

रुद्रपुर में आयोजित सरस मेला एक बार फिर चर्चा में है—लेकिन इस बार वजह रंगीन रोशनी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ या स्वयं सहायता समूहों की उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि व्यवस्थाओं की विफलता, राजनीतिक छाया और एक दर्दनाक आपराधिक घटना है। सवाल सीधा है—क्या यह मेला सचमुच आजीविका और संस्कृति का उत्सव था, या 2027 की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करने का मंच?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
रुद्रपुर में आयोजित मेले के दौरान एक ओर पुलिस प्रशासन बीजेपी नेताओं और अधिकारियों की अगवानी व “जी-हजूरी” में व्यस्त दिखा, तो दूसरी ओर एक महिला के साथ दुष्कर्म की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। भीड़भाड़ वाले आयोजन में पर्याप्त निगरानी, महिला सुरक्षा डेस्क और गश्त की कमी उजागर हुई है। क्या प्राथमिकता जनप्रतिनिधियों की सेवा थी या आम जनता की सुरक्षा? घटना के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर जनाक्रोश बढ़ रहा है। प्रशासन को जवाब देना होगा कि ऐसी चूक कैसे हुई और दोषियों पर सख्त कार्रवाई कब तक सुनिश्चित होगी।
1. सुरक्षा की छाया में अपराध
मेला परिसर में पुलिस-प्रशासन की भारी मौजूदगी दिखी, पर आरोप है कि वही तंत्र वीआईपी ड्यूटी और मंच प्रबंधन में अधिक व्यस्त रहा। इसी दौरान, मेला देखकर लौट रही एक महिला के साथ रास्ते में दुष्कर्म जैसी जघन्य घटना सामने आई। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का भी सवाल है—क्या प्रशासन की ऊर्जा जनसुरक्षा पर थी या आयोजन की चमक पर?
2. संस्कृति के नाम पर राजनीतिक भाषण
मंच से सरकारी योजनाओं की फाइलें पूरी करने जैसे संवाद, तालियों से अधिक खाली कुर्सियाँ, और नेताओं के भाषणों में आगामी चुनावी संकेत—इन सबने आयोजन को “मिशन 2027” की प्रस्तावना जैसा बना दिया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्रशंसा के पुल बाँधे गए, पर स्थानीय मुद्दों पर ठोस जवाब कम दिखे।
3. ‘लखपति दीदी’—अर्थ और वास्तविकता
मंच से “लखपति दीदी” का उल्लेख बार-बार हुआ। यह केंद्र की ग्रामीण आजीविका से जुड़ी पहल है, जिसमें स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की महिलाओं को सालाना एक लाख रुपये या उससे अधिक आय तक पहुँचाने का लक्ष्य है। उद्देश्य सराहनीय है—पर प्रश्न यह है कि क्या मेले में स्टॉल देकर और फोटो-अवसर बनाकर ही यह लक्ष्य हासिल होगा? या महिलाओं को प्रत्यक्ष नगद सहायता, बाज़ार से जोड़ने की स्थायी व्यवस्था और पारदर्शी खरीद नीति अधिक कारगर होती?
4. स्टॉल आवंटन—स्थानीय बनाम बाहरी
मेला “स्थानीय आजीविका” के नाम पर था, मगर स्टॉल दिल्ली, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर से आए प्रतिभागियों को भी दिए गए। बाहरी भागीदारी बुरी नहीं—पर यदि रुद्रपुर और आसपास के कारीगरों को सीमित अवसर मिलें, और वही नाम हर बार दोहराए जाएँ, तो पारदर्शिता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। क्या स्टॉल आवंटन के लिए खुली, सार्वजनिक और ऑनलाइन प्रक्रिया थी? या “पास-संस्कृति” यहाँ भी लागू रही?
5. पास-संस्कृति और वीआईपी गैलरी
वीआईपी गैलरी में शीर्ष अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि और पार्टी कार्यकर्ता परिवार सहित दिखे। दूसरी पंक्ति तक पास-व्यवस्था—और पास की जानकारी चुनिंदा लोगों तक। शहर के प्रतिष्ठित नागरिक—स्वास्थ्य विभाग के पूर्व अधिकारी, सेवानिवृत्त प्रशासक—पीछे खड़े होकर कार्यक्रम देखते रहे। मीडिया को प्रवेश था, पर उनके परिवारों के लिए नहीं। यह सार्वजनिक आयोजन था या सीमित आमंत्रण का समारोह?
6. स्थानीय कलाकारों की अनदेखी
उत्तराखंड की संस्कृति के नाम पर भोजपुरी गीतों पर प्रस्तुति—यह सांस्कृतिक विविधता का सम्मान हो सकता है, पर यदि स्थानीय कलाकारों को मंच न मिले तो असंतुलन स्पष्ट है। उत्तरायणी जैसे मेलों में धूम मचाने वाले कलाकारों को नज़रअंदाज़ कर बाहर से कलाकार बुलाना—क्या यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास की कमी नहीं? और इन कलाकारों को कितना पारिश्रमिक दिया गया—यह जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं?
7. “पहाड़ी उत्पाद” की विडंबना
किसी स्टॉल पर दो कद्दू, कहीं तीन किलो राजमा, कहीं सीमित पैकेट—क्या यह टिकाऊ बाज़ार मॉडल है या फाइल-पूर्णता? यदि उद्देश्य वास्तविक बाज़ार सृजन है, तो सप्लाई-चेन, ब्रांडिंग और ई-कॉमर्स से जोड़ना ज़रूरी है। वरना यह आयोजन प्रतीकात्मक रह जाता है।
8. जड़ी-बूटी केंद्रों की भीड़
“खोई हुई जवानी” जैसे दावों वाले स्टॉलों पर भीड़ दिखी। सार्वजनिक आयोजनों में ऐसे दावों की वैधता और निगरानी किसकी जिम्मेदारी है? स्वास्थ्य और उपभोक्ता संरक्षण के मानकों पर क्या जाँच हुई?
9. लागत बनाम लाभ—‘1 लाख बनाम 14 लाख’ का सवाल
सरकारी ठेकों में अक्सर यह तंज सुनाई देता है—“एक लाख का काम, चौदह लाख का बिल।” यदि मेले पर खर्च हुए धन का स्वतंत्र ऑडिट हो, तो पारदर्शिता बढ़ेगी। मंच, लाइट-साउंड, कलाकार शुल्क, सुरक्षा, प्रचार—हर मद का विवरण सार्वजनिक होना चाहिए। करदाताओं के पैसे से आयोजित कार्यक्रम में यह न्यूनतम अपेक्षा है।
10. वैकल्पिक सोच—नकद सहायता बनाम आयोजन
यदि वही धन सीधे स्थानीय महिलाओं/SHGs को कार्यशील पूंजी, बाज़ार संपर्क और प्रशिक्षण में दिया जाए, तो दीर्घकालिक असर अधिक हो सकता है। सामाजिक संस्थाएँ कम संसाधनों में प्रभावी कार्यक्रम करती हैं—तो सरकारी आयोजन क्यों नहीं लागत-प्रभावी हो सकते?
11. प्रशासन की जवाबदेही
जिला प्रशासन, आयोजन समिति और जनप्रतिनिधियों को स्पष्ट करना चाहिए:
स्टॉल आवंटन की प्रक्रिया क्या थी?
कलाकारों के चयन और भुगतान का आधार क्या था?
सुरक्षा प्रबंधन की जिम्मेदारी किसकी थी?
कुल व्यय और ऑडिट रिपोर्ट कब सार्वजनिक होगी?
रुद्रपुर का सरस मेला अवसर था—संस्कृति, आजीविका और समुदाय को जोड़ने का। पर यदि यह राजनीतिक मंचन, पास-संस्कृति और प्रशासनिक प्राथमिकताओं की उलझन में फँस जाए, तो मूल उद्देश्य धुँधला पड़ जाता है। 2027 की तैयारी लोकतांत्रिक अधिकार है—पर जनधन से होने वाले हर आयोजन को पारदर्शिता, स्थानीय भागीदारी और सुरक्षा की कसौटी पर खरा उतरना होगा। वरना रोशनी के पीछे के साये लंबे होते जाएँगे।
सार
रुद्रपुर का सरस मेला आजीविका और संस्कृति के बजाय राजनीतिक छवि-निर्माण का मंच प्रतीत हुआ। स्टॉल आवंटन, कलाकार चयन, पास-व्यवस्था और सुरक्षा प्रबंधन पर प्रश्न उठे। “लखपति दीदी” जैसी पहल का लक्ष्य सराहनीय है, पर प्रभावी क्रियान्वयन और पारदर्शिता आवश्यक है। जनधन से आयोजित कार्यक्रमों में खुला ऑडिट, स्थानीय प्राथमिकता और सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।
रुद्रपुर में आयोजित मेले के दौरान एक ओर पुलिस प्रशासन नेताओं और अधिकारियों की अगवानी व “जी-हजूरी” में व्यस्त दिखा, तो दूसरी ओर एक महिला के साथ दुष्कर्म की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। भीड़भाड़ वाले आयोजन में पर्याप्त निगरानी, महिला सुरक्षा डेस्क और गश्त की कमी उजागर हुई है। क्या प्राथमिकता जनप्रतिनिधियों की सेवा थी या आम जनता की सुरक्षा? घटना के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर जनाक्रोश बढ़ रहा है। प्रशासन को जवाब देना होगा कि ऐसी चूक कैसे हुई और दोषियों पर सख्त कार्रवाई कब तक सुनिश्चित होगी।
उधम सिंह नगर के खसखस भरा गांधी पार्क में आयोजित सरस आजीविका मेला 2026 के नौवें दिवस पर बॉलीवुड–उत्तराखंड संध्या का भव्य आयोजन हुआ। उत्तराखंड के चर्चित गायक पवनदीप राजन ने “जो तुम न हो” से कार्यक्रम की शुरुआत कर दर्शकों को देर रात तक झूमने पर मजबूर कर दिया। उनके साथ इंदर आर्या ने पहाड़ी गीतों से रंग जमाया, जबकि मिस्र का पारंपरिक तनौरा डांस आकर्षण का केंद्र रहा।
कार्यक्रम में विधायक शिव अरोरा, महापौर विकास शर्मा, दर्जा मंत्री फरजाना बेगम, जिलाध्यक्ष कमल जिंदल, प्रदेश उपाध्यक्ष गुंजन सुखीजा, ब्लॉक प्रमुख रीना गौतम, दीपेन्द्र कोश्यारी सहित अनेक जनप्रतिनिधि मौजूद रहे। प्रशासनिक अधिकारियों में जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया, सीडीओ दिवेश शाशनी, एडीएम पंकज उपाध्याय, नगर आयुक्त शिप्रा जोशी, एसडीएम ऋचा सिंह सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।
हालांकि पार्क में आम वाहनों की एंट्री प्रतिबंधित रही, पर अधिकारियों नेताओं की गाड़ियां अंदर खड़ी दिखीं, जिससे यातायात प्रभावित हुआ। ऐसे में यह चर्चा भी रही कि मेला जनउत्सव कम, सत्ता और प्रशासनिक उपस्थिति अधिक नजर आया।




