

रुद्रपुर/देहरादून | संपादकीय रिपोर्ट | अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड सरकार ने पत्रकार मान्यता (अक्रेडिटेशन) की नवीनीकरण प्रक्रिया को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। राज्य के सूचना विभाग ने Local Intelligence Unit (LIU) के माध्यम से आवेदकों का व्यापक सत्यापन शुरू कर दिया है। इस कार्रवाई का उद्देश्य उन लोगों को चिन्हित करना है, जिन्होंने गलत तरीके से पत्रकार मान्यता प्राप्त की है या इसके लिए आवेदन किया है।
राज्य के सूचना महानिदेशक बंशीधर तिवारी ने पुष्टि की है कि विभाग को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं, जिनमें आरोप लगाया गया था कि गैर-पत्रकार पृष्ठभूमि के लोग भी पत्रकार बनकर सरकारी मान्यता का लाभ उठा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए हर आवेदन की गहन जांच कर रही है, ताकि केवल वास्तविक और सक्रिय पत्रकारों को ही मान्यता मिल सके।
LIU द्वारा की जा रही जांच में आवेदकों की पेशेवर पृष्ठभूमि, उनके प्रकाशन/मीडिया संस्थान से जुड़ाव, कार्य अनुभव और दस्तावेजों की प्रमाणिकता का परीक्षण किया जा रहा है। विभिन्न स्तरों पर सूचनाएं एकत्र कर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि कोई भी फर्जी या अपात्र व्यक्ति इस प्रक्रिया का लाभ न उठा सके।
लेकिन इस कार्रवाई के बीच एक गंभीर सवाल भी खड़ा हो गया है—क्या अब तक दी गई मान्यताओं में भारी अनियमितताएं रही हैं?
सूत्रों के अनुसार, राज्य में ऐसे कई लोग पत्रकार के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुके हैं, जिनका पत्रकारिता से कोई ठोस सरोकार नहीं है। आरोप तो यहां तक हैं कि कुछ मान्यता प्राप्त तथाकथित पत्रकार बुनियादी पढ़ाई तक पूरी नहीं कर पाए हैं, और उन्हें समाचार पत्रों की मूल समझ तक नहीं है। यह स्थिति न केवल पत्रकारिता की गरिमा पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि पूरे मीडिया तंत्र की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती है।
संपादकीय दृष्टिकोण से यह भी सामने आया है कि विज्ञापन वितरण प्रणाली में भी गंभीर गड़बड़ियों के आरोप लग रहे हैं। चर्चा है कि सूचना विभाग के माध्यम से दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों में पारदर्शिता का अभाव है, और कथित रूप से “कमीशन आधारित वितरण” जैसी प्रवृत्तियां भी पनप रही हैं। यदि यह सत्य है, तो यह न केवल भ्रष्टाचार का मामला है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करने वाली प्रवृत्ति भी है।
अवतार सिंह बिष्ट की चेतावनी
वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक अवतार सिंह बिष्ट ने इस पूरे प्रकरण पर कड़ा रुख अपनाते हुए चेतावनी दी है कि जो लोग फर्जी या अपात्र होते हुए भी पत्रकार मान्यता का लाभ ले रहे हैं, वे स्वयं ही अपनी मान्यता समाप्त कर दें। अन्यथा, सूचना विभाग देहरादून के समक्ष ऐसे सभी मामलों को प्रमाण सहित उजागर किया जाएगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिन संस्थानों या व्यक्तियों को पत्रकारिता की मूलभूत समझ तक नहीं है, उन्हें सरकारी लाभ देना न केवल अनुचित है, बल्कि वास्तविक पत्रकारों के अधिकारों का हनन भी है। बिष्ट ने कहा कि जरूरत पड़ी तो सूचना विभाग के समक्ष धरना-प्रदर्शन कर ऐसे सभी “फर्जी तंत्र” को बेनकाब किया जाएगा।
पारदर्शिता की दिशा में जरूरी पहल
सरकार का यह कदम निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन असली परीक्षा इसके निष्पक्ष क्रियान्वयन में है। यदि जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई, तो स्थिति में कोई सुधार नहीं होगा। वहीं, यदि निष्पक्षता और कठोरता के साथ कार्रवाई होती है, तो यह उत्तराखंड की पत्रकारिता को नई दिशा दे सकती है।
पत्रकारिता केवल एक पहचान पत्र या सरकारी मान्यता नहीं है, बल्कि यह जिम्मेदारी, नैतिकता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का विषय है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि इस पेशे में केवल वही लोग बने रहें, जो इसकी गरिमा और मूल्यों को समझते हैं।

चेतावनी:
सूचना विभाग देहरादून और उत्तराखंड सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी जाती है कि पत्रकार मान्यता प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। फर्जी, अपात्र अपराधी और गैर-पत्रकार लोगों को दी गई मान्यता तत्काल निरस्त की जाए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो प्रमाण सहित पूरे मामले को सार्वजनिक किया जाएगा और विभाग के खिलाफ जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा। सरकारी विज्ञापनों में कथित कमीशनखोरी और पक्षपातपूर्ण वितरण की भी निष्पक्ष जांच कराई जाए। अन्यथा वास्तविक पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।
उत्तराखंड में पत्रकार मान्यता प्रणाली की यह सख्ती एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। अब देखना यह होगा कि सरकार और संबंधित विभाग इस प्रक्रिया को कितनी ईमानदारी से लागू करते हैं, और क्या वास्तव में “फर्जी पत्रकारिता” पर लगाम लग पाती है या नहीं।




