

रुद्रपुर कलेक्ट्रेट परिसर में उपनल कर्मियों की छापेमारी और नारेबाजी प्रदेश सरकार के प्रति बढ़ते असंतोष का स्पष्ट संकेत है। “समान कार्य के लिए समान वेतन” जैसी मूलभूत मांगें आज भी अनसुनी हैं, जबकि ये कर्मचारी शासन की रीढ़ माने जाते हैं। स्थायीकरण की अनदेखी और असुरक्षित सेवा शर्तें सरकार की संवेदनहीनता को उजागर करती हैं। उपनल कर्मियों की यह एकजुटता अब चेतावनी बन चुकी है — यदि समय रहते उनकी मांगों पर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह असंतोष राज्यव्यापी आंदोलन का रूप ले सकता है। सत्ता को अब संवाद और समाधान दोनों की आवश्यकता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
रुद्रपुर, 13 नवम्बर 2025 —उपनल/संविदा आउटसोर्स वाहन चालक संघ उत्तराखण्ड के बैनर तले आज रुद्रपुर कलेक्ट्रेट परिसर में कार्यरत उपनल कर्मियों ने एकजुटता का परिचय देते हुए छापेमारी अभियान चलाया। इस दौरान कई उपनल कर्मचारी कार्यालयों में कार्यरत पाए गए, जिन्हें संघ के पदाधिकारियों ने भविष्य में अपने अधिकारों व हितों की रक्षा के लिए संघ के साथ जुड़ने को प्रेरित किया।
संघ के जिला अध्यक्ष श्री मनोज कुमार (मो. 9927348710) के संरक्षण में आयोजित इस कार्यक्रम में उपस्थित पदाधिकारियों ने कहा कि उपनल कर्मियों के साथ निरंतर भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है। समान कार्य के लिए असमान वेतन, स्थायीकरण की अनदेखी और अनुबंधित कर्मचारियों के साथ असुरक्षित सेवा शर्तें अब बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।
कलेक्ट्रेट परिसर में कर्मियों ने सरकार की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की और मांग की कि उपनल कर्मचारियों को नियमित सेवा का दर्जा दिया जाए तथा समान कार्य के लिए समान वेतन की नीति लागू की जाए।
इस अवसर पर संघ के जिला महामंत्री यो. कुलदीप कुमार, उपाध्यक्ष महेश कार्की, संरक्षक कुन्दन सिंह बोरा, संगठन मंत्री नीरज रौतेला, सलाहकार अतर सिंह, मीडिया प्रभारी संजीव कुमार, कोषाध्यक्ष कमान सिंह, पूर्व सैनिक करम सिंह दानू ,गणेश चन्द्र सहित बड़ी संख्या में उपनल कर्मी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में सभी कर्मचारियों ने एक स्वर में कहा कि आने वाले समय में यदि उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा।
संपादकीय:उपनल कर्मियों की पुकार — संवेदना और संघर्ष का संगम,रुद्रपुर कलेक्ट्रेट परिसर में उपनल कर्मियों का छापेमारी अभियान केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस असंतोष की आवाज़ थी जो वर्षों से प्रशासनिक दीवारों के भीतर दबाई जा रही है। समान कार्य के बावजूद असमान वेतन और अस्थायी सेवा शर्तों ने इन कर्मियों को मानसिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर तोड़ा है।
नगर निगम रुद्रपुर में कार्यरत पूर्व सैनिक करम सिंह दानू की भावनात्मक अपील ने इस आंदोलन को एक मानवीय स्वर दिया। देश की सीमाओं पर सेवा कर चुके इस सिपाही की यह याचना कि “हमें सम्मानपूर्वक स्थायी दर्जा दिया जाए”, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नाम एक गूंजती हुई पुकार है। दानू की पीड़ा उन सैकड़ों उपनल कर्मियों की सामूहिक वेदना है जो अपने ही राज्य में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
देहरादून के परेड ग्राउंड में भी उपनल कर्मी धरने पर डटे हैं — उम्मीद की डोर थामे हुए कि सरकार संवेदनशील बनेगी। रुद्रपुर की यह छापेमारी सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि एक प्रतीक है — “अब अन्याय नहीं सहेंगे” की घोषणा। अगर शासन ने इस आवाज़ को अनसुना किया, तो यह आंदोलन आने वाले समय में उत्तराखंड की नई सामाजिक चेतना का केंद्र बन सकता है।




