25 साल बाद फिर खिला ‘सेब सपना’—चुनाव आते ही उत्तराखंड बना एप्पल स्टेट!

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रुद्रपुर/देहरादून।उत्तराखंड को बने 25 साल हो चुके हैं। इन 25 वर्षों में पहाड़ों ने बहुत कुछ देखा—घोषणाएं, योजनाएं, शिलान्यास, उद्घाटन, जांच, और कभी-कभी घोटाले भी। अब जैसे ही चुनावी बयार बहने लगी है, सरकार को अचानक याद आया है कि राज्य को “एप्पल स्टेट” बनाना है—वह भी हिमाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर की तर्ज पर।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


कहते हैं कि राजनीति में याददाश्त मौसमी होती है। और इस बार मौसम सेब का है।
300 करोड़ से 2000 करोड़—सपनों की स्पीड
वर्तमान में राज्य में सेब का सालाना टर्नओवर 300 से 350 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। लक्ष्य रखा गया है कि 2030-31 तक इसे 2000 करोड़ रुपये तक पहुंचाया जाएगा। यानी अगले कुछ वर्षों में सेब की रफ्तार ऐसी होगी कि न्यूटन भी पेड़ के नीचे बैठकर सोच में पड़ जाएं।
राज्य में इस समय 11766.72 हेक्टेयर क्षेत्र में सेब की खेती हो रही है और उत्पादन 44100.05 मीट्रिक टन है। आंकड़े सुनने में शानदार लगते हैं, लेकिन सवाल वही पुराना—इन 25 वर्षों में उत्पादन बढ़ाने की गंभीर कोशिशें पहले क्यों नहीं दिखीं?
अति सघन बागवानी—इटली-नीदरलैंड की खुशबू
सरकार ने अब “अति सघन बागवानी” का मंत्र दिया है। कहा जा रहा है कि इटली और नीदरलैंड की तर्ज पर पौधारोपण होगा, जिससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन तीन से चार गुना बढ़ेगा। यह सुनकर पहाड़ के बागवान भी सोच में हैं—जब पारंपरिक बागों की सिंचाई, सड़क, कोल्ड स्टोरेज और बाजार व्यवस्था ही वर्षों से अधूरी है, तो अचानक यूरोप की तकनीक पहाड़ की पगडंडियों पर कैसे उतर आएगी?
40 नर्सरियां, फिर भी पौध बाहर से
राज्य में उद्यान विभाग के अंतर्गत सेब की 40 नर्सरियां हैं, निजी क्षेत्र की भी कई नर्सरियां हैं। लेकिन सघन बागवानी के लिए उच्च गुणवत्ता की पौध आज भी दूसरे राज्यों या विदेशों से मंगानी पड़ती है। अब “अत्याधुनिक नर्सरी विकास योजना” लाई गई है, जिसमें निजी क्षेत्र को 40 से 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा।
बागवानों को अनुदान की खबर अच्छी लगी है, लेकिन अनुभवी लोग मुस्कुरा रहे हैं। उन्हें याद है कि उद्यान विभाग पहले भी योजनाओं के नाम पर सुर्खियों में रहा है। राज्य गठन के बाद से विभाग पर लगे महाघोटालों के आरोपों ने पहाड़ की उम्मीदों को कई बार झकझोरा है। जांच बैठी, फाइलें चलीं, और फिर सब शांत।
चुनावी सेब का स्वाद
राजनीतिक विश्लेषक इसे “चुनावी सेब” बता रहे हैं। तर्क यह है कि जैसे ही चुनाव करीब आते हैं, सरकार को मूल अवधारणा याद आ जाती है—पलायन रोकना, पर्वतीय अर्थव्यवस्था मजबूत करना, स्थानीय रोजगार सृजित करना। घोषणाएं होती हैं, लक्ष्य तय होते हैं, योजनाएं लॉन्च होती हैं। चुनाव जीतने के बाद वही पुरानी फाइलें, वही धीमी रफ्तार, वही पहाड़ी इंतजार।
25 साल पहले जब उत्तराखंड बना था, तब सपना था—स्थानीय संसाधनों पर आधारित मजबूत अर्थव्यवस्था। सेब, कीवी, बागवानी, जड़ी-बूटी—ये सब पहाड़ की पहचान बनने थे। लेकिन बीच-बीच में योजनाएं आईं और चली गईं। अब फिर से सेब सुर्खियों में है।
क्या सच में बनेगा नया हब?
उद्यान सचिव डॉ. एसएन पांडेय का कहना है कि 2030-31 तक राज्य को सेब उत्पादन का नया हब बनाया जाएगा। लक्ष्य बड़ा है, नीयत पर भी अभी सवाल नहीं उठाया जा सकता। पर पहाड़ का किसान पूछ रहा है—क्या इस बार सड़क, कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट, मार्केटिंग चेन और न्यूनतम समर्थन जैसी व्यवस्थाएं भी साथ आएंगी, या फिर केवल पौध और फोटो से ही काम चल जाएगा?
पलायन बनाम प्रचार
सरकार का दावा है कि इस पहल से पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रुकेगा। यह दावा नया नहीं है, बस योजना का नाम बदलता रहता है। कभी पर्यटन, कभी होमस्टे, कभी जड़ी-बूटी मिशन, अब सेब मिशन। सवाल यह है कि क्या योजनाएं जमीनी निगरानी और पारदर्शिता के साथ लागू होंगी?
अगर सच में अति सघन बागवानी सफल हुई, उच्च गुणवत्ता की स्थानीय पौध उपलब्ध हुई और बागवानों को समय पर भुगतान मिला, तो उत्तराखंड सच में एप्पल स्टेट बन सकता है। लेकिन यदि यह भी पिछले 25 वर्षों की तरह घोषणाओं की फसल बनकर रह गया, तो पहाड़ के खेतों में सेब से ज्यादा निराशा उगेगी।
फिलहाल चुनावी मौसम है। सेब के पौधे लगाए जा रहे हैं। पोस्टर खिल रहे हैं। भाषण पक रहे हैं।
अब देखना यह है कि 2030-31 में पहाड़ की टोकरी में 2000 करोड़ का सेब होगा, या फिर केवल वादों की सूखी टहनी।


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