उत्तराखंड। भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश प्रवक्ता टोली का विस्तार करते हुए आठ नए प्रवक्ताओं की नियुक्ति की है। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की सहमति के बाद प्रदेश महामंत्री एवं कार्यालय प्रभारी कुंदन परिहार ने मंगलवार को इसकी घोषणा की। देहरादून महानगर से रवींद्र जुगरान और शादाब शम्स को प्रदेश प्रवक्ता की जिम्मेदारी दी गई है।
जारी सूची के अनुसार ऊधमसिंह नगर से राजेश शुक्ला, नैनीताल से सुरेश तिवारी, कोटद्वार से अनुकृति गुसांई और विश्वजीत नेगी, देहरादून ग्रामीण से सत्यवीर चौहान तथा ऋषिकेश से मनोज जखमोला को प्रदेश प्रवक्ता बनाया गया है। पार्टी ने इन नेताओं को अलग-अलग जिलों और क्षेत्रों में संगठन की नीतियों, केंद्र व राज्य सरकार की उपलब्धियों तथा विपक्ष के मुद्दों पर भाजपा का पक्ष रखने की जिम्मेदारी सौंपी है।
भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान के अनुसार प्रदेश अध्यक्ष के निर्देश पर प्रवक्ता टोली का विस्तार किया गया है। नए प्रवक्ताओं के माध्यम से पार्टी का पक्ष जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने और विभिन्न क्षेत्रों में संगठन की मीडिया गतिविधियों को मजबूती देने की उम्मीद जताई गई है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
हालांकि, नई नियुक्तियों के साथ भाजपा के भीतर एक राजनीतिक सवाल भी चर्चा में आ गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से पूर्व में दायित्वधारियों को लेकर यह बात कही गई थी कि सरकारी दायित्व संभालने वाले लोगों को आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट मिलने की संभावना से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। ऐसे में प्रदेश प्रवक्ता का दायित्व मिलने वाले नेताओं को लेकर भी राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी की यह व्यवस्था प्रवक्ता बनाए गए नेताओं पर भी लागू होगी?
दरअसल, भाजपा में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर टिकट के संभावित दावेदारों की राजनीतिक सक्रियता पहले से तेज है। नई प्रवक्ता टोली में शामिल कई चेहरे अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय राजनीति से जुड़े रहे हैं और भविष्य में विधानसभा चुनाव में दावेदारी की चर्चाओं में भी उनके नाम सामने आते रहे हैं।
ऐसे में पार्टी की ओर से यह स्पष्ट किया जाना अहम होगा कि प्रदेश प्रवक्ता का दायित्व संगठनात्मक जिम्मेदारी भर है या इसे भी सरकारी दायित्वों की तरह चुनावी टिकट की दावेदारी से अलग रखने की नीति के दायरे में रखा जाएगा। यदि प्रवक्ता पद को भी इसी श्रेणी में माना जाता है तो नई जिम्मेदारी पाने वाले नेताओं के सामने संगठन और चुनावी राजनीति में से किसी एक भूमिका को प्राथमिकता देने का सवाल खड़ा हो सकता है।
भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। पार्टी जहां संगठन को मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं संभावित प्रत्याशियों को लेकर कार्यकर्ताओं के बीच चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। ऐसे में नई प्रवक्ता टोली की नियुक्ति के साथ उठे इस सवाल पर पार्टी नेतृत्व की स्पष्टता का इंतजार रहेगा कि क्या भाजपा के नए प्रवक्ताओं के लिए भी विधानसभा टिकट की राह बंद मानी जाएगी या संगठनात्मक जिम्मेदारी के साथ चुनावी दावेदारी का विकल्प खुला रहेगा?
