“दिल्ली दरबार या देवभूमि का स्वाभिमान? राजकुमार ठुकराल की जॉइनिंग ने फिर खड़े किए सवाल”

Spread the love


उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना सवाल जीवित हो उठा है—क्या इस राज्य के नेताओं को अपने ही घर में फैसले लेने का अधिकार नहीं है? रुद्रपुर के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल का कांग्रेस में शामिल होना एक सामान्य राजनीतिक घटना हो सकती थी, यदि यह उत्तराखंड  में होती। लेकिन यह जॉइनिंग दिल्ली में हुई, और यहीं से शुरू होती है उस मानसिकता की कहानी, जिसे आज भी “दिल्ली दरबार” की राजनीति कहा जाता है।

उत्तराखंड में सियासी हलचल: राजकुमार ठुकराल समेत 6 नेता कांग्रेस में शामिल
2027 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। रुद्रपुर के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। उनके साथ गौरव गोयल, नारायण पाल, भीमलाल आर्य, लखन सिंह और अनुज गुप्ता भी कांग्रेस में शामिल हुए।
ठुकराल 2012 और 2017 में बीजेपी से विधायक रहे, लेकिन 2022 में बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा था, जिसके बाद उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया। अन्य शामिल नेता भी अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखते हैं।
कांग्रेस का कहना है कि यह कदम संगठन को मजबूत करेगा। राजनीतिक जानकार इसे आगामी चुनाव से पहले कांग्रेस की रणनीतिक बढ़त मान रहे हैं।

नई दिल्ली में कांग्रेस में शामिल हुए उत्तराखंड के दिग्गज नेता, 2027 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज,नई दिल्ली स्थित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मुख्यालय में उत्तराखंड के कई वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज कर दी। कार्यक्रम में कुमारी शैलजा, गणेश गोदियाल, यशपाल आर्य और प्रीतम सिंह सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।
इस दौरान पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, भीमलाल आर्य, नारायण पाल, गौरव गोयल और अनुज गुप्ता समेत कई नेताओं ने पार्टी का दामन थामा।
जिला कांग्रेस कमेटी टिहरी के पूर्व अध्यक्ष राकेश राणा ने इसे “सिर्फ ट्रेलर” बताते हुए 2027 में कांग्रेस की मजबूत वापसी का दावा किया। उन्होंने राज्य की “डबल इंजन” सरकार पर वादाखिलाफी, बेरोजगारी और महंगाई के मुद्दों पर निशाना साधा।
कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक संकेत माना है।


राजकुमार ठुकराल को कांग्रेस में शामिल कराने के दौरान करण मेहरा, गणेश गोदियाल, यशपाल आर्य और तिलक राज बहेड़ जैसे दिग्गज नेता मौजूद थे। यह सभी चेहरे उत्तराखंड की राजनीति के जाने-पहचाने नाम हैं। सवाल यह है कि जब सारे नेता उत्तराखंड के थे, तो फिर जॉइनिंग के लिए दिल्ली जाने की मजबूरी क्या थी?
क्या देहरादून की धरती छोटी पड़ गई थी? क्या रुद्रपुर, नैनीताल या मसूरी में मंच नहीं सज सकता था? या फिर यह मान लिया जाए कि उत्तराखंड के नेता आज भी अपने फैसलों के लिए दिल्ली की मुहर के मोहताज हैं?
यह घटना केवल एक राजनीतिक जॉइनिंग नहीं, बल्कि उस सोच का आईना है जो उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना के बिल्कुल विपरीत है। जब इस राज्य के लिए आंदोलन हुआ था, तब लोगों ने एक ऐसे उत्तराखंड का सपना देखा था, जो आत्मनिर्भर हो, अपने निर्णय खुद ले, और स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता दे। लेकिन आज की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां करती है।
राष्ट्रीय पार्टियों का ढांचा ऐसा है कि उनका संचालन दिल्ली से होता है, इसमें कोई नई बात नहीं। लेकिन जब हर छोटी-बड़ी राजनीतिक गतिविधि के लिए भी दिल्ली की ओर देखा जाए, तो यह स्थानीय स्वाभिमान पर सवाल खड़ा करता है। यह वही मानसिक गुलामी है, जिससे उत्तराखंड को आजादी दिलाने के लिए वर्षों तक संघर्ष हुआ था।
राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। दिल्ली में जॉइनिंग करना एक प्रतीक है—यह संदेश देता है कि असली ताकत और मान्यता अभी भी दिल्ली के पास है। यह संदेश उन कार्यकर्ताओं और जनता के मनोबल को भी प्रभावित करता है, जो उत्तराखंड में रहकर राजनीति को जमीन से जोड़ने का प्रयास करते हैं।
यह भी सच है कि राजकुमार ठुकराल जैसे नेता अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर नए अवसर तलाशते हैं। कांग्रेस में उनकी एंट्री उनके लिए एक नई शुरुआत हो सकती है। हम उनके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं। लेकिन इसके साथ-साथ यह अपेक्षा भी जरूरी है कि वे उत्तराखंड के स्वाभिमान और स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देंगे।
आज जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड के नेता यह तय करें कि वे “दिल्ली के प्रतिनिधि” बनना चाहते हैं या “देवभूमि के सच्चे सिपाही”। अगर हर निर्णय के लिए दिल्ली की ओर देखा जाएगा, तो फिर उत्तराखंड राज्य बनने का औचित्य ही क्या रह जाएगा?
राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि भावनाओं और पहचान का भी प्रश्न है। और जब पहचान की बात आती है, तो उत्तराखंड की जनता अब यह सवाल पूछने लगी है—क्या हमारे नेता हमारे हैं, या फिर किसी और के इशारों पर चलने वाले मोहरे?
अंत में, राजकुमार ठुकराल को कांग्रेस में शामिल होने पर शुभकामनाएं। लेकिन यह जॉइनिंग एक बहस भी छोड़ गई है—क्या उत्तराखंड की राजनीति कभी दिल्ली की छाया से बाहर निकल पाएगी, या फिर यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा?
प्रश्न अभी भी वही है—देवभूमि का निर्णय देवभूमि में होगा, या दिल्ली दरबार में?


Spread the love