संपादकीय: वक्फ विधेयक पर कांग्रेस की सियासत – मुद्दों की नहीं, भ्रम फैलाने की राजनीति

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर दिए गए बयान न केवल अतिशयोक्तिपूर्ण हैं, बल्कि यह साफ संकेत हैं कि कांग्रेस अब तथ्य आधारित राजनीति की बजाय भावनाओं को भड़काकर सियासी ज़मीन तलाशना चाहती है। रावत का यह दावा कि केंद्र सरकार दो लाख करोड़ रुपये की वक्फ संपत्तियों को “हड़पने” की साजिश कर रही है, एकतरफा और भ्रामक है।
वास्तविकता यह है कि केंद्र सरकार द्वारा लाया गया वक्फ संशोधन विधेयक पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक सुधारों को ध्यान में रखकर बनाया गया है, ताकि वक्फ संपत्तियों का सही ढंग से प्रबंधन हो सके और उसका लाभ असल जरूरतमंदों तक पहुंच सके। लेकिन कांग्रेस, खासकर उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य में, इसे मुसलमानों की संपत्ति छीनने की साजिश बताकर धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है।
यह वही कांग्रेस है जो वर्षों तक वक्फ बोर्डों की बदहाली पर आंख मूंदे रही, और अब जब सरकार उनके प्रबंधन में सुधार लाने की कोशिश कर रही है, तो उसे सांप्रदायिक रंग देकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में जुटी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक वरिष्ठ नेता होने के बावजूद हरीश रावत जैसे व्यक्ति ऐसे बयान देकर सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
उत्तराखंड की बात करें, तो कांग्रेस की दशकों की नाकामी यहां की जनता अच्छी तरह समझ चुकी है। नाम बदलने जैसे मामूली मुद्दों को तूल देकर कांग्रेस यह साबित कर रही है कि उसके पास विकास पर चर्चा करने को कुछ नहीं है। जिन स्थानों के नामों को लेकर हरीश रावत आपत्ति जता रहे हैं, वे ऐतिहासिक व स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं, न कि किसी समुदाय विशेष को अपमानित करने के लिए। लेकिन कांग्रेस इन नामों को भी सांप्रदायिक चश्मे से देख रही है।
भाजपा सरकार पर “संविधान पर हमला” करने का आरोप लगाने वाली कांग्रेस को अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिए – यही पार्टी है जो आपातकाल थोपकर लोकतंत्र का गला घोंट चुकी है, यही पार्टी है जिसने तुष्टिकरण की राजनीति कर देश को बांटने का काम किया है।
उत्तराखंड ही नहीं, पूरे देश में कांग्रेस जिस प्रकार से भ्रम और भय फैलाकर अल्पसंख्यकों को गुमराह करने में लगी है, वह स्पष्ट दर्शाता है कि पार्टी अब विकास, नीतियों और जनहित के मुद्दों पर चर्चा करने में असमर्थ हो चुकी है। अगर कांग्रेस को वाकई देश और खासकर उत्तराखंड की चिंता है, तो उसे भावनाओं की राजनीति छोड़कर ठोस सुझावों और विकास कार्यों की दिशा में अपनी भूमिका तय करनी चाहिए।
वर्ना जनता ने यह तय कर लिया है – झूठ और भ्रम फैलाने वालों के लिए उत्तराखंड में कोई जगह नहीं।
– एक जागरूक मतदाता की कलम से

