यूएमसी पंजीकरण बिना ‘विशेषज्ञ डॉक्टरों’ की तैनाती! स्वास्थ्य विभाग की भारी लापरवाही उजागर – आरटीआई में बड़ा खुलासा

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देहरादून/भीमताल:उत्तराखण्ड स्वास्थ्य विभाग पर गंभीर आरोप लगे हैं। आरटीआई से उजागर हुआ है कि चिकित्सा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा अनुभाग-1 द्वारा 28 अप्रैल 2025 को जारी आदेश के तहत पीएमएचएस संवर्ग के 45 चिकित्सकों को विशेषज्ञ डॉक्टर के रूप में तैनात किया गया, लेकिन इनमें से अधिकांश के पास उस समय विशेषज्ञ पद हेतु आवश्यक योग्यता या उत्तराखण्ड मेडिकल काउंसिल (यूएमसी) में पंजीकरण ही नहीं था।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

आरटीआई एक्टिविस्ट चन्द्रशेखर जोशी ने इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच और दोषियों पर कार्यवाही की मांग करते हुए सचिव, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग को विस्तृत पत्र भेजा है। उन्होंने मामले की प्रतियां मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड मेडिकल काउंसिल, राज्यपाल, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी भेजी हैं।


क्या है बड़ा खुलासा?

✔ तैनाती आदेश – 28 अप्रैल 2025

महानिदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य के पत्र के आधार पर 45 चिकित्सकों को विशेषज्ञ के रूप में नियुक्ति दी गई थी।

✔ आरटीआई में सामने आया सच

महानिदेशक, स्वास्थ्य कार्यालय से 3 दिसंबर 2025 को मिली जानकारी के अनुसार—

  • 45 में से केवल 10 चिकित्सक ही 25 अप्रैल 2025 को विशेषज्ञ तैनाती के लिए योग्य थे।
  • लगभग 08 चिकित्सक दिसंबर 2025 तक (8 माह बाद भी) विशेषज्ञ पद हेतु योग्यता या पंजीकरण नहीं रखते।
  • 02 चिकित्सक अभी तक पीजी भी उत्तीर्ण नहीं कर पाए हैं।
  • कई ‘विशेषज्ञ’ 55–93 दिनों तक बिना पंजीकरण के विशेषज्ञ के रूप में मरीज देख रहे थे।

एनएमसी और यूएमसी अधिनियमों का खुला उल्लंघन

कानून स्पष्ट कहता है—

  • एनएमसी एक्ट 2019 धारा 34—बिना पंजीकरण कोई भी चिकित्सक “स्पेशलिस्ट” के रूप में कार्य नहीं कर सकता।
  • यूएमसी एक्ट 2002—बिना राज्य पंजीकरण मेडिकल प्रैक्टिस दंडनीय अपराध है।

इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने अयोग्य/अपंजीकृत चिकित्सकों को विशेषज्ञ बनाकर जिला और उप-जिला अस्पतालों में पोस्टिंग दे दी।


एक वास्तविक घटना ने बढ़ाई चिंता

सूची में दर्ज डॉ. नेहा सिद्धीकी को स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के रूप में सितारगंज उप-जिला अस्पताल में नियुक्त किया गया।
स्थानीय समाचारों में उनके विशेषज्ञ के रूप में स्वागत की खबरें भी प्रकाशित हुईं।

लेकिन आरटीआई के अनुसार—

  • उनका पीजी पंजीकरण तैनाती के समय नहीं था,
  • वे विशेषज्ञ पद की पात्र ही नहीं थीं।

इस बीच, एक गर्भवती महिला के इलाज के दौरान गंभीर चिकित्सकीय त्रुटि हुई और उसकी मृत्यु हो गई, जिससे पूरा मामला और भी संवेदनशील हो गया है।


जनता के स्वास्थ्य अधिकारों पर कुठाराघात — जोशी

आरटीआई एक्टिविस्ट चन्द्रशेखर जोशी ने इसे—

  • “जनता के स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन”
  • “प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण”

बताया है।

उनका कहना है कि—

“अयोग्य और अपंजीकृत डॉक्टरों को विशेषज्ञ बनाकर भेजना सीधे तौर पर जनहित के साथ खिलवाड़ है। यह केवल नियमों का नहीं, मरीजों की सुरक्षा का गंभीर प्रश्न है।”


मांगी गई प्रमुख कार्रवाइयाँ

  1. शासनादेश दिनांक 28 अप्रैल 2025 की उच्चस्तरीय जांच।
  2. नियमविरुद्ध नियुक्ति करने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई।
  3. वर्तमान में तैनात सभी अपंजीकृत/अयोग्य विशेषज्ञों की तत्काल सेवा समाप्ति/तैनाती निरस्तीकरण।
  4. भविष्य में विशेषज्ञ तैनाती से पहले यूएमसी/एनएमसी पंजीकरण सत्यापन अनिवार्य किया जाए।

जनता में रोष, सरकार पर दबाव बढ़ा

इस खुलासे ने उत्तराखंड के स्वास्थ्य तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीण और पर्वतीय अस्पतालों में ऐसे “बिना पात्रता वाले विशेषज्ञों” की नियुक्ति से जनहानि का खतरा बढ़ने का आरोप लग रहा है।

अब देखना यह है कि स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर प्रकरण पर क्या कदम उठाता है।



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