एक तरफ सम्मान, दूसरी तरफ अपमान: बुक्सा समाज, सत्ता और सवालों के बीच उत्तराखंड

Spread the love


गदरपुर, 02 जनवरी 2026
जिला विकास प्राधिकरण ऊधम सिंह नगर द्वारा विकास खण्ड गदरपुर के ग्राम पंचायत रोशनपुर (डलबाबा) में 24.78 लाख रुपये की लागत से निर्मित 9 फीट ऊँची, 11 कुंटल वज़नी अष्टधातु प्रतिमा का लोकार्पण बुक्सा जनजाति समाज के श्रद्धेय महापुरुष राजा जगतदेव जी की 765वीं जयंती पर माननीय मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा वर्चुअल माध्यम से किया गया। मुख्यमंत्री ने राजा जगतदेव जी के त्याग, वीरता, धर्मनिष्ठा और संस्कृति संरक्षण को स्मरण करते हुए जनजातीय समाज के गौरवशाली इतिहास को नमन किया तथा उनके जीवन पर शोध कार्य कराने की आवश्यकता बताई।
मुख्यमंत्री ने क्षेत्रीय विकास से जुड़ी तीन घोषणाएँ भी कीं। कार्यक्रम को विधायक अरविंद पाण्डे, प्रदेश मंत्री गुंजन सुखीजा एवं जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया ने संबोधित किया।
इस अवसर पर ब्लॉक प्रमुख ज्योति ग्रोवर, नगर पंचायत अध्यक्ष सतीश चुघ, दर्जामंत्री मंजीत सिंह राजू, सांसद प्रतिनिधि प्रीत ग्रोवर, बिट्टू चौहान, कन्नू जोशी, सुरेश खुराना, प्रधान लक्ष्मी देवी, दिनेश सिंह, रघुवीर संधू, सोमल सिंह, पार्वती देवी, राखी देवी, रवि सिंह, पूजा देवी, कोमल रानी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मणिकांत मिश्रा, उपाध्यक्ष विकास प्राधिकरण जय किशन, मुख्य विकास अधिकारी दिवेश शाशनी, अपर जिलाधिकारी पंकज उपाध्याय, उपजिलाधिकारी ऋचा सिंह सहित अनेक जनप्रतिनिधि, अधिकारी एवं हजारों की संख्या में स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने आयोजन को भव्य रूप दिया।

देहरादून से LIVE वर्चुअल लोकार्पण और उधर उधम सिंह नगर के एसपी कार्यालय में आक्रोश—यह दृश्य मात्र दो घटनाओं का संयोग नहीं, बल्कि उत्तराखंड की उस विडंबना का प्रतीक है जहाँ मंच पर सम्मान और जमीन पर अपमान एक साथ चल रहे हैं। ग्राम पंचायत रोशनपुर डलबाबा, विकासखंड गदरपुर में बुक्सा जनजाति समाज के श्रद्धेय राजा जगतदेव जी की मूर्ति स्थापना का वर्चुअल लोकार्पण मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा किया जाना निस्संदेह एक ऐतिहासिक और सकारात्मक कदम है। लेकिन उसी समय गदरपुर क्षेत्र में मूर्ति को खंडित किए जाने की घटना और उसके खिलाफ विधायक अरविंद पांडे का एसपी कार्यालय पहुँचना, सरकार और पुलिस व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का वर्चुअल लोकार्पण बुक्सा समाज के लिए केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उस जनजातीय गौरव, इतिहास और अस्मिता को सम्मान देने का प्रतीक था जिसे दशकों तक हाशिए पर रखा गया। राजा जगतदेव जैसे ऐतिहासिक नायकों को स्मरण कराना, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का प्रयास है। मुख्यमंत्री का यह संदेश स्पष्ट था कि राज्य सरकार जनजातीय समाज की पहचान, संस्कृति और सम्मान के साथ खड़ी है।
परंतु, सवाल यह है कि यदि सरकार सचमुच इस सम्मान के प्रति संवेदनशील है, तो फिर उसी मूर्ति को खंडित करने का दुस्साहस कैसे हुआ? और यदि हुआ, तो दोषियों के खिलाफ तत्काल और कठोर कार्रवाई क्यों नहीं दिखी? यही वह बिंदु है जहाँ सरकार के संदेश और प्रशासन की जमीनी हकीकत के बीच की खाई उजागर होती है।
गदरपुर के विधायक और पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे का एसपी कार्यालय पहुँचना केवल एक राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक आक्रोशपूर्ण चेतावनी थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मूर्ति खंडन जैसी घटनाएँ समाज की भावनाओं को आहत करने के साथ-साथ कानून-व्यवस्था की विफलता को भी उजागर करती हैं। उनका कटाक्ष सीधा था—यदि पुलिस और प्रशासन सतर्क होते, तो ऐसी घटना घटती ही नहीं। उनका यह सवाल भी वाजिब है कि क्या जनजातीय समाज के प्रतीकों की सुरक्षा प्रशासन की प्राथमिकता में है या नहीं?
यहाँ एक और गंभीर प्रश्न उठता है—क्या उत्तराखंड में प्रतीकात्मक सम्मान और वास्तविक सुरक्षा के बीच संतुलन बिगड़ चुका है? मंच से भाषण, वर्चुअल लोकार्पण और घोषणाएँ तो होती हैं, लेकिन जब वही सम्मान जमीन पर चुनौती में पड़ता है, तब प्रशासनिक तंत्र क्यों हिचकिचाता है?
बुक्सा समाज का इतिहास संघर्ष, स्वाभिमान और आत्मसम्मान से भरा रहा है। राजा जगतदेव जैसे नायकों की मूर्तियाँ केवल पत्थर या धातु नहीं होतीं, वे सामूहिक स्मृति और पहचान की संरक्षक होती हैं। उन्हें खंडित करना केवल एक मूर्ति को तोड़ना नहीं, बल्कि पूरे समाज के आत्मसम्मान पर प्रहार है। ऐसे मामलों में सरकार की चुप्पी या ढिलाई, अपराधियों के हौसले बढ़ाती है और पीड़ित समाज के मन में असुरक्षा भरती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह घटना एक चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि केवल वर्चुअल लोकार्पण और सम्मान पर्याप्त नहीं हैं, जब तक कि प्रशासनिक स्तर पर कठोरता और संवेदनशीलता न दिखाई दे। और अवसर इसलिए कि यदि सरकार त्वरित कार्रवाई कर दोषियों को कठोर सजा दिलाती है, तो यह संदेश जाएगा कि उत्तराखंड में जनजातीय सम्मान केवल भाषणों तक सीमित नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतना ही मजबूत है।
विधायक अरविंद पांडे का आक्रोश यह भी दर्शाता है कि सत्ता पक्ष के भीतर भी असंतोष है। यह असंतोष यदि केवल बयानबाजी तक सीमित रह गया, तो इसका कोई अर्थ नहीं। लेकिन यदि यह प्रशासनिक सुधार और जवाबदेही की दिशा में दबाव बनता है, तो यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत होगा।
आज उत्तराखंड के सामने सवाल स्पष्ट हैं—क्या हम अपने नायकों का सम्मान केवल कैमरे के सामने करेंगे, या उनकी स्मृतियों की रक्षा भी करेंगे? क्या जनजातीय समाज को केवल कार्यक्रमों में याद किया जाएगा, या संकट के समय उनके साथ मजबूती से खड़ा हुआ जाएगा?
देहरादून का वर्चुअल लोकार्पण और  रुद्रपुर गदरपुर का एसपी कार्यालय—ये दोनों दृश्य मिलकर एक ही कहानी कहते हैं। यह कहानी सम्मान और अपमान, घोषणा और कार्रवाई, सत्ता और समाज के बीच की खाई की कहानी है। अब निर्णय सरकार और प्रशासन के हाथ में है कि वह इस खाई को पाटे या इसे और गहरा होने दे। उत्तराखंड की जनता, विशेषकर बुक्सा समाज, अब केवल शब्द नहीं, ठोस कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहा है।


Spread the love