

रुद्रपुर,उत्तराखंड को बने दो दशक से अधिक हो चुके हैं, लेकिन आज भी आम नागरिक की जिंदगी का बड़ा हिस्सा लाइन में खड़े रहने में ही गुजर रहा है। कभी आधार अपडेट के लिए, कभी राशन कार्ड की केवाईसी के लिए, कभी पेंशन सत्यापन, तो कभी गैस एजेंसी की नई शर्तों के लिए। रुद्रपुर नगर निगम के आवास विकास क्षेत्र में स्थित नोज कार्यालय का जन सेवा केंद्र इस सच्चाई का सबसे जीवंत और पीड़ादायक उदाहरण बन चुका है—जहाँ सुविधा के नाम पर केवल औपचारिकता बची है और आम जनता के हिस्से में केवल इंतज़ार।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सुबह से शाम तक लाइन, फिर भी काम अधूरा
हर सुबह इस जन सेवा केंद्र के बाहर लंबी कतारें लग जाती हैं। बुज़ुर्ग, महिलाएं, दिव्यांग, मजदूर—सभी अपने-अपने कागज़ संभाले खड़े रहते हैं, इस उम्मीद में कि आज शायद उनका आधार अपडेट हो जाएगा, नाम ठीक हो जाएगा, फिंगरप्रिंट मिल जाएगा या कोई प्रमाण पत्र बन जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि दिन भर की मशक्कत के बाद भी गिनती के 20–25 लोगों का ही काम हो पाता है, जैसा कि खुद डाटा ऑपरेटर ने हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स को बताया।
डाटा ऑपरेटर का यह कथन—“24 तारीख तक बुकिंग फुल है, उसके बाद देखा जाएगा”—अपने आप में व्यवस्था की पोल खोल देता है। सवाल यह नहीं है कि बुकिंग फुल क्यों है, सवाल यह है कि क्या एक पूरे नगर निगम क्षेत्र के लिए इतना कमजोर सिस्टम पर्याप्त है?
“अभी नाम चेंज नहीं होगा… देखेंगे…”
लाइव वीडियो में डाटा ऑपरेटर साफ कहते दिखाई देते हैं कि “अभी आधार में नाम चेंज नहीं होगा”, “फिंगरप्रिंट अपडेट के लिए दो दिन बाद आइए”, और फिर वही अनिश्चित जवाब—“देखेंगे”। यह ‘देखेंगे’ शब्द ही आज की सरकारी व्यवस्था का प्रतीक बन गया है। न समय की गारंटी, न काम की, न जवाबदेही की।
लोग सुबह से शाम तक बैठे रहते हैं, कई बार मजदूरी छोड़कर, कई बार दूर-दराज़ से आकर। लेकिन अंत में उन्हें मिलता है—निराशा, थकान और अगली तारीख।
राशन कार्ड डीलर जागरूक, व्यवस्था लाचार
दिलचस्प और विडंबनापूर्ण स्थिति यह है कि राशन कार्ड डीलर खुद लोगों को अपडेट के लिए जागरूक कर रहे हैं। राशन कार्ड में किसी का फिंगरप्रिंट किसी और से मैच हो रहा है, कहीं नाम गलत है, कहीं पता, कहीं सदस्य जोड़ने-घटाने की जरूरत। यानी ज़मीनी स्तर पर समस्या पहचानी जा चुकी है।
लेकिन जब वही लोग समाधान के लिए नगर निगम के जन सेवा केंद्र पहुँचते हैं, तो वहाँ सिस्टम फेल नजर आता है। न पर्याप्त मशीनें, न स्टाफ, न समयबद्ध प्रक्रिया। ऐसे में सवाल उठता है—जागरूकता का क्या लाभ, जब समाधान ही न मिले?
जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, पेंशन—सब ‘नाम मात्र’
जन सेवा केंद्र का उद्देश्य था कि नागरिकों को जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, पेंशन संबंधी कार्य, आय-जाति प्रमाण पत्र जैसी सेवाएं एक ही छत के नीचे मिल सकें। लेकिन नोजल कार्यालय, आवास विकास का यह केंद्र अब ‘सफेद हाथी’ बन चुका है—दिखने में मौजूद, लेकिन उपयोग में लगभग निष्प्रभावी।
यह केंद्र अब केवल यह साबित करने के लिए है कि सरकार ने सुविधा दे दी है। असल में वह सुविधा ज़मीन पर कितनी कारगर है, इसका जवाब रोज़ लगी भीड़ और खाली हाथ लौटते लोगों के चेहरों पर साफ दिखता है।
दस साल से लाइन में खड़ा उत्तराखंड
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की जनता का काम ही लाइन में खड़े रहना है?
पिछले दस वर्षों में आधार बना, फिर अपडेट हुआ, फिर दोबारा अपडेट; राशन कार्ड बना, फिर केवाईसी, फिर लिंकिंग; पेंशन आई, फिर सत्यापन; अब गैस एजेंसियां भी फोन कर-कर के अपडेट के लिए बुला रही हैं।
पूरे राज्य की जनता मानो एक अंतहीन प्रक्रिया में फंसी हुई है—केवाईसी कराओ, अपडेट कराओ, सत्यापन कराओ। विकास के नाम पर नागरिकों को काम में नहीं, कागज़ों में उलझाए रखना क्या किसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है?
क्या यह जनता को ‘बिजी’ रखने की राजनीति है?
यह सवाल अब टालने लायक नहीं रह गया है। क्या सरकारें जानबूझकर ऐसी जटिल और धीमी प्रक्रियाएं बनाती हैं ताकि जनता अपने हक, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मूल मुद्दों पर सवाल ही न उठा सके?
जब आदमी रोज़मर्रा के दस्तावेज़ों में उलझा रहेगा, तो वह व्यवस्था से जवाबदेही कैसे मांगेगा?
यह डिजिटल इंडिया का कैसा मॉडल है, जहाँ तकनीक के नाम पर इंसान को मशीनों के आगे हाथ फैलाकर खड़ा रहना पड़ता है—और मशीन भी तब काम करे, जब नेटवर्क हो, सर्वर चले और ऑपरेटर “मूड” में हो।
समाधान क्या है—या सिर्फ भाषण?
सवाल उठाना आसान है, समाधान देना कठिन। लेकिन कुछ बुनियादी कदम तो उठाए ही जा सकते हैं—
- एक ही जन सेवा केंद्र पर भीड़ डालने के बजाय वार्ड-स्तर पर मोबाइल या अतिरिक्त काउंटर
- स्टाफ और मशीनों की संख्या बढ़ाना
- ऑनलाइन अपॉइंटमेंट की पारदर्शी व्यवस्था
- वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगों के लिए अलग काउंटर
- और सबसे जरूरी—जवाबदेही तय करना
लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए, जो फिलहाल फाइलों और उद्घाटन समारोहों में उलझी नजर आती है।
सुविधा नहीं, सब्र की परीक्षा
नोजल कार्यालय, आवास विकास नगर निगम रुद्रपुर का जन सेवा केंद्र आज जन सेवा का नहीं, बल्कि जन-सब्र का केंद्र बन चुका है। यहाँ सरकार की योजनाएं तो दिखाई देती हैं, लेकिन सरकार की संवेदनशीलता नहीं।
अगर यही हाल रहा, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की पहचान विकास से नहीं, बल्कि लाइन में खड़े रहने वाले राज्य के रूप में होगी। सवाल सिर्फ इतना है—क्या जनता हमेशा चुपचाप खड़ी रहेगी, या कभी इस सफेद हाथी से जवाब भी मांगेगी?
यह लेख किसी एक कार्यालय पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर कटाक्ष है, जो सुविधा देने का दावा करती है, लेकिन सुविधा को आम आदमी की पहुँच से बाहर कर देती है।




