

रुद्रपुर। चैत्र नवरात्र की अष्टमी केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना और नारी शक्ति के प्रति सम्मान का जीवंत प्रतीक भी है। इसी क्रम में पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल द्वारा अपने निवास पर विधि-विधान से किया गया कन्या पूजन एक धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सामाजिक संदेश का भी वाहक बनकर उभरा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
नौ कन्याओं के चरण पखारना, उन्हें देवी स्वरूप मानकर भोजन कराना और आशीर्वाद लेना—ये परंपराएं केवल आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उस विचारधारा का प्रतिबिंब हैं जिसमें नारी को सृजन, शक्ति और सम्मान का केंद्र माना गया है। भारतीय संस्कृति में ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ का जो भाव निहित है, वह ऐसे आयोजनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
हालांकि, इस तरह के धार्मिक आयोजनों के बीच यह प्रश्न भी उठता है कि क्या समाज में नारी सम्मान केवल प्रतीकात्मक अनुष्ठानों तक ही सीमित रह गया है? कन्या पूजन के दिन जिस नारी को देवी मानकर पूजते हैं, वही नारी अनेक बार सामाजिक असमानताओं, हिंसा और भेदभाव का सामना क्यों करती है? ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि आस्था के इन प्रतीकों को व्यवहारिक जीवन में भी उतारा जाए।
राजकुमार ठुकराल ने प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए समाज में समरसता और खुशहाली की बात कही। यह संदेश निश्चित रूप से सकारात्मक है, लेकिन इसके साथ ही यह जिम्मेदारी भी जुड़ती है कि समाज और नेतृत्व वर्ग मिलकर नारी सशक्तिकरण को केवल पर्व-त्योहारों तक सीमित न रखे, बल्कि उसे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाए।
अंततः, कन्या पूजन जैसे आयोजनों की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि परिवर्तन का माध्यम बनें—जहां हर दिन नारी को वही सम्मान मिले, जो अष्टमी के दिन दिया जाता है। यही सच्चे अर्थों में नवरात्र की साधना और समाज की प्रगति का मार्ग है।




