संपादकीय“कोटद्वार से उठी चिंगारी: जब छोटी दुकान, बड़ी राजनीति और भटकी पत्रकारिता ने उत्तराखंड को कटघरे में खड़ा कर दिया”

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उत्तराखंड के कोटद्वार में एक कपड़ों की दुकान के नाम को लेकर उठा विवाद यदि केवल स्थानीय स्तर पर सुलझाया जाता, तो शायद यह खबर भी न बनती। लेकिन बीते दो हफ्तों में जिस तरह से इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीतिक रंग, सांप्रदायिक नैरेटिव और सोशल मीडिया युद्ध में बदला गया, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि—क्या उत्तराखंड आज भी वही शांत, संतुलित और सहअस्तित्व वाला राज्य है, जिसकी कल्पना राज्य आंदोलनकारियों ने की थी?
यह विवाद किसी दंगे, हत्या, आगजनी या लूट से नहीं जुड़ा था। न कोई गाड़ी जलाई गई, न दुकान तोड़ी गई, न किसी की जान गई। फिर भी इसे इस तरह प्रस्तुत किया गया मानो देश के लोकतंत्र पर कोई बड़ा हमला हो गया हो। यह अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि सोची-समझी राजनीतिक और मीडिया रणनीति का परिणाम है।
विवाद का मूल: नाम, आस्था और अधिकार
कोटद्वार की पटेल मार्ग स्थित एक कपड़ों की दुकान—जिसका नाम ‘बाबा’ है—इस पूरे घटनाक्रम का केंद्र रही। दुकान के मालिक वकील अहमद हैं। स्थानीय बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने इस नाम पर आपत्ति जताई। उनका तर्क साफ था—कोटद्वार सिद्धबली हनुमान मंदिर के कारण एक धार्मिक आस्था का केंद्र है, और ‘बाबा’ शब्द स्थानीय धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है।
यह मांग न तो पहली थी और न ही असंवैधानिक। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ धार्मिक भावनाओं के सम्मान का सिद्धांत भी लागू होता है। सवाल नाम रखने के कानूनी अधिकार का नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन का था।
वादा, स्थानांतरण और फिर वही नाम
करीब ढाई महीने पहले बजरंग दल ने शांतिपूर्ण तरीके से आपत्ति दर्ज कराई। उस समय कथित रूप से यह भरोसा दिया गया कि दुकान स्थानांतरित होने के बाद नाम पर पुनर्विचार होगा। कुछ समय के लिए मामला शांत रहा। लेकिन जनवरी में जब दुकान दूसरी जगह शिफ्ट हुई और नाम वही रहा, तो विवाद ने दोबारा सिर उठाया।
यहां सवाल उठता है—यदि भरोसा दिया गया था, तो उसका पालन क्यों नहीं हुआ? और यदि पालन नहीं हुआ, तो विरोध को अलोकतांत्रिक कैसे कहा जा सकता है?
‘मोहम्मद दीपक’ और सोशल मीडिया की आग

जब निर्दोष गरीब बालक दिलबर नेगी की निर्मम हत्या हुई, तब ‘दीपक मोहम्मद’ किस बिल में छिपा था? नाम बदलकर राजनीति करना आसान है, पीड़ितों के साथ खड़ा होना कठिन। अगर दिखावा छोड़ संवेदना होती, तो हर दिलबर के लिए आवाज़ उठती और न्याय की मांग सबके लिए समान होती।


28 जनवरी की घटना में जिम संचालक दीपक कुमार का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने स्वयं को “मोहम्मद दीपक” बताया। यह बयान, चाहे जिस मंशा से दिया गया हो, सोशल मीडिया के दौर में आग में घी साबित हुआ।
कुछ लोगों ने इसे “सांप्रदायिक सौहार्द” का प्रतीक बताया, तो कुछ ने इसे जानबूझकर उकसावे की कोशिश माना। यहीं से मामला स्थानीय से राष्ट्रीय बन गया। कांग्रेस समर्थक सोशल मीडिया हैंडल, कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी और तथाकथित सेक्युलर पत्रकार मैदान में कूद पड़े।
चयनात्मक संवेदना: हत्या पर चुप्पी, नाम पर हंगामा
यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है—
जब देहरादून में दो निर्दोष महिलाओं की निर्मम हत्या होती है,
जब अंकित भंडारी हत्याकांड, कशिश हत्याकांड, वीआईपी प्रकरण,
जब उत्तराखंड में लव जिहाद, नशा, अपराध और बेरोजगारी जैसे मुद्दे सुलग रहे होते हैं—
तब यही “मानवाधिकार प्रेमी” और “संविधान रक्षक” कहां चले जाते हैं?
एक दुकान के नाम पर पूरा देश खड़ा हो जाना और वास्तविक अपराधों पर चुप्पी—यह संवेदना नहीं, राजनीतिक सुविधा है।
पत्रकारिता का पतन: खबर नहीं, एजेंडा
इस पूरे प्रकरण में सबसे निराशाजनक भूमिका यथागठित पत्रकारिता की रही।
आज उत्तराखंड में तीन तरह के पत्रकार सक्रिय हैं—
कट्टर कांग्रेसी पत्रकार
कट्टर भाजपा समर्थक पत्रकार
दोनों तरफ खेल खेलने वाले वैचारिक कम्युनिस्ट पत्रकार
इनका उद्देश्य न सत्य है, न शांति—बल्कि उकसावा, टीआरपी और राजनीतिक रोटी है। पहाड़-मैदान, हिंदू-मुसलमान जैसे जटिल मुद्दों को जानबूझकर हवा देना उत्तराखंड की मूल अवधारणा के विरुद्ध अपराध है।
बजरंग दल: विरोध या सेवा—पूरी तस्वीर क्यों नहीं?
बजरंग दल को केवल विरोध और नारेबाजी तक सीमित कर दिखाना भी बौद्धिक बेईमानी है।
यही संगठन—
रक्तदान शिविर लगाता है
स्वच्छ भारत अभियान में भाग लेता है
आपदा के समय राहत कार्य करता है
विरोध दर्ज करना उनका संवैधानिक और संगठनात्मक अधिकार है। यदि विरोध शांतिपूर्ण है, तो उसे “उग्र” कहकर बदनाम करना किस एजेंडे का हिस्सा है?
नाम, पहचान और दोहरा मापदंड
यदि कोई बिरयानी बेचता है, तो अपना नाम लिखने में आपत्ति क्यों?
यदि हरिद्वार रोडवेज पर हिंदू नामों से दुकानें चल रही हैं, लेकिन संचालक अल्पसंख्यक हैं—तो पारदर्शिता पर सवाल उठाना गलत कैसे हो गया?
दिलचस्प यह है कि शराब फैक्ट्रियों पर देवी-देवताओं के नाम रखे जाने पर यही वर्ग मौन रहता है। तब न आस्था याद आती है, न धर्म।
राजनीति का ध्रुवीकरण: बीजेपी बनाम कांग्रेस?
इस प्रकरण को जबरन यह रूप दिया गया कि—
बीजेपी हिंदुओं की पार्टी है और कांग्रेस मुसलमानों की।
यह विभाजनकारी सोच न देश के लिए अच्छी है, न उत्तराखंड के लिए। लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस के कई नेता वहां भी घुसने की कोशिश कर रहे हैं, जहां उनका कोई सामाजिक आधार नहीं—सिर्फ विवाद के सहारे राजनीति।
उत्तराखंड को प्रयोगशाला न बनाएं
कोटद्वार की घटना में कोई बड़ा अपराध नहीं हुआ, लेकिन इसे बड़ा बनाकर उत्तराखंड को एक बार फिर सांप्रदायिक प्रयोगशाला बनाने की कोशिश जरूर हुई।
जरूरत है—
संवेदनशील पत्रकारिता की
संतुलित राजनीति की
और सबसे बढ़कर उत्तराखंड की आत्मा को समझने की
धर्म के नाम पर व्यापार, राजनीति या पत्रकारिता—तीनों ही धर्म के विरुद्ध हैं।
और उत्तराखंड अब यह खेल बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
शांति, पारदर्शिता और मूल पहचान—यही देवभूमि का रास्ता है।


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