सड़क पर बिखरती ज़िंदगियाँ: संविदा कर्मियों की असुरक्षित दुनिया और समाज की जिम्मेदारी

Spread the love


रुद्रपुर की सड़कों पर एक और ज़िंदगी बेआवाज़ खत्म हो गई। नवोदय विद्यालय में कार्यरत संविदा कर्मी संतोष कुमार की मौत महज़ एक हादसा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जिसमें सबसे निचले पायदान पर खड़े लोग सबसे अधिक असुरक्षित हैं। गाबा चौक के पास आज फिर एक और अज्ञात वाहन की टक्कर ने एक परिवार का सहारा छीन लिया—पीछे रह गईं पत्नी रूपा और 16 वर्षीय पुत्र सुजल, जिनके भविष्य पर अब अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
यह घटना कई सवाल खड़े करती है। आखिर क्यों हमारे शहरों की सड़कें इतनी असुरक्षित हैं कि एक पैदल व्यक्ति की जान इतनी सस्ती हो जाती है? और उससे भी बड़ा सवाल—क्या संविदा कर्मियों की ज़िंदगी की कोई कीमत है?
संतोष कुमार, जो मात्र 9 महीने पहले ही नवोदय विद्यालय में संविदा पर कार्यरत हुए थे, न तो स्थायी सुरक्षा के दायरे में थे और न ही किसी मजबूत सामाजिक सुरक्षा जाल में। उनके पिता की बीमारी के चलते वे घर जा रहे थे, किसे पता था कि यह यात्रा उनकी आखिरी साबित होगी। एक अज्ञात वाहन की लापरवाही ने न केवल उनकी जान ली, उनके परिवार को आर्थिक और मानसिक संकट में भी धकेल दिया।
यह पहला मामला नहीं है। देशभर में रोज़ाना सैकड़ों सड़क हादसे होते हैं, जिनमें अधिकतर पीड़ित गरीब, मजदूर और संविदा कर्मचारी होते हैं। इनके पास न तो बीमा होता है, न स्थायी नौकरी का सहारा, और न ही कोई ठोस सरकारी सुरक्षा योजना। ऐसे में मौत के बाद उनका परिवार समाज और सहानुभूति के भरोसे रह जाता है।
नवोदय विद्यालय के स्टाफ द्वारा सहायता राशि जुटाने की पहल सराहनीय है, क्या यह पर्याप्त है? क्या एक संगठित और जिम्मेदार समाज की यही अंतिम भूमिका होनी चाहिए—दुर्घटना के बाद चंदा इकट्ठा करना?
दरअसल, यह समय केवल शोक व्यक्त करने का नहीं, आत्ममंथन का है। सरकार को चाहिए कि संविदा कर्मियों के लिए अनिवार्य बीमा और आपातकालीन सहायता योजनाएं लागू करे। वहीं प्रशासन को सड़क सुरक्षा को लेकर सख्त कदम उठाने होंगे—सीसीटीवी निगरानी, तेज़ रफ्तार पर नियंत्रण और हिट एंड रन मामलों में त्वरित कार्रवाई।
साथ ही समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे कठिन समय में पीड़ित परिवारों के साथ खड़ा हो—सिर्फ आर्थिक रूप से नहीं, भावनात्मक और सामाजिक समर्थन के रूप में भी।
संतोष कुमार की मौत हमें झकझोरती है। यह एक चेतावनी है कि अगर आज हम नहीं जागे, तो कल कोई और संतोष इसी तरह सड़क पर दम तोड़ देगा।
ॐ शांति।

गाबा चौक से त्रिशूल चौक तक लगातार सड़क हादसों का केंद्र बनता जा रहा है। यहां आए दिन होने वाले एक्सीडेंट केवल संयोग नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर इशारा करते हैं। ओवरलोडिंग, अवैध खनन से जुड़े वाहन और तेज रफ्तार ट्रक लंबे समय से पुलिस के निशाने पर रहे हैं, फिर भी हालात में कोई ठोस सुधार नहीं दिखता। स्थानीय लोगों ने कई बार धरना-प्रदर्शन कर प्रशासन को चेताया, मगर नतीजा शून्य रहा।
आज एक और व्यक्ति ने इसी चौक पर अपनी जान गंवा दी। सवाल उठता है कि क्या गावा चौक ,त्रिशूल चौक की संरचना ही दुर्घटनाओं को न्योता दे रही है, या फिर जिला प्रशासन और पुलिस की लापरवाही इन मौतों की वजह बन रही है? यह भी सच है कि हर हादसे के बाद कुछ दिन चर्चा होती है और फिर सब सामान्य हो जाता है। जरूरत है ठोस कार्रवाई की, वरना यह चौक यूं ही लोगों की जान लेता रहेगा।


Spread the love