

देहरादून।उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय एक बार फिर विवादों में है। दस्तावेजों और शिकायतों के मुताबिक विश्वविद्यालय ने वर्ष 2014-15 में तदर्थ शिक्षकों को बिना शासन अनुमति के नियमित कर दिया और महज तीन साल बाद 2018 में इन्हीं शिक्षकों को कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) के नाम पर सीधे एसोसिएट प्रोफेसर बना दिया। जबकि खुद विश्वविद्यालय की उच्च स्तरीय समिति अपनी रिपोर्ट में कह चुकी है कि CAS विश्वविद्यालय में लागू ही नहीं है।

संवाददाता,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स/ अवतार सिंह बिष्ट/उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी!
विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड के अनुसार, डॉ. प्रवेश तोमर, डॉ. शोभित वाष्र्णेय, डॉ. उषा शर्मा और डॉ. रामविलास शुक्ला को वर्ष 2015 में तदर्थ से विनियमित कर असिस्टेंट प्रोफेसर बनाया गया। तीन साल के भीतर ही इन्हें CAS के तहत एसोसिएट प्रोफेसर के ऊँचे वेतनमान (₹37,400-67,000 ग्रेड वेतन ₹9,000) पर प्रमोट कर दिया गया।
चौंकाने वाली बात यह है कि विश्वविद्यालय प्रशासन यह सब कार्यपरिषद के संकल्प का हवाला देकर करता रहा, जबकि महालेखाकार (CAG) की रिपोर्ट में इस पूरी प्रक्रिया को नियमविरुद्ध बताया गया है। रिपोर्ट में अतिरिक्त वेतन भुगतान की वसूली की भी संस्तुति की गई है।
विवाद तब और गहरा गया जब विश्वविद्यालय की उच्चस्तरीय समिति ने साफ कहा कि विश्वविद्यालय में CAS लागू नहीं है। दूसरी ओर, कार्यपरिषद की बैठकों में पास संकल्पों और लोक सूचना अधिकार (RTI) के तहत दी गई सूचनाओं में खुद विश्वविद्यालय CAS के तहत ही पदोन्नतियां करने की बात कहता रहा। यह दोहरा रवैया विश्वविद्यालय प्रशासन की नीयत पर सवाल खड़ा करता है।
सूत्रों के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्यपरिषद की बैठकों में यूजीसी की CAS स्कीम का नाम लेकर शासनादेशों की मनमानी व्याख्या की और शिक्षकों की मनचाही प्रमोशन और विनियमितीकरण की प्रक्रिया अंजाम दी।
वर्ष 2014-15 में कुल 8 तदर्थ शिक्षकों को नियमित कर दिया गया, जबकि उस समय उत्तराखण्ड में कोई विनियमितीकरण नियमावली प्रभावी नहीं थी। शासन की अनुमति भी इस पर नहीं ली गई थी। कार्यपरिषद के कार्यवृत्त तक पर हस्ताक्षर नहीं हैं, जिससे पूरा रिकॉर्ड ही संदिग्ध नजर आता है।
विवाद के घेरे में आए कुलपति डॉ. सत्येन्द्र प्रसाद मिश्रा उस समय अपने दूसरे कार्यकाल में थे। बाद में नैनीताल हाईकोर्ट ने उन्हें फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों के आरोप में कुलपति पद से बर्खास्त कर दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि एक बर्खास्त और फर्जी डिग्रीधारी कुलपति द्वारा कराए गए प्रमोशन और कार्यपरिषद के संकल्प की वैधता कितनी है?
सूत्र बताते हैं कि पदोन्नति का खेल इतना संगठित था कि तत्कालीन विश्वविद्यालय प्रशासन ने कार्यपरिषद के फैसलों को सृष्टि की रचना जैसा ऐतिहासिक कदम बताकर पेश किया और शिक्षकों को गुमराह किया।
विश्वविद्यालय के भीतर उठ रहे सवाल यही हैं –
- जब विश्वविद्यालय परिनियमावली 2015 तक अस्तित्व में ही नहीं थी, तो वर्ष 2014-15 में पदोन्नतियां किन नियमों पर हुईं?
- कार्यपरिषद क्या नियम-कानूनों से ऊपर है कि किसी को भी प्रमोट कर दे?
- CAS लागू ही नहीं थी, फिर CAS के नाम पर प्रमोशन कैसे हो गया?
- शासन की अनुमति क्यों नहीं ली गई?
- क्या कार्यपरिषद के कार्यवृत्त ही फर्जी हैं?
इन सवालों का जवाब अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन देने से बचता आ रहा है। वहीं, महालेखाकार की आपत्तियों और शासन द्वारा मांगे गए स्पष्टीकरण को भी विश्वविद्यालय लगातार टालता रहा है।
आखिरकार, यह घोटाला केवल व्यक्तिगत लाभ का मामला नहीं, बल्कि राज्य के उच्च शिक्षा तंत्र और पब्लिक मनी के दुरुपयोग का बड़ा उदाहरण बनकर उभर रहा है।
अब देखना यह होगा कि शासन और विश्वविद्यालय प्रशासन इस पर कब और क्या ठोस कार्रवाई करते हैं।
क्रमशः पार्ट2




