

रूद्रपुर में 7, 8, 9 नवंबर का दिन कुमाऊँ की भाषा, संस्कृति आ पहचान क वास्ता ऐतिहासिक दिन ठहरण वालो छै। “राष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन” केवल एक कार्यक्रम नौं, बल्कि अपनेपन, अस्मिता आ संस्कृति क पुनर्जागरण क प्रतीक छै।

भाषा सिरफ बोलचाल क माध्यम नौं, बल्कि एक सम्पूर्ण सभ्यता क दर्पण छै। कुमाऊँनी भाषा में पहाड़ क आत्मा बस्सी छै — गढ़्या-भट, झोला, लोकगीत, लोककथा, आ लोकसंस्कृति सब कुमाऊँनी भाषा सौं ही जिंदा छै। जौं भाषा बिचरि, तौ संस्कृति बिचरि, आ जौं संस्कृति बिचरि, तौ पीढ़ी अपन पहचान बिचरि।
भाषा क मानकीकरण जरूरी छै
जैसें ऊपर लिख्यू — “मानकीकरण चैनी हौय।” बिल्कुल सही बात छै। भाषा क मानकीकरण बिना, ऊ स्कूल क किताबन मं नि पहुंचणि, सरकारी कागज मं नि चलणि, आ नई पीढ़ी तक सहज रूप सौं नि पहुंचणि। जौं कुमाऊँनी भाषा क एकरूप लिपि, उच्चारण, आ व्याकरण तय हुंण, तौ ऊ सिखाई जा सकणि, पढ़ाई जा सकणि, आ सरकारी स्तर पर अपन मान्यता पा सकणि।
कुमाऊँनी भाषा आ शिक्षा
आज कुमाऊँ मं सरकारी स्कूलां मं बच्चा अंग्रेजी आ हिंदी तौ सिख्यां, पर अपन मातृभाषा सौं दूरी बढ़्यां। परिणाम — ना भाषा सही सीखी, ना संस्कार सही समझे। स्कूलां मं कुमाऊँनी विषय रूप में आवै, तौ बच्चा अपन माटी सौं जुड़ण, अपन लोकगीत-लोककथा सौं सीखण, आ अपन इतिहास क गौरव समझण।
कुमाऊँनी संस्कृति — अमर धरोहर
कुमाऊँ क लोकसंस्कृति मं गीत-नृत्य सौं ल्यो काष्ठकला तक, सब किल ठौर कुमाऊँनी भाषा बिन अपूर्ण छै। झोड़ा, छपेली, चांचरी, जागर — ये सब कुमाऊँनी शब्द, भावना, आ परंपरा सौं बंधे छै। आपणी भाषा जीवित रहली, तौ संस्कृति सौं नै सूंघणि।
आपुणि दुदबोली क जगरण व्हाट्सएप सौं”
आजक डिजिटल जमाण मं जां सब सोशल मीडिया मं परदेशी भाषा बोलण लग्यां, तैं व्हाट्सएप मं “राष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा” ग्रुप क सुरुआत कुमाऊँ क भाषा प्रेमी जनमन क लागि एक नवजागरण सरीखी बात छै। यो ग्रुप सौं अब 389 स्याल जुड़ि ग्यां छन, आ सब आपुणि दुदबोली — कुमाऊँनी — मं बात करण लग्यां छन। ई बात स्याणि बण्यू कि अब आपुण लोक अपन माटी सौं जुड़ण क जोश मं छन।
पूरन कांडपाल जी नै एकदम ठिक लिख्यू —
“कुमाऊँनी भाषा मं आगत शब्द भौत छीं जमें अंग्रेजी शब्द लै शामिल छीं। आगत शब्दों है परहेज नि हुण चैन।”
ई बात कुमाऊँनी क विशालता बतौंदि छै — कि यो भाषा अपन अपनाव मं सब अपन लै सक्दि छै, पर अपन मूल स्वर, अपन मिठास, अपन आत्मा न छोड़े।
कड़ोला जी नै अपन पोस्ट मं ‘किरसाण’ आ ‘कारिंद’ शब्दन सौं भाषा क सौंदर्य बखाण्यू। ओल नै देखायल कि आपुणि भाषा मं व्यावहारिक प्रयोग सौं कति सहजता सौं बिचार प्रकट हो सक्दि छै।
“तुमरि चेलि तौ भौतै किरसाण और कारिंद भै, जां लै जालि तुमौर नाम उजागर करैलि।”
यो वाक्य सौं भाषा क लोकपक्षीपन झल्कि उठै छै — सरल, सजीव आ सटीक।
तारा पाठक जी नै ग्रुप क उद्देश्य स्पष्ट कर्यू —
“यो ग्रुप बणूंनौं उद्देश्य सदस्यों _साहित्यकारों तक भाषा सम्मेलन संबंधित सूचना या वार्ता करण होल।”
ई बात बतौंदि छै कि अब कुमाऊँनी भाषा केवल मनोरंजन क माध्यम नि रहन, बलकि बौद्धिक, साहित्यिक आ सामाजिक संवाद क माध्यम बनण लागी छै।
गोपाल रावत जी नै ‘ढाई आखर’ प्रतियोगिता क बखाण कर्यू —
“एक पाती बापू के नाम मं भगत सिंह कोश्यारी जी पुर देश में प्रथम ऐ रांछी।”
ई गर्व क बात छै कि कुमाऊँनी जन भाषा प्रेम सौं राष्ट्रीय स्तर तक आपुण छाप छोड़ण लाग्यां।
पूरन चंद्र कांडपाल जी नै आपुण कवितात्मक पोस्ट मं समाज क आइना दिख्यू —
“जां बात बात में हात चलनी उहैं गौंसभा कौनी,
जां बात बात में लात चलनी उहैं विधानसभा कौनी…”
ई पंक्त्यां सौं समाजिक व्यंग्य क संग भाषा क गहराई झल्कै छै।
देवेंद्र चंद्र जोशी जी नै ग्रुप मं सब सौं सरल पर प्रेरक बात लिख्यू —
“कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन में जतुक लै है सकों आपुणि दुदबोली प्रयोग करण चें। बांकि आपु खुदै समझदार भया।”
ई वाक्य सब भाषा प्रेमी जनमन लै प्रेरणा बन्यू।
अब व्हाट्सएप जैं डिजिटल मंच मं जब कुमाऊँनी लिखी जां, बोलि जां, सुणी जां, तैं भाषा क प्रचार केवल पहाड़ नौं, बल्कि देश-विदेश मं होण लाग्यू। भाषा क जड़ सौं तकनीकी माध्यम सौं जोड़ण — यो सच्चो “डिजिटल पुनर्जागरण” छै।
आपुणि भाषा मं लिखण, बोलण, सुणण — ई केवल अपन गौरव नौं, अपन अस्तित्व बचाव क आंदोलन छै।
आज 389 सदस्य जुड़्यां छन, काल ये संख्या हजारौं मं होण, आ एक दिन ऐ भी आवै जां कुमाऊँनी भाषा राजभाषा क दर्जा पावै।
“आपुणि भाषा बोल,
आपुणि भाषा लिख,
आपुणि भाषा बचा —
कुमाऊँ जीवित रहण।”
सराष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा ग्रुप क पहल पर आधारित
भविष्य क दिशा!आज जरूरत छै कि सरकार क साथ-साथ समाज भी कुमाऊँनी भाषा क प्रोत्साहन करै। रेडियो, टीवी, सोशल मीडिया, स्कूल, कॉलेज — सब ठौर आपणी भाषा बोलण, लिखण आ पढ़ण क परंपरा फिर जागै। कुमाऊँनी क पाठ्यक्रम में शामिल करै, राजभाषा क दर्जा दिलावै, तौ ई भाषा केवल पहाड़ नौं, बल्कि पूरा उत्तराखंड क गौरव बनि जाल।
आपणि भाषा, आपणि माटी, आपणि अस्मिता —
“जौं कुमाऊँनी जिंदा, तौं कुमाऊँ जिंदा।”
राष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन, रूद्रपुर 2025 क अवसर पर हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स




