नौ नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड अपनी स्थापना की रजत जयंती मना चुका है। इन 25 वर्षों में राज्य ने कई ऐतिहासिक उपलब्धियां अर्जित कीं, जिनका देशभर में संदेश गया। समान नागरिक संहिता लागू कर उत्तराखंड ने एक साहसिक संवैधानिक पहल की, चारधाम ऑलवेदर रोड, ऋषिकेश–कर्णप्रयाग रेल परियोजना, रोपवे, हवाई कनेक्टिविटी, राष्ट्रीय खेलों की सफल मेजबानी, बजट आकार में 22 गुना वृद्धि और बारामासी पर्यटन जैसे कदमों ने यह संकेत दिया कि राज्य आगे बढ़ रहा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
लेकिन उपलब्धियों के इस चमकदार आवरण के नीचे कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जो अब भी अनुत्तरित हैं। राज्य निर्माण जिन मूल सरोकारों—जल, जंगल और जमीन—को लेकर हुआ था, वे आज भी सबसे बड़े संकट में हैं। यही कारण है कि 25 साल का उत्सव मनाते समय यह सवाल जरूरी हो जाता है कि क्या उत्तराखंड सचमुच उसी दिशा में बढ़ रहा है, जिसका सपना राज्य आंदोलन के दौरान देखा गया था?
विकास बनाम सरोकार
उत्तराखंड के विकास मॉडल की सबसे बड़ी चुनौती उसका विषम भूगोल और सीमित संसाधन हैं। सरकार यह दावा करती है कि बुनियादी सुविधाओं को दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचाया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह भी है कि आज भी सैकड़ों गांव सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। प्रवासन रोकने के दावे किए जा रहे हैं, पर पहाड़ों के कई गांव आज भी “भूतिया गांव” बनने की कगार पर खड़े हैं।
सरकार के अनुसार, प्रवासन की गति कुछ थमी है और शहरों-कस्बों में ही कदम रुक रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि गांव से शहर की ओर पलायन, गांव को खाली ही कर रहा है। क्या यह प्रवासन रोकथाम की सफलता है या केवल उसका स्वरूप बदल गया है—यह प्रश्न अब भी बना हुआ है।
जल, जंगल और जमीन : मूल प्रश्न
राज्य निर्माण के मूल में रहे “जल, जंगल और जमीन” आज भी सबसे अधिक विवादों में हैं। सशक्त भू-कानून की बात तो की गई, लेकिन इसके समानांतर बड़े बिल्डरों, रियल एस्टेट समूहों और भूमाफियाओं की गतिविधियां भी सामने आई हैं।
रुद्रपुर में 500 करोड़ रुपये के मॉल का मामला इसका उदाहरण है, जहां भूमि उपयोग, कब्जे और प्रशासनिक अनुमति को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि भूमाफियाओं के हौसले बुलंद हैं और प्रशासनिक संरक्षण में जमीनों की रजिस्ट्री कराई गई। स्टांप ड्यूटी से जुड़े घोटालों, फर्जी रजिस्ट्रियों और हिस्ट्रीशीटर व नशा तस्करों के नाम पर संपत्तियों के पंजीकरण ने सरकारी तंत्र की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह भी एक कड़वा सच है कि छोटे मामलों में तो कार्रवाई दिखाई देती है, लेकिन बड़े और प्रभावशाली बिल्डरों व संगठनों की जांच आज भी अधर में लटकी हुई है। उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से जुड़े बड़े रियल एस्टेट नेटवर्क पर अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई—यह प्रश्न आमजन के बीच चर्चा का विषय है।
धार्मिकता और बुलडोजर की राजनीति
राज्य में सख्त मतांतरण कानून, ऑपरेशन कालनेमि और धर्म के नाम पर कार्रवाई को सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि बुलडोजर की राजनीति अक्सर गरीब और कमजोर तबके तक ही सीमित नजर आती है।
रुद्रप्रयाग के अगस्त्यमुनि क्षेत्र में हुई घटनाओं ने यह सवाल उठाया कि क्या प्रशासन की कार्रवाई समान रूप से सभी पर होती है? धार्मिक और आध्यात्मिक छवि वाले उत्तराखंड में यदि कानून का डंडा चुनिंदा वर्गों पर ही चले, तो यह सुशासन की अवधारणा पर सीधा प्रहार है।
जल साहूकार और नीतिगत विफलता
उत्तराखंड जल संपदा से भरपूर राज्य है, लेकिन आज भी जल साहूकारों का मुद्दा गंभीर बना हुआ है। कई क्षेत्रों में पेयजल संकट, सिंचाई की समस्या और निजी हाथों में जल स्रोतों का नियंत्रण आम लोगों के लिए परेशानी का कारण है। बड़े जल विद्युत प्रोजेक्ट्स से ऊर्जा उत्पादन तो बढ़ा, लेकिन विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति और स्थानीय लोगों के अधिकारों के सवाल आज भी अधूरे हैं।
यह विडंबना ही है कि जिस राज्य ने नदियों को “मां” का दर्जा दिया, उसी राज्य में नदियों के किनारे अवैध खनन और प्रदूषण की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं।
प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
उत्तराखंड में सुशासन की बात तो की जाती है, लेकिन प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठते रहे हैं। रुद्रपुर समेत कई शहरी क्षेत्रों में भूमाफिया नेटवर्क, अवैध कॉलोनियों और नशा तस्करी के मामलों में कार्रवाई की गति और मंशा दोनों पर सवाल खड़े हुए हैं।
कुछ छोटे सरकारी बैंक और संस्थानों से जुड़े घोटालों में तो त्वरित बर्खास्तगी दिखाई गई, लेकिन बड़े मामलों में जांच की फाइलें वर्षों तक दबे रहने के आरोप लगते रहे हैं। यह दोहरा मापदंड जनता के विश्वास को कमजोर करता है।
उपलब्धियां भी कम नहीं
इन तमाम सवालों के बीच यह भी सच है कि उत्तराखंड ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। चारधाम ऑलवेदर रोड और ऋषिकेश–कर्णप्रयाग रेल परियोजना से पहाड़ों की कनेक्टिविटी में ऐतिहासिक सुधार होगा। हवाई सेवाओं का विस्तार, रोपवे परियोजनाएं और बारामासी पर्यटन राज्य की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकते हैं।
कृषि और औद्यानिकी में मिलेट्स नीति, कीवी और ड्रैगन फ्रूट मिशन, सेब की अति सघन बगवानी जैसे प्रयोग पहाड़ी किसानों के लिए नई उम्मीद बन सकते हैं। ऊर्जा के क्षेत्र में नवीकरणीय स्रोतों पर फोकस भविष्य की जरूरत है।
आगे की राह
25 साल का उत्तराखंड अब एक नए युग की दहलीज पर खड़ा है। उपलब्धियों की नींव मजबूत है, लेकिन उस पर खड़ा भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब मूल सरोकारों को प्राथमिकता दी जाए।
जरूरत इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बने, भूमाफियाओं और बड़े आर्थिक अपराधों पर बिना भेदभाव कार्रवाई हो, जल-जंगल-जमीन के अधिकार स्थानीय लोगों के हाथ में रहें और बुलडोजर की ताकत केवल कमजोर वर्ग पर नहीं, बल्कि हर गैरकानूनी गतिविधि पर समान रूप से चले।
रजत जयंती के बाद उत्तराखंड को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन की भी आवश्यकता है। क्योंकि सशक्त उत्तराखंड का सपना तभी पूरा होगा, जब विकास के साथ न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत होगी।

