उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र की धराली घाटी में आई भीषण आपदा ने जहां एक ओर जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया, वहीं दूसरी ओर इससे जुड़ी एक भ्रामक खबर ने सूचनात्मक ईमानदारी और जनप्रतिनिधियों की संवेदनशीलता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

6 अगस्त 2025 को एबीपी न्यूज़ पर एक ख़बर प्रसारित हुई, जिसमें यह दावा किया गया कि लोकसभा सांसद महोदय ने धराली की भीषण त्रासदी को ‘आम घटना’ बताया है। इस खबर ने जनमानस में गुस्सा और भ्रम दोनों पैदा कर दिया। लेकिन आज स्वयं सांसद महोदय ने इस रिपोर्ट का खंडन करते हुए इसे न केवल “भ्रामक” बल्कि “पूरी तरह असत्य और निराधार” बताया है।
सांसद द्वारा जारी बयान में यह स्पष्ट किया गया है कि उन्होंने कभी भी धराली आपदा को सामान्य या मामूली नहीं बताया। उलटे, उन्होंने इसे “एक गंभीर मानवीय संकट” माना है और बताया कि एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, स्थानीय प्रशासन तथा जांबाज़ नागरिक राहत कार्यों में दिन-रात जुटे हुए हैं। वे स्वयं स्थिति की निगरानी कर रहे हैं और ज़रूरी संसाधन उपलब्ध कराने में सक्रिय हैं।
लेकिन प्रश्न यह है – यह बयान इतनी देर से क्यों आया?धराली त्रासदी के साथ-साथ हल्द्वानी, किच्छा और रुद्रपुर जैसे मैदानी क्षेत्रों में भी जलभराव और जनधन की हानि का संकट गहराया हुआ है। रुद्रपुर में एक 16 वर्षीय किशोर की दुखद डूबकर मौत ने प्रशासन और जनता दोनों को झकझोर कर रख दिया। ऐसे कठिन समय में जनता को उम्मीद होती है कि उनका चुना हुआ प्रतिनिधि हर संकटग्रस्त क्षेत्र में स्वयं उपस्थित हो, लेकिन सांसद महोदय ने आपदा के कई दिन बाद सिर्फ एक “खुद को सही साबित करने वाली सोशल मीडिया पोस्ट” साझा की, वो भी तब जब मीडिया में उनके बयान को लेकर सवाल उठे।
यह न केवल राजनीतिक असंवेदनशीलता का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि आपदा के समय “मैदान में” नहीं बल्कि “मीडिया मैनेजमेंट” में अधिक व्यस्त रहते हैं।
मीडिया की भी भूमिका सवालों के घेरे में है?यदि वाकई सांसद ने ऐसा कोई असंवेदनशील बयान नहीं दिया, तो सवाल उठता है – एबीपी न्यूज़ जैसी बड़ी संस्था ने बिना तथ्य की पुष्टि के यह रिपोर्ट क्यों चलाई? क्या यह टीआरपी की लालसा थी या किसी एजेंडे का हिस्सा?
मीडिया की सबसे बड़ी पूंजी है – विश्वसनीयता। आपदा के समय यदि मीडिया ही अफवाहों को हवा देने लगे, तो वह राहत कार्यों में बाधा बन सकती है। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि जनहित के साथ अन्याय है।
जनता की अपेक्षाएं?धराली से लेकर रुद्रपुर तक की जनता को राहत, पुनर्वास और आश्वासन की आवश्यकता है – वह भी दिखावे से नहीं, मूल्य आधारित सेवा भाव से। सोशल मीडिया पोस्ट या चैनलों पर सफाई देना इस आपदा का समाधान नहीं है।
सांसद महोदय को चाहिए कि वह धरातल पर उतरें, आपदा क्षेत्रों का दौरा करें, पीड़ित परिवारों से मिलें, और सभी संसाधनों को तत्परता से जुटाकर जनता को यह विश्वास दिलाएं कि वे अकेले नहीं हैं।
इस संपादकीय का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति या संस्था को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही और मीडिया की जिम्मेदारी की याद दिलाना है। एक ओर जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि वे संकट की घड़ी में “उपस्थिति” से भरोसा बनाए रखें, वहीं मीडिया को भी सत्य, संवेदना और सटीकता की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए।
आपदा में असहमति नहीं, संवेदना और सेवा की आवश्यकता है। यही वह समय है जब हम सबको मिलकर उत्तराखंड की मिट्टी, जीवन और भविष्य की रक्षा करनी है – राजनीति या भ्रम नहीं, बल्कि जनसेवा और ईमानदार संवाद के माध्यम से।

