

प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन जो हुआ, वह केवल एक “व्यवस्थागत चूक” नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और सत्ता के बीच टकराव की गंभीर तस्वीर है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस पूरे घटनाक्रम को एक नए और तीखे विमर्श में ला खड़ा किया है। सवाल सिर्फ बैरिकेड, पालकी या स्नान-प्रोटोकॉल का नहीं है, सवाल यह है कि क्या आज के प्रशासनिक ढांचे में सनातन परंपराओं के लिए कोई सम्मान शेष बचा है?
शंकराचार्य का पहला और मूल तर्क स्पष्ट है—गंगा स्नान किसी अनुमति का विषय नहीं, वह आस्था और परंपरा का अधिकार है। सदियों से शंकराचार्य पालकी में संगम स्नान के लिए जाते रहे हैं। बद्रीनाथ से लेकर कुंभ-माघ मेलों तक यह परंपरा इतिहास में दर्ज है। ऐसे में सूचना को “परमिशन” मानकर प्रशासन का व्यवहार न केवल अहंकारी लगता है, बल्कि धार्मिक अज्ञानता का भी परिचायक बनता है।
घटना के दौरान कथित मारपीट, बटुकों और दंडी संन्यासियों के साथ दुर्व्यवहार, बुजुर्ग साधुओं पर जूते चलने के आरोप—ये सब प्रशासन की संवेदनहीनता पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। यदि शंकराचार्य के अनुसार सीसीटीवी फुटेज मौजूद है, तो उसे सार्वजनिक करने में हिचक क्यों? पारदर्शिता से ही सच सामने आता है, बयानबाज़ी से नहीं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
यह भी विचारणीय है कि जब अन्य संत-समूह “करतब” करते हुए संगम तक जा सकते हैं, तो परंपरागत पालकी यात्रा से ही अव्यवस्था क्यों दिखाई देने लगती है? क्या संतों को भी अब सत्ता के प्रति चापलूसी के आधार पर वर्गीकृत किया जाएगा—एक “स्वीकृत संत” और दूसरा “असुविधाजनक संत”?
शंकराचार्य के आरोप केवल मेला प्रशासन तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने सीधे-सीधे सरकार, मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की नीयत पर सवाल उठाए हैं। मंडलायुक्त, पुलिस कमिश्नर, गृह सचिव और डीएम तक को कटघरे में खड़ा करना इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल एक दिन की घटना नहीं रहा, बल्कि संस्थागत टकराव में बदल चुका है।
उनका यह कथन कि “हम किसी अनशन या धरने पर नहीं बैठे हैं” वस्तुतः एक गहरे प्रतीकात्मक विरोध को दर्शाता है—पालकी पर बैठकर, गंगा स्नान से वंचित रहकर, माघी पूर्णिमा तक प्रतीक्षा करना प्रशासन के लिए नैतिक चुनौती है। यह कहना कि “हम शंकराचार्य हैं या नहीं, यह प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तय नहीं करेगा” सनातन परंपरा की स्वायत्तता का स्पष्ट उद्घोष है।
शंकराचार्य के बयान भले ही कई जगह तीखे, विवादास्पद और सत्ता-विरोधी हों, लेकिन उन्हें केवल “उग्र वक्तव्य” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। उनके शब्द उस असंतोष की अभिव्यक्ति हैं, जो आज अनेक साधु-संतों और श्रद्धालुओं के मन में प्रशासनिक दखल और धार्मिक आयोजनों के व्यवसायीकरण को लेकर पनप रहा है।
माघ मेला केवल एक प्रशासनिक आयोजन नहीं, वह भारत की जीवंत आस्था का संगम है। यदि वहां शंकराचार्य जैसे धर्मगुरु स्वयं को असुरक्षित, अपमानित और उपेक्षित महसूस करते हैं, तो यह स्थिति केवल उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे सनातन समाज के लिए चिंताजनक है।
अब आवश्यकता है टकराव की नहीं, संवाद की। प्रशासन को अहं छोड़कर भूल-सुधार करनी होगी और धार्मिक परंपराओं को “भीड़ प्रबंधन” की फाइलों से ऊपर उठकर समझना होगा। अन्यथा यह टकराव केवल प्रयागराज तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में आस्था बनाम सत्ता की बहस को और गहरा कर देगा।




