“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥”

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“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥”
अर्थ:
मैं उस प्रभु श्री हनुमान जी की शरण लेता हूँ—

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


जो मन के समान तीव्र गति वाले हैं, वायु के समान वेगवान हैं,
जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को जीत रखा है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं,
जो पवनपुत्र हैं, वानरों के प्रमुख हैं और श्रीराम के दूत हैं।

हनुमान जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा में रचा-बसा वह उत्सव है जो शक्ति, भक्ति, समर्पण और आत्मविश्वास की अमिट ज्योति जलाता है। जब देश के प्रधानमंत्री Narendra Modi स्वयं इस पावन अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए पवनपुत्र हनुमान के गुणों का स्मरण करते हैं, तो यह केवल एक औपचारिक संदेश नहीं रह जाता, बल्कि यह पूरे राष्ट्र के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार बन जाता है।
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में लिखा कि हनुमान जन्मोत्सव हर किसी के जीवन में नई ऊर्जा और स्फूर्ति लेकर आए। यह कथन अपने आप में उस गूढ़ सत्य को प्रकट करता है कि Hanuman केवल एक देवता नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक प्रेरणा हैं। उनका जीवन हमें बताता है कि शक्ति तभी सार्थक है जब वह सेवा और समर्पण में लगे, और ज्ञान तभी महान है जब उसमें अहंकार न हो।
संस्कृत के सुप्रसिद्ध श्लोक “मनोजवं मारुततुल्यवेगं…” का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने जिस भाव से हनुमान जी को नमन किया, वह भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की गहराई को दर्शाता है। इस श्लोक में हनुमान जी के व्यक्तित्व का संपूर्ण चित्रण है—मन की गति जैसे तीव्र, वायु के समान वेगवान, इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र और वानर सेना के अग्रणी। जब हम इस श्लोक का अर्थ समझते हैं, तो यह केवल स्तुति नहीं रह जाती, बल्कि यह एक आदर्श जीवन का सूत्र बन जाती है।
हनुमान जी का चरित्र हमें यह सिखाता है कि जीवन में सबसे बड़ी शक्ति बाहुबल नहीं, बल्कि आत्मबल है। जब उन्होंने समुद्र लांघा, लंका में प्रवेश किया, और माता सीता का पता लगाया, तब उनके पास केवल शारीरिक शक्ति नहीं थी, बल्कि अटूट विश्वास और भक्ति भी थी। यही कारण है कि वे केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक आदर्श भक्त के रूप में पूजे जाते हैं।
हनुमान जन्मोत्सव चैत्र पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है, जो वसंत ऋतु के अंतिम चरण का प्रतीक है। यह वह समय होता है जब प्रकृति स्वयं नवजीवन का संदेश देती है। ऐसे में हनुमान जी का जन्मोत्सव यह संकेत देता है कि मनुष्य को भी अपने भीतर नई ऊर्जा, नई सोच और नई दिशा का संचार करना चाहिए। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हमारे भीतर विश्वास और समर्पण है, तो हम हर बाधा को पार कर सकते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी चिरंजीवी हैं, अर्थात वे आज भी इस धरती पर विद्यमान हैं। यह विश्वास केवल आस्था नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक संबल भी है। जब व्यक्ति स्वयं को असहाय महसूस करता है, तब हनुमान जी की स्मृति उसे साहस प्रदान करती है। “संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरे हनुमत बलबीरा”—यह पंक्ति केवल भक्ति का भाव नहीं, बल्कि जीवन का अनुभव है।
हनुमान जी का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—उनकी विनम्रता। अपार शक्ति होने के बावजूद उन्होंने कभी अहंकार नहीं किया। जब Rama ने उनकी प्रशंसा की, तब भी उन्होंने स्वयं को केवल एक सेवक माना। यह हमें सिखाता है कि सच्ची महानता विनम्रता में ही होती है। आज के समय में जब मनुष्य छोटी-छोटी उपलब्धियों पर गर्व करने लगता है, तब हनुमान जी का यह गुण हमें संतुलन सिखाता है।
ज्ञान और बुद्धि के क्षेत्र में भी हनुमान जी का स्थान अद्वितीय है। वे केवल बल के प्रतीक नहीं, बल्कि विद्या और विवेक के भी स्रोत हैं। उन्होंने सूर्य को अपना गुरु बनाया और समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि सच्ची शक्ति वही है जो ज्ञान के साथ संतुलित हो। आज के युग में जब शिक्षा को केवल करियर का माध्यम समझा जाता है, तब हनुमान जी हमें बताते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य आत्मविकास और समाज सेवा होना चाहिए।
हनुमान जी के प्रति सिंदूर अर्पित करने की परंपरा भी अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक है। कथा के अनुसार जब उन्होंने माता सीता को सिंदूर लगाते देखा और उसका कारण पूछा, तो उन्हें बताया गया कि यह श्रीराम की लंबी आयु के लिए है। तब हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया ताकि उनके आराध्य सदैव सुरक्षित रहें। यह प्रसंग समर्पण की पराकाष्ठा को दर्शाता है। यह हमें सिखाता है कि प्रेम और भक्ति में स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता।
आज के सामाजिक परिप्रेक्ष्य में हनुमान जी का महत्व और भी बढ़ जाता है। जब समाज भय, असुरक्षा और नैतिक पतन से जूझ रहा है, तब हनुमान जी का स्मरण हमें साहस, सुरक्षा और नैतिकता का मार्ग दिखाता है। वे हमें सिखाते हैं कि सच्चाई और धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी पराजित नहीं होता।
रुद्रपुर में आयोजित होने वाला हनुमान जन्मोत्सव भी इसी आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है। श्री नीलकंठ धाम में होने वाला भव्य आयोजन केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक एकता का उत्सव है। जब दीप प्रज्वलन, भजन संध्या, बालाजी दरबार और भंडारे जैसे कार्यक्रम होते हैं, तो यह केवल पूजा नहीं होती, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम बन जाती है। फूलों की होली और छप्पन भोग जैसे आयोजन इस पर्व को और भी जीवंत बना देते हैं।
भक्त इस दिन उपवास रखते हैं, मंदिरों में जाकर पूजा करते हैं और विशेष रूप से हनुमान चालीसा तथा सुंदरकांड का पाठ करते हैं। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि की प्रक्रिया है। जब व्यक्ति इन पाठों में डूबता है, तो उसका मन शांत होता है और उसे जीवन की दिशा स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
हनुमान जन्मोत्सव हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में कठिनाइयाँ स्थायी नहीं होतीं। जैसे हनुमान जी ने हर संकट का सामना साहस और बुद्धिमत्ता से किया, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करना चाहिए। यह पर्व हमें निराशा से आशा की ओर, भय से साहस की ओर और अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने का संदेश देता है।
अंततः, हनुमान जी केवल एक पूजनीय देवता नहीं, बल्कि एक जीवन दर्शन हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची सफलता शक्ति, ज्ञान, विनम्रता और समर्पण के संतुलन में है। जब हम इन गुणों को अपने जीवन में उतारते हैं, तभी हम वास्तव में हनुमान जी के भक्त कहलाने के योग्य बनते हैं।
इस हनुमान जन्मोत्सव पर, जब पूरे देश में भक्ति और श्रद्धा की लहर है, हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम हनुमान जी के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएंगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही इस पर्व का वास्तविक उद्देश्य भी। जय बजरंगबली।


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