दर्शाता है कि वह कानून के रक्षक की बजाय सत्ता के आदेशपाल के रूप में कार्य कर रहा है।
उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय महामंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा कि संत समाज के धैर्य को कमजोरी न समझा जाए। यदि इस घटना की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच नहीं कराई गई, दोषी अधिकारियों को तत्काल निलंबित नहीं किया गया और राज्य सरकार द्वारा सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगी गई, तो यह आंदोलन केवल प्रयागराज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे प्रदेश और देश में जनआंदोलन का रूप लेगा।
उन्होंने कहा कि यह मामला केवल जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के सम्मान का नहीं, बल्कि देश की धार्मिक स्वतंत्रता, संत समाज के सम्मान और लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स,प्रयागराज में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उस समय तीखा बयान दिया, जब प्रशासन द्वारा उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया गया। शंकराचार्य ने इसे केवल व्यक्तिगत रोक नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की विफलता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा प्रहार बताया।
उन्होंने कहा कि एक धर्माचार्य को बिना किसी ठोस कारण के रोकना यह दर्शाता है कि आज कानून का राज नहीं, बल्कि सत्ता का भय हावी है। शंकराचार्य ने सवाल उठाया कि जब अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं, तब एक शांतिपूर्ण कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे संत को क्यों रोका जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि साधु-संतों की आवाज दबाई जाएगी, तो समाज में असंतोष बढ़ेगा और इसके गंभीर परिणाम होंगे।
शंकराचार्य ने प्रयागराज प्रशासन पर आरोप लगाया कि वह जनता की सुरक्षा और अपराध नियंत्रण के बजाय आदेशों की गुलामी कर रहा है। उन्होंने कहा कि कानून-व्यवस्था का अर्थ केवल रोक-टोक नहीं, बल्कि न्याय, सुरक्षा और निर्भय वातावरण देना है। उनका यह भी कहना था कि यदि शासन संतों की बात सुनने के बजाय उन्हें रोकने में लगा रहेगा, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
शंकराचार्य का यह बयान अब प्रदेश की कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस का कारण बन गया है।

