ऊधम सिंह नगर में राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम के तहत प्रशासन ने बड़े-बड़े फैसले लिए हैं। सरकारी दफ्तरों को “तंबाकू मुक्त परिसर” घोषित किया जाएगा, स्कूलों के 100 मीटर दायरे में तंबाकू बिक्री पर रोक लगेगी, गांव-गांव समितियां बनेंगी और बच्चों को प्रार्थना सभा में तंबाकू के नुकसान बताए जाएंगे। कागजों में यह अभियान बेहद शानदार दिखता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड की सरकार और प्रशासन सिर्फ गुटखा, बीड़ी और सिगरेट तक ही सीमित रहना चाहते हैं, जबकि दूसरी तरफ राज्य की धरती पर अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट अपने पैर पसार चुके हैं?
एक तरफ सरकारी दफ्तरों में तंबाकू खाने वालों के चालान की तैयारी है, दूसरी ओर देहरादून के सहसपुर में कथित तौर पर “कैप्टागन” जैसे खतरनाक अंतरराष्ट्रीय ड्रग की फैक्ट्री चलती रही। जिस ड्रग को दुनिया “जिहादी ड्रग” कहती है, उसका नेटवर्क उत्तराखंड तक पहुंच गया और प्रशासनिक तंत्र को भनक तक नहीं लगी।
यह वही राज्य है जहां कुछ समय पहले नकली दवा फैक्ट्री पकड़ी गई थी, और अब उसी परिसर से अंतरराष्ट्रीय स्तर के सिंथेटिक ड्रग नेटवर्क का खुलासा हो रहा है। ऐसे में सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
बच्चों को भाषण, माफियाओं को संरक्षण?
स्कूलों में बच्चों को तंबाकू से दूर रहने की सीख दी जाएगी, लेकिन क्या सरकार यह बताएगी कि युवाओं तक स्मैक, चरस, एमडी और सिंथेटिक ड्रग्स पहुंच कैसे रहे हैं?
उत्तराखंड के कई शहरों में नशा अब “ओपन सीक्रेट” बन चुका है। कॉलेज कैंपस से लेकर पर्यटन स्थलों तक नशे का जाल फैल चुका है। सीमावर्ती इलाकों में तस्करी की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं।
इसके बावजूद कार्रवाई का फोकस अक्सर छोटे दुकानदारों और तंबाकू बेचने वालों तक सीमित दिखाई देता है, जबकि बड़े नेटवर्क और उनके सरगना कानून की पकड़ से दूर नजर आते हैं।
तंबाकू मुक्त दफ्तर या नशा मुक्त राज्य?
सरकार का “तंबाकू मुक्त कार्यालय” अभियान स्वागत योग्य है, लेकिन असली चुनौती “नशा मुक्त उत्तराखंड” बनाने की है।
अगर देहरादून में कथित रूप से अंतरराष्ट्रीय ड्रग लैब संचालित हो सकती है, अगर विदेशी नागरिक राज्य में ड्रग निर्माण नेटवर्क चला सकते हैं, अगर नकली दवा फैक्ट्रियां दोबारा सक्रिय हो सकती हैं — तो यह केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि सुरक्षा और शासन व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
नेपाल सीमा: सबसे कमजोर कड़ी
बैठक में भारत-नेपाल सीमा पर अवैध तंबाकू तस्करी रोकने की बात कही गई। लेकिन क्या केवल तंबाकू ही सीमा से आता-जाता है?
वर्षों से यह आशंका जताई जाती रही है कि सीमावर्ती क्षेत्रों का इस्तेमाल नशे, नकली दवाओं और अवैध कारोबार के लिए किया जा रहा है। अगर सरकार वास्तव में गंभीर है, तो उसे सीमा सुरक्षा, इंटेलिजेंस नेटवर्क और स्थानीय पुलिसिंग को मजबूत करना होगा।
दिखावे से नहीं, कार्रवाई से बदलेगी तस्वीर
उत्तराखंड में आज जरूरत केवल पोस्टर, भाषण और बैठकों की नहीं है। जरूरत है —
ड्रग माफियाओं पर बड़ी कार्रवाई की
संदिग्ध फैक्ट्रियों की नियमित जांच की
राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण की निष्पक्ष जांच की
युवाओं के पुनर्वास और काउंसलिंग की
सीमावर्ती इलाकों में कड़ी निगरानी की
अगर सरकार वास्तव में युवाओं को बचाना चाहती है, तो उसे गुटखे के पाउच से आगे बढ़कर उस “सफेद जहर” के खिलाफ युद्ध छेड़ना होगा, जो धीरे-धीरे उत्तराखंड की नसों में उतारा जा रहा है।
वरना आने वाले समय में सरकारी दफ्तर भले “तंबाकू मुक्त” हो जाएं, लेकिन पूरा समाज नशे की गिरफ्त में चला जाएगा।
सरकारी दफ्तर होंगे ‘तंबाकू मुक्त’, लेकिन ड्रग माफिया पर कब लगेगी लगाम
