संपादकीय: उत्तराखंड में UCC — समानता की पहल या सामाजिक संतुलन की चुनौती?

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उत्तराखंड ने देश में सबसे पहले यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू कर एक ऐतिहासिक पहल जरूर की है, लेकिन इस कानून के प्रभाव अब धीरे-धीरे समाज की गहराइयों में दिखने लगे हैं। पुष्कर सिंह धामी सरकार इसे “महिला सशक्तिकरण और समानता” का कदम बता रही है, वहीं समाज के अलग-अलग वर्गों में इसके संभावित दुष्परिणामों को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
“एक कानून” बनाम “अनेक परंपराएं”
उत्तराखंड जैसे सांस्कृतिक रूप से विविध राज्य में, जहां पहाड़ी परंपराएं, जनजातीय रीति-रिवाज और धार्मिक मान्यताएं गहराई से जुड़ी हैं, वहां एक समान कानून लागू करना केवल कानूनी निर्णय नहीं बल्कि सामाजिक प्रयोग भी है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एक कानून वास्तव में सभी समुदायों की संवेदनाओं और परंपराओं को समाहित कर पाएगा?
संभावित दुष्परिणाम: जमीनी हकीकत
1. धार्मिक और सांस्कृतिक असंतोष
UCC लागू होने के बाद कुछ समुदायों, विशेषकर मुस्लिम समाज और कुछ जनजातीय समूहों में यह भावना उभर सकती है कि उनकी पारंपरिक व्यवस्था और धार्मिक स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है।
यह असंतोष भविष्य में सामाजिक तनाव का कारण बन सकता है।
2. जनजातीय परंपराओं पर असर
उत्तराखंड के कई क्षेत्रों में आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह, संपत्ति और परिवारिक व्यवस्था संचालित होती है।
UCC के लागू होने से इन स्थानीय परंपराओं का कानूनी महत्व कम हो सकता है, जिससे सांस्कृतिक पहचान को नुकसान पहुंचने का खतरा है।
3. कानूनी जटिलताएं और भ्रम
ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में लोगों को नए कानून की जानकारी न होने के कारण भ्रम की स्थिति बन सकती है।
विवाह पंजीकरण, गोद लेने और संपत्ति के नियमों में अचानक बदलाव आम जनता के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं।
4. महिलाओं पर दोहरा दबाव
हालांकि UCC को महिला सशक्तिकरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन सामाजिक ढांचे में बदलाव के कारण कई मामलों में महिलाओं पर पारिवारिक और सामाजिक दबाव बढ़ सकता है।
विशेषकर तलाक और संपत्ति विवादों में संघर्ष की स्थिति अधिक जटिल हो सकती है।
5. सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनीतिकरण
UCC जैसे संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिक उपयोग भी संभव है।
यह कानून समाज को जोड़ने के बजाय कहीं-कहीं विभाजन की रेखाएं भी गहरी कर सकता है, खासकर चुनावी माहौल में।
सरकार का पक्ष: सुधार की दिशा
धामी सरकार का तर्क है कि UCC से—
महिलाओं को बराबरी का अधिकार मिलेगा
बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर रोक लगेगी
कानून सरल और पारदर्शी बनेगा
सरकार इसे संविधान के “समान नागरिक अधिकार” के सिद्धांत की ओर एक मजबूत कदम मानती है।
जनता की मिली-जुली प्रतिक्रिया
उत्तराखंड में UCC को लेकर प्रतिक्रिया एकरूप नहीं है:
शहरी और शिक्षित वर्ग इसे प्रगतिशील सुधार मान रहा है
ग्रामीण और पारंपरिक समाज में आशंका और संदेह का माहौल है
अल्पसंख्यक समुदायों में इसे लेकर असहजता और विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं
कानून नहीं, विश्वास की परीक्षा
UCC केवल एक कानूनी बदलाव नहीं है, बल्कि यह सरकार और समाज के बीच विश्वास की परीक्षा भी है।
यदि सरकार इस कानून को संवेदनशीलता, संवाद और जागरूकता के साथ लागू करती है, तो यह सामाजिक सुधार का माध्यम बन सकता है।
लेकिन यदि इसे केवल “एकतरफा निर्णय” के रूप में देखा गया, तो इसके दुष्परिणाम सामाजिक तनाव के रूप में सामने आ सकते हैं।
उत्तराखंड में UCC की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कानून कागज से निकलकर समाज में कितनी सहजता से स्वीकार किया जाता है—क्योंकि कानून थोपे जा सकते हैं, लेकिन विश्वास नहीं।


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