

देहरादून। उत्तराखण्ड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में वर्ष 2014-15 के दौरान शिक्षकों की पदोन्नति में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ और नियमों की अनदेखी सामने आई हैं। दस्तावेजों और विश्वविद्यालय के ही पत्राचार के मुताबिक, उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) का हवाला देकर असिस्टेंट प्रोफेसर से एसोसिएट प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर से प्रोफेसर तक के प्रमोशन कर डाले, लेकिन इन पदोन्नतियों में न तो आवश्यक न्यूनतम अनुभव देखा गया और न ही UGC के तय Academic Performance Indicator (API) स्कोर का पालन किया गया।

CAS की आड़ में विभागीय प्रमोशन का खेल
संवाददाता,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स/ अवतार सिंह बिष्ट/उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी!
दरअसल, कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (CAS) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू एक व्यवस्था है जिसके तहत शिक्षक व्यक्तिगत पदोन्नति (personal promotion) के हकदार होते हैं। इसमें उनकी मौलिक नियुक्ति का पद रिक्त नहीं होता, और API स्कोर, न्यूनतम सेवा अवधि तथा अन्य योग्यता मानदंडों को पूरा करना अनिवार्य है। बावजूद इसके, वर्ष 2014-15 में विश्वविद्यालय ने CAS के नाम पर विभागीय रिक्तियों को भरने के लिए साक्षात्कार आयोजित किए और बड़ी संख्या में शिक्षकों को ऊंचे पद और वेतनमान दे दिए।
चार साल के अनुभव पर बन गए एसोसिएट प्रोफेसर
विश्वविद्यालय के दस्तावेज बताते हैं कि कई असिस्टेंट प्रोफेसर जिनकी नियमित सेवा अवधि महज चार साल या उससे भी कम थी, उन्हें सीधे एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर पदोन्नत कर दिया गया। जबकि नियमानुसार इस पद के लिए कम से कम पांच साल का अनुभव आवश्यक था। इतना ही नहीं, विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) की 24 दिसंबर 2014 की बैठक में अधिकांश शिक्षकों को अयोग्य पाया गया था। पर आश्चर्यजनक रूप से वही शिक्षक कुछ ही दिनों में “रातों-रात” पदोन्नत कर दिए गए।
रिक्त पदों से ज्यादा प्रमोशन
शासनादेशों के मुताबिक, वर्ष 2015 तक विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर (रीडर) के प्रमोशन हेतु कुल 19 पद ही उपलब्ध थे, लेकिन 25 शिक्षकों को पदोन्नति दे दी गई। इसी तरह प्रोफेसर पद पर भी उपलब्धता से अधिक पदोन्नतियाँ की गईं। दस्तावेजों के अनुसार बालरोग विभाग में केवल एक पद रिक्त था, लेकिन वहाँ दो लोगों को प्रमोट कर दिया गया।
DPC की बजाय इंटरव्यू का सहारा
विश्वविद्यालय की ओर से जारी विभिन्न विज्ञप्तियों, कार्यालय आदेशों, साक्षात्कार कॉल लेटर्स और प्रमोशन ऑर्डरों में हर जगह CAS का ही उल्लेख है। कहीं भी विभागीय पदोन्नति (DPC) का हवाला नहीं मिलता। जबकि विभागीय प्रमोशन (DPC) वरिष्ठता और रिक्त पदों की उपलब्धता के आधार पर की जानी चाहिए। CAS में इंटरव्यू का कोई प्रावधान नहीं है, फिर भी इन पदोन्नतियों के लिए इंटरव्यू कराए गए।
शिथिलिकरण की अनुमति भी नहीं ली गई
कई शिक्षकों के अनुभव कम होने के बावजूद उन्हें प्रमोट कर दिया गया। नियमों के मुताबिक, विशेष परिस्थितियों में शासन शिथिलिकरण (relaxation) दे सकता है, परन्तु शासन से इस बाबत कोई आदेश या अनुमति पत्र प्राप्त नहीं किया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने शिथिलिकरण के लिए शासन को पत्र तो भेजा, लेकिन शासन ने कोई अनुमति जारी नहीं की। फिर भी विश्वविद्यालय ने अपनी मनमर्जी से प्रमोशन कर दिए।
लाखों रुपये की रिश्वत के आरोप
सबसे गंभीर आरोप यह है कि इस कथित घोटाले में शिक्षकों द्वारा लाखों रुपये की रिश्वत देकर पदोन्नति हासिल करने की बातें भी सामने आई हैं। दस्तावेजों में कहा गया है कि “उस समय पदोन्नति के लिये मात्र एक योग्यता आवश्यक थी कि आपके पास कुछ लाख रुपये हों और आप विश्वविद्यालय में कार्यरत हों।”
पदों का विभागवार बंटवारा तक नहीं
मौजूदा कुलपति के ही एक पत्र के अनुसार विश्वविद्यालय में विभागवार पदों का अद्यतन बंटवारा नहीं हुआ था। ऐसे में यह सवाल और गहरा होता है कि बिना विभागवार पद संरचना और वरिष्ठता सूची के आखिर इतनी प्रमोशन कैसे और किन आधारों पर कर दी गईं?
सरकार और शासन की चुप्पी पर सवाल
यह पूरा मामला आयुर्वेद विश्वविद्यालय परिनियमावली-2015 की धारा 35 और 36 की भी अवहेलना करता है, क्योंकि वर्ष 2014-15 में ये परिनियमावलियाँ लागू ही नहीं थीं या फिर इन्हें लागू करने की प्रक्रिया चल रही थी। बावजूद इसके, विश्वविद्यालय ने CAS का हवाला देते हुए सबको प्रमोट कर डाला। सवाल यह है कि सरकार और शासन इस पूरे प्रकरण पर अब तक चुप क्यों हैं?
जांच की मांग तेज
सूत्रों की मानें तो विश्वविद्यालय के भीतर ही कई शिक्षक और कर्मचारी इस पूरी पदोन्नति प्रक्रिया की जांच की मांग कर रहे हैं। अगर दस्तावेज सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल प्रशासनिक अनियमितता नहीं बल्कि करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार का मामला बन सकता है।
क्रमशः पार्ट3




