भारत आज वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भी दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मजबूत पहचान बनाए हुए है।
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, इसलिए कीमत बढ़ने से आयात बिल और व्यापार घाटा बढ़ता है। पेट्रोल, डीजल और गैस महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका असर खाद्य पदार्थों, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है। इससे महंगाई बढ़ती है और आम जनता की बचत प्रभावित होती है। उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ने से आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है। साथ ही सरकार पर सब्सिडी और कर संतुलन बनाए रखने का दबाव भी बढ़ जाता है।
प्रधानमंत्री Narendra Modi के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने आर्थिक मोर्चे पर कई ऐसे निर्णय लिए हैं, जिन्होंने देश को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी स्थिरता प्रदान की है।
वर्तमान समय में जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ रहा है, कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं और विश्व की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मंदी तथा महंगाई से जूझ रही हैं, तब भारत ने संयम, रणनीति और दूरदर्शिता के साथ अपने आर्थिक ढांचे को संभालकर रखा है। यही कारण है कि वैश्विक एजेंसियां आज भी भारत को भविष्य की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में गिनती हैं।
मोदी सरकार की आर्थिक नीति का सबसे मजबूत पक्ष बुनियादी ढांचे पर लगातार बढ़ता निवेश रहा है। देशभर में एक्सप्रेसवे, आधुनिक रेलवे स्टेशन, सेमी हाईस्पीड ट्रेनें, नए हवाई अड्डे और औद्योगिक कॉरिडोर भारत की विकास यात्रा को नई गति दे रहे हैं। सरकार का यह दृष्टिकोण केवल निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार, व्यापार और निवेश को भी नई ऊर्जा प्रदान कर रहा है।
डिजिटल इंडिया अभियान ने देश की आर्थिक व्यवस्था को नई पहचान दी है। यूपीआई आधारित भुगतान प्रणाली ने गांव से लेकर महानगर तक लेनदेन को सरल और पारदर्शी बनाया है। छोटे दुकानदार, रेहड़ी व्यापारी और ग्रामीण क्षेत्र के लोग भी अब डिजिटल अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं। इससे भ्रष्टाचार में कमी आई और वित्तीय पारदर्शिता को मजबूती मिली।
मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान ने भारत को केवल उपभोक्ता बाजार तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाया है। मोबाइल निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उत्पादन, सेमीकंडक्टर और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। विदेशी कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा रही हैं और देश वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है।
कच्चे तेल के संकट के बीच सरकार ने रूस सहित विभिन्न देशों से वैकल्पिक स्रोतों के जरिए तेल आयात कर देश के हितों को प्राथमिकता दी। इससे आयात लागत पर कुछ हद तक नियंत्रण बना रहा। साथ ही इथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक वाहनों और हरित ऊर्जा को बढ़ावा देकर सरकार भविष्य के ऊर्जा संकटों से निपटने की तैयारी भी कर रही है।
देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखने में भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के बीच समन्वय भी महत्वपूर्ण साबित हुआ है। विदेशी मुद्रा भंडार, बैंकिंग सुधार और वित्तीय अनुशासन ने वैश्विक दबावों के बावजूद भारतीय बाजार को स्थिर बनाए रखने में मदद की है।
हालांकि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। महंगाई, बेरोजगारी, तेल कीमतों में वृद्धि और वैश्विक अस्थिरता का असर आम नागरिकों की जेब पर दिखाई देता है। परिवहन से लेकर खाद्य पदार्थों तक महंगाई बढ़ने से मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर दबाव बढ़ा है। ऐसे समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी विकास और राहत के बीच संतुलन बनाए रखने की है।
इसके बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि भारत ने जिस प्रकार वैश्विक संकटों के बीच अपनी आर्थिक स्थिति को संभाला है, वह विश्व स्तर पर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरा है। आज भारत केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था का भरोसेमंद विकास इंजन बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले वर्षों में यदि इसी प्रकार बुनियादी ढांचे, उत्पादन, तकनीक और ऊर्जा आत्मनिर्भरता पर लगातार ध्यान दिया गया, तो भारत वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में और अधिक मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है।
