मिशन 2027: वादों की हुंकार या हकीकत से इंकार?“मिशन 2027 या फिर ‘मिशन उम्मीदों का पुनर्चक्रण’?”

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उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर बड़े मंच, बड़े चेहरे और बड़ी घोषणाओं का मौसम लौट आया है। राजनाथ सिंह का हल्द्वानी आगमन, पुष्कर सिंह धामी की अगुवाई में “चार साल बेमिसाल” का जश्न—सब कुछ एक भव्य राजनीतिक उत्सव की तरह सजाया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह उत्सव जनता की उपलब्धियों का है या फिर आगामी चुनावों की पटकथा का एक और अध्याय?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


सैनिकों की धरती, वादों का बोझ
उत्तराखंड को “सैनिक बाहुल्य राज्य” कहकर भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करना हमेशा से राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहा है। हर घर से सेना में कोई न कोई—यह सच है, गर्व का विषय भी है। लेकिन क्या इसी भावना के सहारे हर चुनाव में नए वादों की फेहरिस्त परोस देना पर्याप्त है? क्या पूर्व सैनिकों, शहीद परिवारों और युवाओं की वास्तविक समस्याएं—रोजगार, पेंशन, पुनर्वास—वाकई “चार साल बेमिसाल” में सुलझ पाई हैं?
‘जन-जन की सरकार’ या ‘मंच-मंच की सरकार’?
एमबी इंटर कॉलेज मैदान में भव्य आयोजन, मंच पर नेताओं की लंबी कतार, और नीचे बैठी भीड़—यह दृश्य नया नहीं है। हर पांच साल में यही मंच, यही भीड़, और वही जोशीले भाषण। फर्क सिर्फ इतना होता है कि नारों का नया संस्करण लॉन्च हो जाता है—इस बार “मिशन 2027”।
लेकिन “मिशन 2027” आखिर है क्या?
क्या यह बेरोजगारी खत्म करने का रोडमैप है?
क्या यह पलायन रोकने की ठोस योजना है?
या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक स्लोगन है, जिसे चुनावी मौसम में बार-बार चमकाया जाएगा?
मंत्रिमंडल विस्तार: विकास या संतुलन का खेल?
सीएम धामी का यह कहना कि नई टीम “अंतिम छोर तक विकास पहुंचाएगी”—सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन हकीकत यह है कि हर मंत्रिमंडल विस्तार के पीछे क्षेत्रीय, जातीय और राजनीतिक संतुलन की गणित ज्यादा काम करती है, विकास का विजन कम। सवाल यह भी है कि जिन चार वर्षों में “अंतिम छोर” तक विकास नहीं पहुंच पाया, क्या वह अब अचानक अगले एक साल में पहुंच जाएगा?
हल्द्वानी की धरती पर ‘हुंकार’ या ‘हकीकत’?
हल्द्वानी में रक्षा मंत्री की जनसभा को “मिशन 2027 की हुंकार” बताया जा रहा है। लेकिन उत्तराखंड की जनता अब सिर्फ हुंकार नहीं, हिसाब चाहती है।
कितने युवाओं को रोजगार मिला?
कितने गांवों से पलायन रुका?
स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति कितनी सुधरी?
इन सवालों के जवाब मंच से कम और जमीन पर ज्यादा दिखने चाहिए।
‘चार साल बेमिसाल’—किसके लिए?
सरकार के लिए यह उपलब्धियों का उत्सव हो सकता है, लेकिन आम आदमी के लिए यह सवालों का समय है। यदि चार साल वाकई “बेमिसाल” रहे होते, तो आज भी रोजगार, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दे ज्यों के त्यों क्यों खड़े हैं?
निष्कर्ष: मिशन या माया?
“मिशन 2027” का शोर जितना तेज है, उतनी ही धीमी है जमीनी सच्चाई की आवाज।
राजनीति में मिशन बनाना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर उतारना कठिन।
उत्तराखंड की जनता अब सिर्फ भाषण नहीं, परिणाम चाहती है।
क्योंकि यह देवभूमि है—यहां आस्था भी है और अब सवाल भी।
अब देखना यह है कि “मिशन 2027” वास्तव में विकास का मिशन बनता है, या फिर एक और चुनावी माया साबित होता है।


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