हरेला मेले का भव्य आगाज, लोक संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

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हल्द्वानी। हीरानगर स्थित पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच में रविवार को पांच दिवसीय हरेला मेले का पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य शुभारंभ हुआ। गोल्ज्यू देवता के पूजन और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शुरू हुए इस आयोजन में उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक विरासत, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक मूल्यों की सुंदर झलक देखने को मिली। पहले ही दिन बड़ी संख्या में लोगों ने मेले में पहुंचकर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया और हरेला पर्व के महत्व को आत्मसात किया।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


हरेला पर्व उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान का प्रमुख प्रतीक माना जाता है। यह पर्व हरियाली, प्रकृति, खेती, समृद्धि और सामाजिक एकता का संदेश देता है। इसी उद्देश्य को लेकर पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच की ओर से आयोजित इस मेले में लोक परंपराओं को जीवंत रूप देने का प्रयास किया गया। उद्घाटन समारोह में मौजूद अतिथियों ने कहा कि हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेने का अवसर है।
गोल्ज्यू देवता के पूजन से हुई शुरुआत
मेले की शुरुआत गोल्ज्यू देवता के पूजन के साथ हुई। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा-अर्चना संपन्न कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि, शांति और हरियाली की कामना की गई। इसके बाद पारंपरिक संस्कार गीतों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का शुभारंभ हुआ। पूरे परिसर में पारंपरिक वेशभूषा, लोक संगीत और सांस्कृतिक माहौल ने पर्व की गरिमा को और अधिक आकर्षक बना दिया।
अतिथियों ने दिया पर्यावरण संरक्षण का संदेश
मेले का उद्घाटन मंच के संरक्षक एवं राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के अध्यक्ष हुकुम सिंह कुंवर तथा मंच अध्यक्ष खड़ग सिंह बगड़वाल ने संयुक्त रूप से किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान उसके पर्वों, लोक परंपराओं और प्रकृति से जुड़े जीवन दर्शन में निहित है। हरेला पर्व प्रकृति के संरक्षण, वृक्षारोपण, हरियाली बढ़ाने और आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाने का संदेश देता है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवनशैली के बीच पारंपरिक पर्वों का महत्व और भी बढ़ गया है। ऐसे आयोजन समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करते हैं। युवाओं को अपनी लोक संस्कृति, भाषा और परंपराओं से परिचित कराने के लिए इस प्रकार के आयोजनों की निरंतर आवश्यकता है।
बच्चों ने लोकगीत और लोकनृत्य से बांधा समां
उद्घाटन दिवस पर आयोजित सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। छह से तेरह वर्ष आयु वर्ग की एकल लोकगीत प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने कुमाऊंनी और गढ़वाली लोकधुनों पर प्रभावशाली प्रस्तुतियां दीं। पारंपरिक वेशभूषा में सजे बच्चों ने अपनी मधुर आवाज और आत्मविश्वास से दर्शकों की खूब सराहना प्राप्त की।
कनिष्ठ वर्ग की समूह लोकनृत्य प्रतियोगिता भी आकर्षण का केंद्र रही। बच्चों ने उत्तराखंड की लोक संस्कृति को मंच पर जीवंत कर दिया। पारंपरिक गीतों की धुन पर प्रस्तुत किए गए रंगारंग नृत्यों ने दर्शकों को लंबे समय तक बांधे रखा। पूरे पंडाल में तालियों की गूंज सुनाई देती रही।
लोक कलाकारों ने बिखेरा सांस्कृतिक रंग
शाम को आयोजित सांस्कृतिक संध्या में प्रसिद्ध लोकगायिका बबीता देवी ने कुमाऊंनी भजनों और लोकगीतों की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनके गीतों में पहाड़ की संस्कृति, लोकजीवन और आस्था की झलक स्पष्ट दिखाई दी।
लोकगायक पुष्कर मेहरा ने भी अपने लोकप्रिय गीतों से कार्यक्रम में नया उत्साह भर दिया। उनके गीतों पर दर्शक देर तक झूमते रहे। सांस्कृतिक संध्या के दौरान पूरा पंडाल उत्साह, संगीत और लोक संस्कृति के रंगों में सराबोर दिखाई दिया।
लोक संस्कृति को सहेजने का प्रयास
आयोजकों ने बताया कि हरेला मेला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। इसका उद्देश्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना, नई पीढ़ी को अपनी लोक विरासत से जोड़ना तथा पारंपरिक रीति-रिवाजों को आगे बढ़ाना है। आज के समय में युवा तेजी से आधुनिक संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं। ऐसे आयोजनों के माध्यम से उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
16 जुलाई तक चलेंगे विविध कार्यक्रम
मेला 16 जुलाई तक आयोजित किया जाएगा। इस दौरान प्रतिदिन विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यिक और सामाजिक कार्यक्रम होंगे। लोकगीत और लोकनृत्य प्रतियोगिताओं के साथ कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक संध्याएं, पारंपरिक खेल, बच्चों की रचनात्मक प्रतियोगिताएं तथा सामाजिक जागरूकता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आयोजकों का कहना है कि प्रत्येक दिन अलग-अलग सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दर्शकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहेंगी।
पर्यावरण संरक्षण का विशेष संदेश
हरेला पर्व का मूल उद्देश्य प्रकृति के प्रति सम्मान व्यक्त करना और वृक्षारोपण को बढ़ावा देना है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए मेले में पर्यावरण संरक्षण का संदेश प्रमुखता से दिया गया। अतिथियों ने लोगों से अधिक से अधिक पौधे लगाने, जल स्रोतों के संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति का संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।
बड़ी संख्या में पहुंचे लोग
मेले के उद्घाटन अवसर पर क्षेत्र के लोगों की अच्छी भागीदारी देखने को मिली। परिवारों, महिलाओं, युवाओं और बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ कार्यक्रम में हिस्सा लिया। आयोजन स्थल पर पारंपरिक माहौल ने सभी का ध्यान आकर्षित किया।
कार्यक्रम में हुकुम सिंह कुंवर, बीना कुंवर, खड़ग सिंह बगड़वाल, गीता बगड़वाल ने यजमान की भूमिका निभाई। मंच के सचिव देवेंद्र तोलिया, कोषाध्यक्ष त्रिलोक बनोली, शोभा बिष्ट, हेमंत बगड़वाल, पुष्पा संभल, विमला सांगुड़ी, गुणवंत सहित मंच के अनेक पदाधिकारी और बड़ी संख्या में क्षेत्रवासी उपस्थित रहे।
संस्कृति, समाज और प्रकृति का अनूठा संगम
हरेला मेले का पहला दिन उत्तराखंड की सांस्कृतिक समृद्धि, लोक परंपराओं और सामाजिक एकता का सजीव उदाहरण बनकर सामने आया। पारंपरिक संगीत, लोकनृत्य, बच्चों की प्रतिभा, लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां और पर्यावरण संरक्षण का संदेश पूरे आयोजन की विशेष पहचान रहे। आने वाले दिनों में आयोजित होने वाले विविध कार्यक्रमों को लेकर लोगों में उत्साह बना हुआ है। आयोजकों को उम्मीद है कि यह मेला संस्कृति संरक्षण के साथ-साथ समाज में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी प्रभावी ढंग से पहुंचाएगा।


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