अंतरिम प्रधानमंत्री की दौड़ में क्यों पिछड़े बालेन शाह? नेपाल की राजनीति में अनुभव, रणनीति और संतुलन की बड़ी चुनौती

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नेपाल इस समय अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे अस्थिर दौर से गुजर रहा है। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के इस्तीफे के बाद अंतरिम सरकार के नेतृत्व की खोज तेज हो चुकी है। संसद के भीतर और बाहर जारी संघर्ष, युवाओं की नाराज़गी, सोशल मीडिया से उपजा विद्रोह और राजनीतिक दलों की सत्ता-खेल ने इस संकट को और गहरा दिया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

इस पूरे परिदृश्य में काठमांडू के मेयर बालेन शाह एक समय सबसे बड़े दावेदार के रूप में उभरे। Gen-Z आंदोलन का चेहरा बनने वाले बालेन शाह को युवाओं का अपार समर्थन मिला। उनकी लोकप्रियता ने यह धारणा बनाई कि नेपाल की युवा पीढ़ी सत्ता के गलियारों में बदलाव लाने जा रही है। लेकिन जैसे-जैसे राजनीतिक समीकरण बदले, शाह की संभावनाएँ धूमिल होती गईं। आखिरकार, वे अंतरिम प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर हो गए और उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की को समर्थन दे दिया।

यह सवाल अब नेपाली राजनीति और विश्लेषकों के सामने है—क्यों पिछड़ गए बालेन शाह?


1. लोकप्रियता बनाम राजनीतिक अनुभव

लोकप्रियता किसी भी लोकतांत्रिक नेता के लिए पहली सीढ़ी होती है, लेकिन सत्ता तक पहुँचने और उसे संचालित करने के लिए केवल लोकप्रियता काफी नहीं होती। बालेन शाह की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही कि उनके पास संसदीय अनुभव, कूटनीतिक समझ और सरकारी प्रक्रियाओं का सीधा ज्ञान नहीं था।

नेपाल की राजनीति दशकों से पारंपरिक नेताओं और दलों के हाथ में रही है। इन नेताओं ने गठबंधन बनाने, विरोधियों से निपटने और जटिल सत्ता समीकरणों को संभालने की कला सीखी है। बालेन शाह आंदोलन की राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर आए, लेकिन वहाँ उन्हें एक “अनुभवहीन प्रयोग” के रूप में देखा गया।

युवाओं के लिए वे नायक रहे, लेकिन राजनीतिक दिग्गजों के लिए वे जोखिम।


2. हिंसक प्रदर्शनों के आरोप

पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और मौजूदा सत्ता पक्ष ने बालेन शाह पर आरोप लगाया कि उन्होंने हिंसक प्रदर्शनों को भड़काया। सोशल मीडिया पर उनकी fiery भाषण शैली और सरकार विरोधी तेवर ने इस आरोप को और बल दिया।

राजनीति में छवि सबकुछ होती है। शाह को एक जिम्मेदार नेता के बजाय “भीड़ को उकसाने वाला चेहरा” बताकर उनके खिलाफ माहौल बनाया गया। इससे वे उस भरोसे को खो बैठे जो किसी अंतरिम प्रधानमंत्री पद के लिए अनिवार्य होता है।


3. राजनीतिक सहमति की कमी

बालेन शाह की लोकप्रियता सीमित दायरे में रही—मुख्य रूप से युवा और शहरी वर्ग तक। ग्रामीण नेपाल, जो राजनीति का असली बैलेंस तय करता है, वहाँ उनकी पकड़ कमजोर थी।

सत्ता के पुराने खिलाड़ी—नेपाली कांग्रेस, CPN (UML), माओवादी दल—सभी ने उन्हें “बाहरी” और “अविश्वसनीय” माना। इन दलों के आपसी समीकरण भले ही जटिल हों, लेकिन जब सत्ता के संतुलन की बात आई, तो सबने एक ऐसे चेहरे पर सहमति जताई जिस पर व्यापक भरोसा किया जा सके। नतीजतन, सुशीला कार्की का नाम आगे आया और शाह धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए।


4. एंटी-इंडिया छवि और पड़ोसी देशों की चिंता

नेपाल की राजनीति में भारत का प्रभाव किसी से छिपा नहीं है। आर्थिक सहयोग, व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा—सब क्षेत्रों में भारत नेपाल का सबसे अहम साझेदार है।

बालेन शाह की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी “एंटी-इंडिया छवि” रही। उनके भाषणों और सार्वजनिक बयानों में अक्सर भारत पर तीखे हमले किए गए। यह आक्रामक राष्ट्रवाद युवाओं के लिए आकर्षक था, लेकिन राष्ट्रीय हितों और कूटनीतिक संतुलन के लिहाज़ से खतरनाक माना गया।

यदि वे प्रधानमंत्री बनते, तो नेपाल और भारत के रिश्ते संकट में पड़ सकते थे। यही वजह रही कि सेना और पारंपरिक राजनीतिक ताकतों ने उन्हें सत्ता से दूर रखने में दिलचस्पी दिखाई।


5. संगठन और रणनीति का अभाव

Gen-Z आंदोलन ऊर्जा और आदर्शों से भरा था, लेकिन संगठन और रणनीति के स्तर पर बिखरा हुआ। आंदोलन में शामिल युवाओं के बीच विचारधारात्मक एकजुटता की कमी रही। कोई भी मजबूत राजनीतिक दल बिना ठोस संरचना और स्पष्ट नेतृत्व के नहीं टिक सकता।

बालेन शाह इस संगठनात्मक कमजोरी को भर नहीं पाए। उनके पास न तो एक मजबूत कोर टीम थी, न ही गठबंधन बनाने का कौशल। एक अंतरिम प्रधानमंत्री से उम्मीद होती है कि वह सभी धड़ों को साथ लेकर चले, लेकिन शाह ऐसा आश्वासन नहीं दे पाए।


6. परंपरागत राजनीति का प्रतिरोध

नेपाल की राजनीति में परिवर्तन की बातें हमेशा होती रही हैं, लेकिन सत्ता की वास्तविक चाबियाँ अभी भी पुराने दलों और नेताओं के पास हैं। ये दल किसी भी चुनौतीपूर्ण चेहरे को सत्ता में आने से रोकने के लिए एकजुट हो जाते हैं।

बालेन शाह की आलोचना सीधे इन्हीं दलों पर केंद्रित रही। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने अपने लिए सहयोगियों की जगह विरोधियों की लंबी कतार खड़ी कर दी।


7. अंतरिम पीएम पद पर सुशीला कार्की क्यों बनीं सहमति?

जहाँ शाह के खिलाफ आरोप और संदेह थे, वहीं सुशीला कार्की को एक संतुलित, अनुभवी और निष्पक्ष विकल्प माना गया। वह नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी हैं और उनकी छवि ईमानदार और सख़्त प्रशासक की रही है।

उन पर किसी राजनीतिक दल की सीधी पकड़ नहीं है, जिससे सभी धड़ों ने उन्हें “सुरक्षित विकल्प” माना। अंतरिम दौर में सबसे बड़ी ज़रूरत यही होती है कि सरकार स्थिर रहे और संकट और गहराए नहीं।


8. नेपाल के लिए सबक

बालेन शाह की यात्रा हमें यह सिखाती है कि लोकतंत्र में केवल सड़क की राजनीति और सोशल मीडिया पर लोकप्रियता से सत्ता तक नहीं पहुंचा जा सकता। इसके लिए धैर्य, अनुभव, रणनीति और सहयोग की राजनीति की ज़रूरत होती है।

Gen-Z आंदोलन ने भले ही नेपाल की राजनीति को झकझोर दिया हो, लेकिन अब उन्हें आंदोलन से आगे बढ़कर संस्थागत राजनीति की ओर बढ़ना होगा। वरना वे बार-बार ऐसे ही मौकों पर हाशिए पर धकेल दिए जाएंगे।


बालेन शाह का पिछड़ना सिर्फ़ उनकी व्यक्तिगत हार नहीं, बल्कि नेपाल की युवा राजनीति के सामने आई चुनौतियों का आईना है। यह कहानी बताती है कि भावनाओं और नारों से बदलाव की शुरुआत तो हो सकती है, लेकिन टिकाऊ राजनीतिक परिवर्तन के लिए अनुभव, संगठन और संतुलन ज़रूरी है।

नेपाल आज जिस राजनीतिक संकट से गुजर रहा है, उसमें अंतरिम प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की नियुक्ति शायद अस्थायी स्थिरता दे। लेकिन दीर्घकालिक समाधान तभी संभव है जब पारंपरिक राजनीति और युवा नेतृत्व के बीच कोई साझा मंच बने।

अन्यथा, नेपाल बार-बार अस्थिरता, हिंसा और अधूरी उम्मीदों के चक्रव्यूह में फँसा रहेगा।




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