

पिथौरागढ़ जनपद में खाद्य विभाग की लापरवाही ने आम उपभोक्ताओं को भारी संकट में डाल दिया है। जिन गरीब परिवारों को सरकार की योजनाओं के तहत सस्ते गल्ले की दुकानों से खाद्यान्न मिलना चाहिए था, वे पिछले दो महीनों से राशन से वंचित हैं। सितंबर और अक्टूबर माह का राशन न मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ पिथौरागढ़ मुख्यालय के आसपास के इलाकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
राज्य आंदोलनकारी संगठन के केंद्रीय महामंत्री बसंत भट्ट और पूर्व सैनिक संगठन एवं हिमालयन फाउंडेशन से जुड़े समाजसेवी राजेश भट्ट ने सही सवाल उठाया है कि विभागीय उदासीनता का खामियाजा आखिर गरीब जनता क्यों भुगते? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘निशुल्क राशन योजना’ और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ‘गरीब हितैषी संकल्प’ के बावजूद अगर जनता तक राशन नहीं पहुंच रहा है, तो यह शासन-प्रशासन की गंभीर विफलता है।
यह तथ्य चिंताजनक है कि बीते तीन महीनों से विक्रेता संगठन की हड़ताल के चलते राशन वितरण बाधित रहा और अब जबकि हड़ताल समाप्त हो चुकी है, तब भी विभाग द्वारा वितरण में कटौती या देरी की जा रही है। यह सीधा संकेत है कि सिस्टम में संवेदनशीलता की कमी है। राशन जैसी मूलभूत सुविधा को लेकर विभाग की यह ढिलाई न केवल गरीबों के साथ अन्याय है बल्कि राज्य की छवि पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
उल्लेखनीय है कि जब उत्तराखंड अपनी राज्य स्थापना की रजत जयंती मना रहा है, तब “राज्य निर्माण की भावना”—जो जनता के अधिकारों और समान वितरण पर आधारित थी—वह प्रशासनिक उपेक्षा के बोझ तले दबती जा रही है। कांटे तोली क्षेत्र सहित अनेक जगहों पर अब तक दो माह का राशन नहीं दिया गया है, और जनता विभाग के दरवाजे खटखटा-खटखटा कर थक चुकी है।
बसंत भट्ट और राजेश भट्ट ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही सभी पात्र उपभोक्ताओं को उनका खाद्यान्न नहीं दिया गया, तो आंदोलन और चक्का जाम अपरिहार्य होगा। यह चेतावनी सिर्फ एक संगठन की नहीं बल्कि पूरे जनपद की पीड़ा की आवाज है।
अब सवाल यह है — क्या सरकार और जिला पूर्ति विभाग इस आवाज को सुनेगा, या फिर जनता को एक बार फिर “विभागीय लापरवाही” के बोझ तले जीना पड़ेगा?




