

छठ मैया के बारे में आध्यात्मिक दृष्टि से बात करें तो यह पर्व भारतीय सनातन संस्कृति के सबसे प्राचीन, शुद्ध और वैज्ञानिक पर्वों में से एक है। छठ पूजा केवल लोक आस्था नहीं, बल्कि सूर्य उपासना की एक सर्वोच्च परंपरा है, जिसमें प्रकृति, जल, वायु, अग्नि और मानव के बीच संतुलन का संदेश छिपा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
छठ मैया का आध्यात्मिक महत्व
छठ पूजा सूर्य देव और उनकी बहन उषा (छठ मैया) की उपासना का पर्व है।
‘छठ’ का अर्थ ही है छठा दिन — दीपावली के छठे दिन मनाया जाने वाला यह व्रत चार दिन तक चलता है, जिसमें शरीर और मन की शुद्धि, संयम और संकल्प का विशेष स्थान है।
आध्यात्मिक रूप से, सूर्य देव जीवन ऊर्जा के स्रोत माने गए हैं। सूर्य के प्रकाश से ही प्राण वायु (ऑक्सीजन), वर्षा और खाद्य शृंखला संतुलित रहती है। छठ व्रत में सूर्य की उपासना के साथ-साथ नदी, तालाब या घाट का जल भी पवित्र माध्यम बनता है, जो जीवन की निरंतरता का प्रतीक है।
व्रत का संदेश — संयम और संकल्प
छठ पूजा के चार दिनों का हर चरण मानव जीवन के आध्यात्मिक उत्थान का संदेश देता है:
- नहाय खाय – शरीर की शुद्धि का प्रतीक।
- खरना – मन की शुद्धि और भोजन में सादगी का प्रतीक।
- संध्या अर्घ्य – सूर्य की उदीयमान ऊर्जा को स्वीकारना।
- प्रातः अर्घ्य – नवीन जीवन की सुरुआत का प्रतीक।
इस पूजा में दिखावा नहीं बल्कि निश्छल भक्ति, त्याग और संयम का अभ्यास है। यह मानव के भीतर अंतर्निहित आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करती है।
उत्तराखंड के संदर्भ में छठ पूजा?उत्तराखंड में हाल के वर्षों में छठ पूजा का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। मैदानी क्षेत्र जैसे रुद्रपुर, काशीपुर, हल्द्वानी, और हरिद्वार में पूर्वांचल से आए लोगों के साथ-साथ स्थानीय कुमाऊं और गढ़वाल के लोग भी अब श्रद्धा से छठ मनाने लगे हैं।
रुद्रपुर के घाटों — ट्रांजिट कैम्प, झील पार्क, और कैलाश कॉलोनी घाट पर हर साल हजारों भक्त छठ मैया की आराधना करते हैं। यहां लोग कहते हैं कि छठ के संध्या अर्घ्य के समय सूर्य की किरणें जब जल पर पड़ती हैं, तो वह क्षण देवभूमि की सच्ची पवित्रता का अनुभव कराता है।
यह पर्व यहां गंगा-जमूनी संस्कृति का जीवंत प्रतीक बन चुका है, जहां उत्तराखंड की लोक परंपरा और बिहार-पूर्वांचल की आस्था मिलकर एक सामाजिक एकता का संदेश देती हैं।
छठ मैया की कृपा — सूर्य की ऊर्जा का वरदान?कहा गया है कि छठ मैया सूर्य की सहज ऊर्जा की रूपा हैं। उनकी उपासना से रोगों का निवारण, संतान सुख, और मन की शांति प्राप्त होती है।
छठ व्रती का संकल्प “मन वचन कर्म से पवित्र रहना” है — यही सच्चे सूर्योपासक का मार्ग है।
उत्तराखंड के संदेश के साथ छठ का समापन
देवभूमि उत्तराखंड में छठ अब केवल एक पूर्वांचली परंपरा नहीं रही, बल्कि प्रकृति और मानव के मिलन का लोकपर्व बन गया है। यह आस्था का ऐसा अभियान है जो नदियों को संरक्षण, पर्यावरण को संवर्धन और समाज को संयम का संदेश देता है।




