उत्तरायणी (घुघुतिया त्यार) कौतिक–2026 रुद्रपुर में केवल लोकनृत्य, लोकगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इस आयोजन ने यह भी सिद्ध किया कि सच्ची संस्कृति वही है, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक संवेदना और सेवा पहुँचाए। शैल सांस्कृतिक समिति के इस आयोजन में जहां एक ओर लोकसंस्कृति का उत्सव मनाया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य, रक्तदान और नेत्रदान जैसे मानवीय सरोकारों को व्यवहार में उतारते हुए समाज के लिए प्रेरणास्पद उदाहरण प्रस्तुत किए गए।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
कार्यक्रम स्थल पर चंदोला होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज के सहयोग से दो दिवसीय निःशुल्क स्वास्थ्य जांच एवं थेरेपी शिविर का आयोजन किया गया। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने सैकड़ों लोगों की जांच कर उन्हें निःशुल्क परामर्श और उपचार उपलब्ध कराया। इस शिविर का संयोजन डॉ. किशोर चंदोला के मार्गदर्शन में हुआ, जिन्होंने चिकित्सा सेवा को केवल पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में प्रस्तुत किया।
इसी क्रम में आयोजित रक्तदान शिविर और नेत्रदान जागरूकता अभियान ने कार्यक्रम को नई ऊंचाई दी। पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डॉ. एल.एम. उप्रेती के नेतृत्व में लगाए गए रक्तदान शिविर में अनेक लोगों ने स्वेच्छा से रक्तदान किया। डॉ. उप्रेती का जीवन स्वयं इस बात का प्रमाण है कि सेवानिवृत्ति के बाद भी समाज के लिए सक्रिय रहना कैसे एक प्रेरक परंपरा बन सकता है। रक्तदान, अंगदान, पर्यावरण संरक्षण—इन सभी क्षेत्रों में उनका योगदान उत्तराखंड के सामाजिक इतिहास में दर्ज हो चुका है।
इस शिविर में दिनेश भट्ट एवं उनकी धर्मपत्नी गीता भट्ट द्वारा किया गया रक्तदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। सांस्कृतिक मंच के बीच रक्तदान कर उन्होंने यह संदेश दिया कि उत्सव और सेवा एक-दूसरे के पूरक हैं। वहीं शैल सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष गोपाल सिंह पटवाल ने स्वयं नेत्रदान का फॉर्म भरकर समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। उनका यह कदम न केवल व्यक्तिगत संकल्प था, बल्कि समाज को जागरूक करने का सशक्त माध्यम भी बना।
जब मंच पर लोकसंस्कृति का उल्लास था, तब उसी परिसर में जीवन बचाने की यह मुहिम चल रही थी। यही उत्तरायणी कौतिक–2026 की सबसे बड़ी उपलब्धि रही—जहां संस्कृति दिखावे की नहीं, बल्कि संवेदना की भाषा में बोलती नजर आई।
कुल मिलाकर, यह आयोजन इस बात का सशक्त प्रमाण बना कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान में समाज को दिशा देने वाली चेतना है। गीता भट्ट, दिनेश भट्ट, गोपाल सिंह पटवाल, डॉ. एल.एम. उप्रेती और डॉ. किशोर चंदोला जैसे व्यक्तित्वों ने यह साबित किया कि यदि सांस्कृतिक मंचों को सेवा से जोड़ा जाए, तो वे समाज परिवर्तन के सबसे प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
समाज के लिए जीने वाले दंपति
आज जब सामाजिक सरोकार अक्सर भाषणों और मंचों तक सीमित रह जाते हैं, ऐसे समय में गीता भट्ट और दिनेश चंद्र भट्ट जैसे दंपति आशा की किरण बनकर सामने आते हैं। उत्तरायणी कौतिक जैसे सांस्कृतिक आयोजनों को उन्होंने सेवा का माध्यम बनाया। पूर्व में आयोजित स्वास्थ्य शिविरों में न केवल उन्होंने स्वयं रक्तदान किया, बल्कि दो दर्जन से अधिक लोगों को प्रेरित कर ब्लड बैंक के लिए रक्त संग्रह कराया। यही नहीं, दोनों ने गीता भट्ट, दिनेश भट्ट जी नेत्रदान का संकल्प लेकर जीवन के बाद भी समाज की सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया। ऐसे दंपति वास्तव में बताते हैं कि संस्कृति, सेवा और संवेदना जब एक साथ चलें, तो समाज सशक्त बनता
उत्तरायणी कौतिक–2026 ने हमें यह सिखाया कि असली उत्सव वही है, जिसमें मानवता की जीत हो।

