

उत्तराखंड की राजनीति में पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार इन दिनों एक बड़े विरोधाभास का प्रतीक बनती जा रही है। एक ओर हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर शुभकामनाओं और विकास के दावों की गूंज है, तो दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर उठते सवाल सरकार की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
प्रदेश में फिलहाल पांच मंत्री पद रिक्त पड़े हैं। कुल 12 की क्षमता वाले मंत्रिमंडल में केवल 7 मंत्री ही कार्यरत हैं। यह स्थिति केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं पर भी सीधा सवाल है। जब सरकार अपने ही मंत्रिमंडल को पूर्ण रूप से गठित नहीं कर पा रही, तब प्रदेश के हजारों खाली सरकारी पदों को भरने के उसके दावे कितने खोखले हैं—यह समझना कठिन नहीं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट द्वारा कई बार कैबिनेट विस्तार के संकेत दिए जा चुके हैं। लेकिन ये संकेत अब तक केवल राजनीतिक बयानबाज़ी ही साबित हुए हैं। सवाल यह है कि आखिर ऐसा कौन सा दबाव या समीकरण है, जो इस विस्तार को लगातार टालता जा रहा है?
चुनाव नजदीक हैं—2027 की विधानसभा की आहट साफ सुनाई देने लगी है। ऐसे में यह विस्तार महज प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है। चर्चा है कि दो दर्जन से अधिक नेताओं को दायित्वधारी बनाकर संतुलन साधने की कोशिश होगी। लेकिन क्या यह ‘राज्यमंत्री के समकक्ष पद’ वास्तव में विकास को गति देंगे, या केवल राजनीतिक संतुष्टि का साधन बनेंगे?
सबसे गंभीर प्रश्न मुख्यमंत्री के पास रखे गए विभागों को लेकर है। जब एक ही व्यक्ति कई महत्वपूर्ण विभाग अपने पास रखता है, तो पारदर्शिता और जवाबदेही स्वतः कमजोर हो जाती है। यह केंद्रीकरण भ्रष्टाचार के लिए उर्वर भूमि तैयार करता है। उत्तराखंड में लगातार सामने आ रहे भर्ती घोटाले, जमीन विवाद, और ठेकेदारी में कथित अनियमितताएं इसी ओर संकेत करते हैं कि शासन का ढांचा संतुलित नहीं है।
धामी सरकार का एक चेहरा वह भी है, जो धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती देने का दावा करता है। लेकिन दूसरी ओर, वही सरकार प्रशासनिक शिथिलता और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई दिखाई देती है। यह दोहरी छवि जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा करती है।
मंत्रिमंडल विस्तार यदि नवरात्रों के शुभ मुहूर्त में होता भी है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह विस्तार योग्यता और पारदर्शिता के आधार पर होगा, या फिर केवल चुनावी गणित को साधने का माध्यम बनेगा। यदि योग्य और स्वच्छ छवि वाले नेताओं को जिम्मेदारी दी जाती है, तो यह सरकार के लिए एक सुधार का अवसर हो सकता है। अन्यथा, यह कदम भी जनता की नजर में केवल एक और राजनीतिक ‘नौटंकी’ बनकर रह जाएगा।
आज जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड सरकार आत्ममंथन करे। खाली पदों को भरना, प्रशासन को मजबूत करना और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई करना—ये केवल चुनावी वादे नहीं, बल्कि जनता के प्रति सरकार की जिम्मेदारी हैं।
अगर सरकार इन बुनियादी सवालों से मुंह मोड़ती रही, तो 2027 का चुनाव केवल सत्ता का नहीं, बल्कि जनता के धैर्य और विश्वास का भी निर्णायक परीक्षण होगा।




