

दुनिया जब जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और पर्यावरणीय असंतुलन से जूझ रही है, ऐसे समय में “अर्थ ऑवर” जैसा वैश्विक अभियान केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि चेतना का संदेश बनकर सामने आता है। उत्तराखण्ड शासन द्वारा 28 मार्च 2026 को रात्रि 8:30 से 9:30 बजे तक “अर्थ ऑवर” मनाने के निर्देश इसी जागरूकता का हिस्सा हैं। सचिव विनोद कुमार सुमन द्वारा जारी यह आदेश न केवल सरकारी तंत्र को सक्रिय करता है, बल्कि आम जनमानस को भी पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास कराता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
अर्थ ऑवर: प्रतीक से संकल्प तक
“अर्थ ऑवर” की शुरुआत World Wide Fund for Nature (WWF) द्वारा की गई थी, जिसका उद्देश्य एक घंटे के लिए गैर-जरूरी बिजली बंद कर लोगों को ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के प्रति जागरूक करना है। आज यह अभियान 190 से अधिक देशों में मनाया जाता है और करोड़ों लोग इसमें भाग लेते हैं।
उत्तराखण्ड जैसे प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर राज्य के लिए यह पहल और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हिमालय, नदियाँ, जंगल—ये केवल भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। ऐसे में “एक घंटे की अंधेरी रात” वास्तव में एक उज्जवल भविष्य की नींव बन सकती है।
सरकारी आदेश: कर्तव्य या औपचारिकता?
सरकार ने सभी विभागों, जिलाधिकारियों, पुलिस विभाग और मंडलायुक्तों को इस अभियान के व्यापक प्रचार-प्रसार और अनुपालन के निर्देश दिए हैं। यह प्रशासनिक दृष्टि से सराहनीय कदम है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या यह केवल एक दिन की औपचारिकता बनकर रह जाएगा?
हमारे समाज में अक्सर देखा गया है कि इस प्रकार के अभियानों को “इवेंट” की तरह लिया जाता है—एक घंटे लाइट बंद, फोटो खिंचवाना, सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना और फिर अगले ही दिन वही पुरानी लापरवाह आदतें। यदि “अर्थ ऑवर” को केवल प्रतीकात्मक आयोजन तक सीमित रखा गया, तो इसका वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
आत्ममंथन की जरूरत
उत्तराखण्ड में बिजली की खपत लगातार बढ़ रही है। शहरीकरण, पर्यटन और औद्योगिक गतिविधियों ने ऊर्जा की मांग को कई गुना बढ़ा दिया है। दूसरी ओर, जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, अनियमित वर्षा हो रही है और आपदाओं की आवृत्ति बढ़ रही है।
ऐसे में सवाल केवल “एक घंटे की लाइट बंद” करने का नहीं, बल्कि अपनी जीवनशैली में स्थायी बदलाव लाने का है—
क्या हम अनावश्यक बिजली उपयोग को कम कर पा रहे हैं?
क्या सरकारी दफ्तरों में ऊर्जा संरक्षण के नियमों का पालन हो रहा है?
क्या आम नागरिक LED, सोलर ऊर्जा जैसे विकल्पों को अपनाने के लिए तैयार हैं?
उत्तराखण्ड के लिए विशेष महत्व
उत्तराखण्ड को “देवभूमि” कहा जाता है, लेकिन आज यही भूमि पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है—भूस्खलन, जंगलों में आग, जल संकट और पलायन। “अर्थ ऑवर” जैसे अभियान इस दिशा में चेतना जगाने का माध्यम बन सकते हैं, बशर्ते इन्हें गंभीरता से लिया जाए।
यह पहल केवल सरकारी आदेश नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकती है—यदि स्कूल, कॉलेज, सामाजिक संगठन और आम नागरिक इसमें सक्रिय भागीदारी करें।
✍️ एक घंटा नहीं, जीवनभर का संकल्प
“अर्थ ऑवर” का वास्तविक अर्थ अंधेरा करना नहीं, बल्कि सोच में उजाला लाना है। उत्तराखण्ड सरकार का यह कदम सराहनीय है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह अभियान कितनी गहराई तक लोगों के व्यवहार में परिवर्तन ला पाता है।
अगर यह केवल एक घंटे की रस्म बनकर रह गया, तो यह अवसर भी अन्य सरकारी कार्यक्रमों की तरह फाइलों में सिमट जाएगा। लेकिन यदि इसे जन-आंदोलन का रूप दिया गया, तो यह उत्तराखण्ड को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नई पहचान दे सकता है।
अब फैसला जनता और तंत्र दोनों को करना है—क्या हम सिर्फ एक घंटे के लिए जागेंगे, या आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थायी रूप से जिम्मेदार बनेंगे?




