

आज का दौर सिनेमा का नहीं, बल्कि “सिनेमा के भ्रम” का दौर है। पर्दे पर कहानी कम और उसके बाहर बनाई गई हवा ज्यादा बिकती है। हाल ही में चर्चाओं में आई फिल्म “धुरंधर: द रिवेंज” इसी ट्रेंड की एक सटीक मिसाल बनकर सामने आई है—जहां दर्शकों को सिनेमाई अनुभव से ज्यादा मार्केटिंग का मायाजाल परोसा जा रहा है।
फिल्म के एक सीन—जिसे ‘घोस्ट बॉर्न ऑफ शैडोज’ जैसा भारी-भरकम नाम दिया गया—को इस तरह पेश किया गया मानो भारतीय सिनेमा में कोई क्रांतिकारी प्रयोग हो गया हो। मेकिंग वीडियो, इंटरव्यू, सोशल मीडिया पोस्ट और प्रमोशनल कैंपेन के जरिए इस एक सीन को इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया कि फिल्म की असल कहानी कहीं पीछे छूट गई। सवाल यह है कि क्या एक फिल्म का मूल्यांकन उसके कंटेंट से होगा या उसके प्रचार से?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
डर का कारोबार: मनोविज्ञान या मार्केटिंग?
फिल्म दावा करती है कि वह इंसानी दिमाग के डर, मतिभ्रम और मानसिक संघर्ष को दिखा रही है। लेकिन जब आप फिल्म देखते हैं तो समझ आता है कि यह “मनोवैज्ञानिक गहराई” कम और “विजुअल ट्रिक” ज्यादा है। डर पैदा करने के लिए राख जैसे चेहरे, सफेद बाल और काली नसों का सहारा लिया गया है, लेकिन यह सब सतही लगता है।
असल में, जहां कहानी को दर्शकों के दिमाग में उतरना चाहिए था, वहां वह सिर्फ आंखों को चौंकाने तक सीमित रह जाती है।
किरदार या कठपुतली?
फिल्म में दोस्ती से दुश्मनी तक का सफर दिखाने की कोशिश की गई है, लेकिन यह सफर न तो भावनात्मक रूप से मजबूत है और न ही तार्किक रूप से संतुलित। किरदारों की गहराई उतनी ही है जितनी ट्रेलर में दिखाई गई।
एक समय के जिगरी दोस्त अचानक दुश्मन बन जाते हैं, लेकिन दर्शक यह समझ ही नहीं पाता कि उनके बीच ऐसा क्या हुआ जो इस नफरत को जन्म देता है।
यहां किरदार नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार हिलती-डुलती कठपुतलियां नजर आती हैं।
ओवरएक्टिंग और ओवरप्रेजेंटेशन का कॉकटेल
फिल्म में अभिनय की जगह कई बार “ओवरएक्टिंग” हावी हो जाती है। चेहरे के एक्सप्रेशन से लेकर बॉडी लैंग्वेज तक हर चीज इतनी “ड्रामेटिक” बना दी गई है कि वह वास्तविकता से दूर लगने लगती है।
जहां सादगी और संयम से सीन ज्यादा प्रभावशाली बन सकता था, वहां निर्देशक ने उसे “ओवरलोड” कर दिया है—जैसे दर्शकों को भरोसा ही नहीं कि वे बिना चिल्लाए या डराए भी कहानी समझ सकते हैं।
मार्केटिंग का महायज्ञ: करोड़ों की आग में जलता सच
आज फिल्म इंडस्ट्री में एक नया फॉर्मूला चल रहा है—
“अगर कंटेंट कमजोर है, तो मार्केटिंग मजबूत करो।”
“धुरंधर” इसी फॉर्मूले का जिंदा उदाहरण है।
सोशल मीडिया पर ट्रेंड्स
मेकिंग वीडियो की बाढ़
इंटरव्यू में बड़ी-बड़ी बातें
और हर प्लेटफॉर्म पर “ब्लॉकबस्टर” का टैग
यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं कि दर्शक खुद को फिल्म देखने के लिए मजबूर महसूस करता है। लेकिन जब वह सिनेमाघर से बाहर निकलता है, तो उसे एहसास होता है कि उसने फिल्म नहीं, बल्कि “प्रचार का टिकट” खरीदा था।
फैमिली एंटरटेनमेंट या मानसिक थकान?
फिल्म को जिस तरह पेश किया गया, उससे लगता है कि यह एक बड़ी और व्यापक दर्शक वर्ग के लिए बनाई गई है। लेकिन सच्चाई यह है कि:
अत्यधिक हिंसा
नशे और भ्रम के दृश्य
और भारी-भरकम डार्क टोन
इसे पारिवारिक दर्शकों के लिए असहज बना देते हैं।
यह फिल्म मनोरंजन से ज्यादा मानसिक थकान देती है।
तकनीक बनाम कहानी – असली हार किसकी?
फिल्म में तकनीकी स्तर पर मेहनत दिखाई देती है—मेकअप, प्रोस्थेटिक, सिनेमैटोग्राफी—all good on paper.
लेकिन जब कहानी ही कमजोर हो, तो यह सारी तकनीक सिर्फ एक “खूबसूरत खोल” बनकर रह जाती है।
सिनेमा का मूल तत्व—कहानी और भावनात्मक जुड़ाव—यहां गायब है।
हवा का बुलबुला: कब फूटेगा?
आज दर्शक भी समझदार हो रहा है। वह सिर्फ ट्रेलर और रील्स के आधार पर फिल्म का फैसला नहीं करता।
“धुरंधर” जैसी फिल्में शुरुआती दिनों में भीड़ जरूर खींच सकती हैं, लेकिन लंबे समय में उनका सच सामने आ जाता है।
यह वही “हवा का बुलबुला” है जो कुछ दिनों तक चमकता है और फिर अचानक फूट जाता है।
निष्कर्ष: सिनेमा को बचाना है तो सच दिखाना होगा
“धुरंधर: द रिवेंज” सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि आज के फिल्म इंडस्ट्री के उस मॉडल का प्रतीक है जहां:
कंटेंट से ज्यादा प्रचार बिकता है
सच्चाई से ज्यादा भ्रम फैलाया जाता है
और दर्शकों को कहानी नहीं, “हाइप” परोसी जाती है
जरूरत इस बात की है कि फिल्म निर्माता यह समझें कि दर्शक अब सिर्फ चकाचौंध से प्रभावित नहीं होगा। उसे सच्ची कहानी चाहिए, मजबूत किरदार चाहिए और एक ऐसा अनुभव चाहिए जो उसे भीतर तक छू सके।
वरना, “धुरंधर” जैसे प्रोजेक्ट आते रहेंगे, शोर मचाते रहेंगे और फिर उसी शोर में कहीं खो जाएंगे—बिना कोई स्थायी छाप छोड़े।
क्योंकि अंत में…
सिनेमा नहीं, सच जीतता है।




