मध्य-पूर्व का बारूद: सत्ता, कट्टरता और युद्ध की राजनीति

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मध्य-पूर्व की धरती शायद दुनिया की सबसे संवेदनशील राजनीतिक प्रयोगशाला है। यहाँ इतिहास केवल किताबों में नहीं बल्कि हर शहर, हर सीमा और हर संघर्ष में जीवित दिखाई देता है। यही कारण है कि जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो पूरी दुनिया की निगाहें अचानक इसी दिशा में टिक जाती हैं।
आज फिर हालात कुछ ऐसे ही दिखाई दे रहे हैं। एक ओर है इजरायल—एक छोटा लेकिन अत्यंत संगठित और तकनीकी रूप से शक्तिशाली राष्ट्र। दूसरी ओर है ईरान—एक विशाल भूभाग, बड़ी जनसंख्या और क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाला देश, जिसकी राजनीति और रणनीति पूरे मध्य-पूर्व की दिशा तय करने की कोशिश करती रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

ईरान का आधुनिक इतिहास सत्ता, क्रांति और वैचारिक संघर्षों की कहानी है। वर्ष 1925 से 1979 तक ईरान पर मोहम्मद रज़ा पहलवी के नेतृत्व वाला पहलवी वंश शासन करता रहा। इस दौर में देश को तेजी से आधुनिक बनाने के प्रयास किए गए। पश्चिमी देशों की तर्ज पर शिक्षा, उद्योग और सामाजिक सुधारों को बढ़ावा दिया गया। विशेष रूप से “व्हाइट रिवोल्यूशन” के माध्यम से भूमि सुधार, महिलाओं को अधिकार और आधुनिक संस्थाओं की स्थापना की गई।
हालांकि इस तेज़ पश्चिमीकरण और धर्मनिरपेक्ष नीतियों से देश के पारंपरिक और धार्मिक वर्गों में असंतोष बढ़ने लगा। सरकार की खुफिया एजेंसी SAVAK पर विरोधियों के दमन और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगे। आर्थिक असमानता और राजनीतिक दमन के कारण जनता में आक्रोश धीरे-धीरे व्यापक आंदोलन में बदल गया।
इसी असंतोष ने 1979 में ऐतिहासिक इस्लामिक क्रांति का रूप लिया। इस क्रांति का नेतृत्व प्रमुख धार्मिक नेता रूहोल्लाह खुमैनी ने किया। जनआंदोलन के दबाव में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को देश छोड़ना पड़ा और पहलवी शासन का अंत हो गया।
क्रांति के बाद जनमत संग्रह के माध्यम से ईरान को “इस्लामिक गणराज्य” घोषित किया गया और अयातुल्ला खुमैनी देश के पहले सर्वोच्च नेता बने। इस बदलाव के साथ ईरान की राजनीतिक व्यवस्था और सामाजिक ढांचा पूरी तरह धार्मिक कानूनों पर आधारित हो गया, जिसने देश की पहचान और नीतियों को स्थायी रूप से बदल दिया।


इन दोनों के बीच दशकों से चल रहा वैचारिक और रणनीतिक संघर्ष अब फिर से सुर्खियों में है। सवाल यह नहीं है कि दोनों देशों के बीच मतभेद क्यों हैं। सवाल यह है कि क्या यह टकराव आने वाले समय में दुनिया को एक और बड़े युद्ध की ओर धकेल सकता है।
क्रांति जिसने राजनीति बदल दी
मध्य-पूर्व की वर्तमान राजनीति को समझने के लिए 1979 की घटना को याद करना जरूरी है। यही वह वर्ष था जब ईरानी इस्लामी क्रांति ने पूरे क्षेत्र की दिशा बदल दी।
इस क्रांति के बाद ईरान एक राजशाही से इस्लामी गणराज्य में बदल गया। सत्ता के केंद्र में धार्मिक नेतृत्व आया और विदेश नीति में भी वैचारिक कठोरता दिखाई देने लगी।
इस क्रांति के बाद से ही ईरान और पश्चिमी देशों के संबंध तनावपूर्ण हो गए। विशेष रूप से इजरायल के साथ उसका टकराव खुलकर सामने आया।
ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई कई बार इजरायल के अस्तित्व को चुनौती देने वाले बयान दे चुके हैं। यही बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस को जन्म देते रहते हैं।
इजरायल: अस्तित्व का युद्ध
इजरायल की राजनीति का मूल सिद्धांत ही सुरक्षा है। यह एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी स्थापना ही संघर्षों के बीच हुई थी।
इतिहास में यहूदी समुदाय ने अत्याचार, विस्थापन और नरसंहार जैसी त्रासदियाँ झेली हैं। इसलिए इजरायल की राष्ट्रीय चेतना में सुरक्षा का प्रश्न सबसे ऊपर रहता है।
इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बार-बार यह कहते रहे हैं कि उनका देश अपने अस्तित्व को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा।
इजरायल की सैन्य नीति बेहद स्पष्ट है—यदि कोई खतरा दिखाई दे तो उसे बढ़ने से पहले ही समाप्त कर दिया जाए।
इसी नीति के कारण इजरायल की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद दुनिया की सबसे प्रभावशाली सुरक्षा संस्थाओं में गिनी जाती हैं।
मोसाद के कई अभियानों की कहानियाँ अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किंवदंती की तरह सुनाई जाती हैं। यह एजेंसी अपने दुश्मनों तक पहुँचने के लिए दुनिया के किसी भी कोने में कार्रवाई करने की क्षमता रखती है।
ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा
दूसरी ओर ईरान खुद को मध्य-पूर्व की केंद्रीय शक्ति के रूप में देखता है।
उसके पास विशाल ऊर्जा संसाधन हैं, मजबूत सैन्य संरचना है और क्षेत्र में कई राजनीतिक प्रभाव भी हैं।
ईरान का दावा है कि वह क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने और बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करने की नीति पर चलता है।
लेकिन इजरायल और कई पश्चिमी देश यह आरोप लगाते हैं कि ईरान की गतिविधियाँ क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ाती हैं।
यही आरोप और प्रत्यारोप इस पूरे संघर्ष की जड़ बन गए हैं।
इतिहास की चेतावनी: तानाशाहों का अंत
मध्य-पूर्व का इतिहास यह भी बताता है कि जब सत्ता अत्यधिक आक्रामक और दमनकारी हो जाती है तो उसका परिणाम अक्सर विनाशकारी होता है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है सद्दाम हुसैन का शासन।
इराक पर दशकों तक शासन करने वाले सद्दाम हुसैन ने अपने समय में पूरे क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित किया।
उन पर आरोप लगे कि उन्होंने
राजनीतिक विरोधियों का दमन किया
पड़ोसी देशों के साथ युद्ध छेड़े
और कठोर सैन्य नीतियों को अपनाया
आखिरकार 2003 में इराक युद्ध 2003 के बाद उनका शासन समाप्त हो गया।
यह घटना अक्सर इस बात की चेतावनी के रूप में देखी जाती है कि सत्ता का अत्यधिक अहंकार अंततः विनाश का कारण बन सकता है।
युद्ध का वैश्विक असर
मध्य-पूर्व में होने वाला कोई भी युद्ध केवल क्षेत्रीय घटना नहीं होता।
यह क्षेत्र दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है। तेल और गैस के बड़े भंडार यहीं स्थित हैं।
इसलिए जब भी यहाँ तनाव बढ़ता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था तुरंत प्रभावित होती है।
तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं, शेयर बाजार अस्थिर हो जाते हैं और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ जाता है।
यही कारण है कि दुनिया की बड़ी शक्तियाँ—संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन—मध्य-पूर्व की घटनाओं पर लगातार नजर रखती हैं।
भारत की संतुलित कूटनीति
भारत की विदेश नीति इस मामले में संतुलन का उदाहरण मानी जाती है।
भारत के इजरायल के साथ मजबूत रक्षा और तकनीकी संबंध हैं। कृषि, जल प्रबंधन और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग तेजी से बढ़ा है।
इसके साथ ही भारत के कई अरब देशों के साथ भी गहरे आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं।
इसलिए भारत हमेशा यह कहता है कि मध्य-पूर्व में स्थायी शांति केवल संवाद और कूटनीति से ही संभव है।
राजनीति और युद्ध का व्यंग्य
दुनिया की राजनीति का एक कटु सच यह भी है कि युद्ध के नारे अक्सर सत्ता के गलियारों में गूंजते हैं, लेकिन उसका दर्द आम लोगों को झेलना पड़ता है।
राजनीतिक मंचों से राष्ट्रवाद के भाषण दिए जाते हैं, शक्ति प्रदर्शन की बातें की जाती हैं और विरोधियों को चुनौती दी जाती है।
लेकिन जब युद्ध शुरू होता है तो उसका बोझ सैनिकों और नागरिकों पर पड़ता है।
मध्य-पूर्व की राजनीति भी इसी विडंबना से भरी हुई है।
क्या युद्ध टल सकता है?
आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह तनाव वास्तव में युद्ध में बदल जाएगा।
इतिहास बताता है कि मध्य-पूर्व में कई बार छोटे टकराव भी बड़े युद्ध का रूप ले लेते हैं।
लेकिन यह भी सच है कि कई बार आखिरी क्षणों में कूटनीतिक प्रयास संघर्ष को टाल देते हैं।
निष्कर्ष
मध्य-पूर्व का यह संकट केवल दो देशों का विवाद नहीं है। यह वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
इजरायल अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क है और किसी भी खतरे का तुरंत जवाब देने की नीति पर चलता है।
दूसरी ओर ईरान अपनी क्षेत्रीय भूमिका को मजबूत करने की कोशिश में लगा हुआ है।
इन दोनों के बीच यही टकराव इस पूरे संकट की जड़ है।
दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या यह केवल शक्ति प्रदर्शन का दौर है या आने वाले समय में यह संघर्ष वास्तव में एक बड़े युद्ध का रूप ले सकता है?
इतिहास बार-बार चेतावनी देता है कि युद्ध शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसे समाप्त करना बहुत कठिन।
इसलिए आज पूरी दुनिया की निगाहें मध्य-पूर्व पर टिकी हुई हैं—जहाँ बारूद सुलग रहा है और शांति की उम्मीद अभी भी कूटनीति के सहारे टिकी हुई है।

इज़रायल की शक्ति  तकनीक, खुफिया तंत्र, रणनीतिक सोच और वैश्विक सहयोग में भी दिखाई देती है। मध्य-पूर्व के छोटे से देश होने के बावजूद इज़रायल ने खुद को दुनिया की सबसे मजबूत सैन्य शक्तियों में शामिल कर लिया है।
सबसे पहले उसकी सैन्य ताकत की बात करें तो इज़रायल की सेना, जिसे इज़रायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) कहा जाता है, अत्याधुनिक हथियारों, प्रशिक्षित सैनिकों और तेज़ निर्णय क्षमता के लिए जानी जाती है। देश के पास अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणाली आयरन डोम है, जो दुश्मन के रॉकेट और मिसाइलों को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता रखती है।
इज़रायल की दूसरी बड़ी ताकत उसका खुफिया नेटवर्क है। उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद को दुनिया की सबसे प्रभावशाली एजेंसियों में गिना जाता है, जिसने कई अंतरराष्ट्रीय अभियानों को अंजाम देकर देश की सुरक्षा सुनिश्चित की है।
इसके अलावा इज़रायल तकनीक और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भी अग्रणी है। स्टार्टअप संस्कृति, रक्षा तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में उसकी कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर प्रभाव डाल रही हैं।
संक्षेप में कहा जाए तो इज़रायल की असली शक्ति उसकी सैन्य क्षमता, मजबूत खुफिया तंत्र, उन्नत तकनीक और दृढ़ राष्ट्रीय संकल्प का संयोजन है, जिसने उसे लगातार संघर्षों के बीच भी एक प्रभावशाली राष्ट्र बना दिया है।


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