छठ मैया की आराधना: रुद्रपुर घाट पर एकता, अध्यात्म और भारतीय संस्कृति का संगम?(पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, विधायक शिव अरोड़ा और एडवोकेट दिवाकर पांडे के सान्निध्य में रुद्रपुर में छठ पर्व का आध्यात्मिक उत्सव) एडवोकेट दिवाकर पांडे और परिवार — छठ पर्व में नए युग की शुरुआत

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रुद्रपुर की सुबह जब छठ मैया की आरती के साथ सुनहरे सूरज की किरणें झील और तालाबों के जल पर बिखर रही थीं, तब एक अद्भुत दृश्य उपस्थित था — राजनीति की सीमाएँ टूट चुकी थीं, और अध्यात्म, आस्था और एकता की भावना ने सबको एक सूत्र में बांध दिया था। इस पावन क्षण पर रुद्रपुर विधायक शिव अरोड़ा और पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल एक साथ छठ घाट पर उपस्थित थे। दोनों ने मिलकर छठ मैया की आराधना की, उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया और नगरवासियों के लिए सुख-समृद्धि की प्रार्थना की।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था — यह उत्तराखंड की धरती पर सामाजिक समरसता, राजनीतिक परिपक्वता और भारतीय आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक था।

छठ मैया: तपस्या और सत्य की आराधना?छठ पर्व भारत के उन सबसे प्राचीन अनुष्ठानों में से एक है जिसका उल्लेख ऋग्वेद और सामवेद में मिलता है। यह पर्व सूर्य देव की उपासना के साथ-साथ उनकी बहन छठ देवी (उषा या शष्ठी माता) के प्रति श्रद्धा का पर्व है। छठ का अर्थ होता है “षष्ठी” — यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की छठी तिथि, जब भक्तजन निर्जल उपवास रखते हुए सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करते हैं।

कहा जाता है कि इस दिन छठ मैया, जो कि सूर्य की ऊर्जा और मातृत्व की प्रतीक हैं, अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। यह पर्व केवल भक्ति नहीं, बल्कि संयम, तपस्या और आत्मसंयोजन का संदेश देता है।

रुद्रपुर के घाटों पर जब महिलाओं ने मिट्टी के घाटों पर दीप जलाए, फल और ठेकुआ के प्रसाद से टोकरी सजाई, तब वहां केवल बिहार या पूर्वांचल की संस्कृति नहीं थी — वह सम्पूर्ण भारत की आत्मा का उत्सव था।

शिव अरोड़ा और राजकुमार ठुकराल का मिलन — राजनीति से परे एक आस्था का क्षण

रुद्रपुर की राजनीति लंबे समय से अपने अलग-अलग रंगों और विमर्शों के लिए जानी जाती रही है। परंतु छठ पर्व के अवसर पर जब वर्तमान विधायक शिव अरोड़ा और पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल एक ही घाट पर साथ खड़े दिखे, तब यह एक सकारात्मक और प्रेरणादायी संदेश था —
कि जब बात धर्म, संस्कृति और लोकआस्था की हो, तब सभी मतभेद गौण हो जाते हैं।

दोनों नेताओं ने सूर्यदेव को अर्घ्य देकर रुद्रपुर की समृद्धि और शांति की कामना की। उन्होंने वहां उपस्थित जनसमूह से संवाद करते हुए कहा कि छठ पर्व केवल एक क्षेत्रीय पर्व नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय एकता और अध्यात्म का प्रतीक है।

राजकुमार ठुकराल ने कहा — “छठ मैया की पूजा आत्मशुद्धि का पर्व है, यह हमें विनम्र बनाती है और सिखाती है कि जीवन का वास्तविक अर्थ सेवा और संयम में है।”
वहीं विधायक शिव अरोड़ा ने कहा — “रुद्रपुर की धरती अब विविधता का संगम बन चुकी है। यहां हर धर्म और संस्कृति का आदर किया जाता है। छठ पूजा इसका जीवंत उदाहरण है।”

दोनों नेताओं का यह मिलन इस बात का प्रतीक है कि जब हम अपनी परंपराओं को साझा करते हैं, तो समाज और राजनीति दोनों में सद्भाव और सकारात्मकता का प्रकाश फैलता है।

एडवोकेट दिवाकर पांडे और परिवार — छठ पर्व में नए युग की शुरुआत
?इस वर्ष छठ पर्व पर एडवोकेट दिवाकर पांडे और उनका परिवार भी घाट पर उपस्थित रहा। उन्होंने पूरे विधि-विधान से सूर्यदेव को अर्घ्य दिया और नगरवासियों को शुभकामनाएं दीं।

एडवोकेट पांडे मूलतः पार्वती क्षेत्र से हैं, और उन्होंने इस पर्व को केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकीकरण और जनजागरण का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा —> “हम उत्तराखंडवासी अब इस पर्व को केवल देखने नहीं, जीने लगे हैं। छठ अब बिहारियों का पर्व नहीं रहा — यह भारत की आत्मा का पर्व बन चुका है।”

एडवोकेट दिवाकर पांडे सहित कल कई अन्य पर्वतीय मूल के परिवार अब इस परंपरा को अपनाने लगे हैं। रुद्रपुर, किच्छा, बाजपुर, हरिद्वार और हल्द्वानी जैसे शहरों से लेकर जल्द ही यह परंपरा उत्तराखंड के अंतिम गांव तक पहुंचेगी।

जब पहाड़ की नदियों के तट पर छठी मइया की पूजा होगी, तब यह पर्व वास्तव में भारत की आत्मा को हिमालय की ऊँचाइयों तक पहुँचा देगा।”

उत्तराखंड में छठ का विस्तार: आस्था से एकता तक का सफर?
उत्तराखंड का समाज स्वभाव से ही धार्मिक और आध्यात्मिक रहा है। यहां हर पर्व में प्रकृति और पर्यावरण का विशेष स्थान है — चाहे वह गंगा दशहरा हो, फूलदेई हो, या हरेला।

अब छठ पूजा इस सांस्कृतिक श्रृंखला में नया अध्याय जोड़ रही है।
रुद्रपुर, जसपुर, किच्छा और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्र अब उत्तराखंड के ‘छठ प्रदेश’ के रूप में उभर रहे हैं।

पिछले वर्षों में यहां सैकड़ों की संख्या में घाट तैयार किए गए हैं। महिलाओं ने सादगी और श्रद्धा से उपवास रखा, पुरुषों ने घाटों की सजावट और स्वच्छता में सहयोग किया। यह पर्व अब समुदाय और परिवारों के पुनर्मिलन का पर्व बन चुका है।

वैदिक ग्रंथों में छठ का रहस्य!छठ पर्व का उल्लेख महाभारत और रामायण दोनों में मिलता है।
कहा जाता है कि जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे, तब माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्यदेव की उपासना की थी। वहीं महाभारत में कुंती ने भी सूर्यदेव की आराधना कर कर्ण को जन्म दिया था।

वैदिक परंपरा में सूर्यदेव को “प्रत्याक्ष देवता” कहा गया है — जो हमें प्रतिदिन दिखाई देते हैं।
छठ पर्व में व्रती जब जल में खड़े होकर सूर्य की आराधना करता है, तब वह शरीर, मन और आत्मा तीनों को संतुलित करने की साधना करता है।

इस पर्व का हर नियम — चाहे वह निर्जल उपवास हो या मिट्टी के बर्तन का प्रयोग — प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
रुद्रपुर के घाट — संस्कृति और सौहार्द का प्रतीक।
इस वर्ष रुद्रपुर के छठ घाटों का दृश्य विशेष रहा। शहर के विभिन्न मोहल्लों, कॉलोनियों और संस्थाओं ने मिलकर घाटों को सजाया।
कई स्वयंसेवी संगठनों ने स्वच्छता अभियान चलाए, घाटों पर सुरक्षा और प्रकाश व्यवस्था सुनिश्चित की गई।

सबसे प्रेरक दृश्य यह रहा कि हिंदू, सिख, मुस्लिम और ईसाई समुदायों के लोग भी श्रद्धा से उपस्थित थे।
यही वह भाव है जो भारत को एक बनाता है — धर्म नहीं, आस्था जोड़ती है।

एडवोकेट दिवाकर पांडे जैसे जागरूक लोगों के प्रयासों से अब यह परंपरा पर्वतीय समाज में भी प्रवेश कर रही है।
जहाँ कभी केवल लोक पर्व जैसे “फूलदेई” और “हरेला” मनाए जाते थे, अब वहां छठ पूजा की भी लौ जल रही है।

यह परंपरा पहाड़ की नदियों — कोसी, गोरी, मंदाकिनी और नंदिनी — के किनारे पहुंचने लगी है।
यह केवल धार्मिक विस्तार नहीं है, बल्कि भारत की साझा संस्कृति का पुनर्जन्म है।

छठ पर्व यह सिखाता है कि सूर्य की किरणें किसी जाति, वर्ग या भाषा में भेद नहीं करतीं।
यह पर्व उस भावना का प्रतीक है जिसमें सूर्य की रोशनी सभी को समान रूप से आलोकित करती है।

रुद्रपुर में इस बार जब राजकुमार ठुकराल और शिव अरोड़ा ने साथ खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दिया, और एडवोकेट दिवाकर पांडे ने छठ मैया की पूजा करते हुए सबको शुभकामनाएं दीं, तब यह दृश्य भारत की एकता की गवाही दे रहा था।

यह संदेश था कि राजनीति से ऊपर उठकर जब समाज संस्कृति को अपनाता है, तो वहां विकास, सद्भाव और शांति का मार्ग खुलता है।

छठ मैया की रोशनी से आलोकित उत्तराखंड
आज रुद्रपुर केवल औद्योगिक शहर नहीं रहा, बल्कि एक आध्यात्मिक केंद्र बनता जा रहा है।
छठ पूजा के माध्यम से यहां की जनता ने यह साबित कर दिया कि उत्तराखंड की आत्मा केवल देवभूमि नहीं, बल्कि समरसता की भूमि भी है।

जब छठ मैया के गीत पहाड़ों तक पहुंचेंगे, जब सूर्यदेव की आराधना गढ़वाल और कुमाऊं के घाटों से भी होगी — तब यह पर्व भारत की अखंड संस्कृति का सबसे उज्ज्वल प्रतीक बन जाएगा।

और उस दिन शायद हर उत्तराखंडी कहेगा —

हम सब छठ मैया के भक्त हैं, क्योंकि हम सब सूर्य की संतान हैं।”


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