केदारनाथ यात्रा पर मंडरा रहा बड़ा खतरा: लिंचोली से रुद्र पॉइंट तक 11 एवलांच सूट सक्रिय, वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
Kedarnath की पवित्र यात्रा एक बार फिर गंभीर चिंताओं के केंद्र में आ गई है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों द्वारा जारी हालिया रिसर्च पेपर में खुलासा हुआ है कि केदारनाथ के पैदल मार्ग पर Lincholi से Rudra Point तक का लगभग 4 से 5 किलोमीटर का इलाका एवलांच यानी हिमस्खलन की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और खतरनाक बन चुका है। वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में सक्रिय 11 एवलांच सूट चिन्हित किए हैं, जहां हर समय हिमस्खलन और भारी बोल्डरों के गिरने का खतरा बना रहता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि केदारनाथ पैदल मार्ग का यह हिस्सा भविष्य में किसी बड़ी त्रासदी का कारण बन सकता है। रिसर्च के अनुसार, इन एवलांच जोन में ऊपर से लगातार बर्फ, चट्टानें और विशाल बोल्डर नीचे गिरते रहते हैं। कई बार यह हिमस्खलन इतनी तेजी से आता है कि लोगों को संभलने का अवसर तक नहीं मिलता। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने केदारनाथ रोपवे परियोजना पर तेजी से काम करने और पुराने पैदल मार्ग को पुनः शुरू करने की सिफारिश की है।
हिमालयी क्षेत्र पर बढ़ता दबाव, बदल रहा इकोसिस्टम
रिपोर्ट में कहा गया है कि हर वर्ष केदारनाथ आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। लाखों की संख्या में पहुंचने वाले तीर्थ यात्रियों के कारण हिमालयी क्षेत्र पर भारी दबाव पड़ रहा है। इससे वहां का प्राकृतिक संतुलन और इकोसिस्टम तेजी से प्रभावित हो रहा है। बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों पर मानव गतिविधियों का दबाव और अनियंत्रित इंफ्रास्ट्रक्चर विकास हिमस्खलनों की घटनाओं को और अधिक गंभीर बना रहे हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार अप्रैल से जून के बीच ऊपरी इलाकों में हल्की बर्फ जमी रहती है, जिससे एवलांच का खतरा लगातार बना रहता है। इसके बावजूद कई तीर्थ यात्री एवलांच प्रभावित क्षेत्रों में रुककर सेल्फी लेते, वीडियो बनाते और मौज-मस्ती करते दिखाई देते हैं। कई बार पुलिस और प्रशासन यात्रियों को इन खतरनाक क्षेत्रों से दूर रहने की चेतावनी देता है, लेकिन लोग जोखिम उठाने से पीछे नहीं हटते।
हर मिनट गुजरते हैं 100 से 200 श्रद्धालु
रिसर्च पेपर में यह भी बताया गया है कि लिंचोली से आगे के हिस्से में एवलांच की लंबाई लगभग डेढ़ किलोमीटर तक और चौड़ाई 100 से 200 मीटर तक हो सकती है। अनुमान है कि हर मिनट लगभग 100 से 200 तीर्थ यात्री इन एवलांच प्रभावित क्षेत्रों से होकर गुजरते हैं। यदि किसी समय बड़ा हिमस्खलन आ जाए तो भारी जनहानि से इनकार नहीं किया जा सकता।
वैज्ञानिकों ने चेताया है कि दो अलग-अलग हिमस्खलन मार्ग आसपास की धाराओं में मिलकर एक बड़े और अधिक विनाशकारी प्रवाह का रूप ले लेते हैं। इससे खतरा कई गुना बढ़ जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यटन, तीर्थयात्रा और सड़क एवं भवन निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियों ने हिमस्खलनों की तीव्रता और आवृत्ति दोनों बढ़ा दी हैं।
रोपवे परियोजना और पुराने मार्ग को लेकर सुझाव
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केदारनाथ रोपवे परियोजना को अब प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही, पुराने पैदल मार्ग को पुनः उपयोग में लाने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार पुराना मार्ग अपेक्षाकृत सुरक्षित था क्योंकि वह पूर्व दिशा में स्थित था, जहां पर्याप्त धूप पड़ती थी और ग्लेशियर नहीं थे।
दरअसल, वर्ष 2013 की भीषण केदारनाथ आपदा के बाद पुराना पैदल मार्ग Rambara तक पूरी तरह तबाह हो गया था। इसके बाद वर्तमान नया पैदल मार्ग तैयार किया गया, जो दक्षिण दिशा की ओर स्थित है। इस मार्ग पर धूप कम पड़ती है और ग्लेशियरों की मौजूदगी अधिक है, जिसके कारण यहां एवलांच का खतरा लगातार बना रहता है।
उत्तराखंड में पहले भी ले चुके हैं सैकड़ों जानें
उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में एवलांच कोई नई घटना नहीं है। पिछले कई दशकों में हिमस्खलनों ने भारी तबाही मचाई है और सैकड़ों लोगों की जान ली है।
वर्ष 2019 में Nanda Devi क्षेत्र में हुए हिमस्खलन में कई लोगों की मौत हुई थी।
वर्ष 2021 में Mount Trishul के पास हुए एवलांच में सात लोगों ने जान गंवाई।
23 अप्रैल 2021 को भारत-तिब्बत सीमा के पास Girthi Ganga Valley में आए एवलांच ने सीमा सड़क संगठन यानी Border Roads Organisation के शिविर को तबाह कर दिया था, जिसमें 16 लोगों की मौत हो गई थी।
अक्टूबर 1998 में Hemkund Sahib मार्ग पर अतालाकोटी क्षेत्र में हुए हिमस्खलन में 27 तीर्थ यात्रियों की मौत हुई थी।
23 जून 2008 को इसी क्षेत्र में एक अन्य एवलांच में आठ लोगों ने अपनी जान गंवाई।
4 अक्टूबर 2022 को Draupadi Ka Danda चोटी के पास हुए भीषण हिमस्खलन में Nehru Institute of Mountaineering के 27 पर्वतारोहियों और प्रशिक्षुओं की दर्दनाक मौत हो गई थी।
सतत विकास और वैज्ञानिक योजना की जरूरत
वैज्ञानिकों ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कहा है कि केदारनाथ जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में बिना वैज्ञानिक अध्ययन के विकास कार्य भविष्य में बड़े संकट को जन्म दे सकते हैं। रिपोर्ट में स्थान-विशेष के अनुसार खतरे की मैपिंग, एवलांच जोखिम का सक्रिय प्रबंधन और सतत विकास नीति अपनाने पर जोर दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते एवलांच प्रभावित क्षेत्रों में वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो भविष्य में केदारनाथ यात्रा के दौरान कोई बड़ी त्रासदी सामने आ सकती है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस धाम में सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच संतुलन बनाना अब सरकार और प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।

