

उत्तराखंड का बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में है। कांग्रेस ने इस मामले को लेकर पुष्कर सिंह धामी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनका सार यही है कि सरकार न्याय की दिशा में आगे बढ़ने के बजाय जांच की दिशा भटकाने का काम कर रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल का यह कहना कि आरोपी स्वयं नार्को टेस्ट के लिए तैयार है, लेकिन सरकार इसका विरोध कर रही है—अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
अंकिता के माता-पिता की मांग न तो असंवैधानिक है और न ही असामान्य। वे चाहते हैं कि हत्यारों को कठोरतम सजा मिले और यदि इस जघन्य अपराध में कोई वीआईपी या प्रभावशाली व्यक्ति शामिल है, तो उसे भी कानून के कटघरे में लाया जाए। ऐसे मामलों में जब पीड़ित परिवार किसी स्वतंत्र एजेंसी—जैसे सीबीआई—से जांच की मांग करता है, तो सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह संदेह की हर गुंजाइश को खत्म करे।
कांग्रेस का आरोप है कि मुख्यमंत्री द्वारा सीबीआई जांच की घोषणा के बावजूद प्रक्रिया को इस तरह मोड़ा गया कि जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग गया। यदि यह सच है कि अंकिता के पिता के प्रार्थनापत्र के बजाय किसी अन्य आधार पर एफआईआर दर्ज कराई गई, तो यह प्रशासनिक संवेदनहीनता ही नहीं, बल्कि पारदर्शिता पर भी आघात है।
नार्को टेस्ट का मुद्दा भी गंभीर है। जब आरोपी स्वयं इसके लिए तैयार हो और सरकार विरोध करे, तो स्वाभाविक है कि जनता के मन में संदेह जन्म ले। सरकार को यह समझना चाहिए कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।
अंकिता भंडारी मामला अब केवल एक आपराधिक केस नहीं रहा; यह उत्तराखंड की शासन-व्यवस्था, राजनीतिक इच्छाशक्ति और पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता की कसौटी बन चुका है। सरकार को चाहिए कि वह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच सुनिश्चित करे—तभी अंकिता को सच्ची श्रद्धांजलि और उसके परिवार को न्याय मिल सकेगा।




