

उत्तराखंड में स्कूली बसों और वैन के किराए को लेकर राज्य परिवहन प्राधिकरण (एसटीए) का नया आदेश पहली नजर में अभिभावकों को राहत देने वाला दिखता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग सवाल खड़े करती है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
सरकार ने दूरी के आधार पर किराया तय कर न्यूनतम बस किराया 2200 रुपये और वैन का 2100 रुपये निर्धारित किया है। कागजों में यह व्यवस्था पारदर्शिता और एकरूपता लाने का प्रयास है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आदेश वास्तव में लागू हो पाएगा?
देहरादून इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां कई बड़े शिक्षण संस्थान, विशेषकर विश्वविद्यालय और नामी निजी कॉलेज, छात्रों से सालाना 35 से 40 हजार रुपये तक परिवहन शुल्क वसूलते हैं—वह भी तब, जब छात्र बस सेवा का उपयोग करें या न करें। क्या एसटीए का यह आदेश इन संस्थानों पर लागू हो पाएगा? या फिर यह सिर्फ छोटे स्कूलों तक सीमित रह जाएगा?
रुद्रपुर जैसे शहरों में भी हालात अलग नहीं हैं। यहां कई संस्थानों में परिवहन शुल्क मनमाने तरीके से वसूला जाता है। सवाल यह उठता है कि जिन बड़े संस्थानों की पकड़ सत्ता और सिस्टम तक मजबूत है, क्या उनके खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई हो पाएगी?
असल समस्या आदेश जारी करने में नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन में है। शासनादेश निकाल देना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर उतारने के लिए जिस इच्छाशक्ति और सख्ती की जरूरत होती है, वही अक्सर नदारद रहती है।
यदि सरकार वास्तव में अभिभावकों को राहत देना चाहती है, तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि नियम सभी पर समान रूप से लागू हों—चाहे वह छोटा स्कूल हो या बड़ा विश्वविद्यालय। वरना यह आदेश भी अन्य सरकारी घोषणाओं की तरह कागजों में सिमटकर रह जाएगा और अभिभावकों का आर्थिक शोषण जारी रहेगा।




