काशीपुर बायपास चौड़ीकरण पर रिश्तेदारी की राजनीति? बुलडोजर नीति पर उठते गंभीर सवाल

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रुद्रपुर और काशीपुर की राजनीति इन दिनों विकास बनाम चयनात्मक कार्रवाई के आरोपों के बीच घिरती दिखाई दे रही है। एक तरफ सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधि शहरों को “स्मार्ट सिटी”, अतिक्रमण मुक्त और व्यवस्थित बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत कई असहज सवाल खड़े कर रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


काशीपुर बायपास रोड के चौड़ीकरण का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। वर्षों से यह सड़क शहर की यातायात व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। बढ़ती आबादी, लगातार बढ़ते वाहन और संकरी सड़क के कारण आम जनता रोज जाम की समस्या झेल रही है। कई बार प्रशासन द्वारा नापजोख की प्रक्रिया पूरी की गई, अतिक्रमण चिह्नित किए गए, यहां तक कि न्यायालय की स्पष्ट टिप्पणियों और आदेशों की भी चर्चा होती रही, लेकिन इसके बावजूद सड़क चौड़ीकरण का कार्य आगे नहीं बढ़ सका। आखिर क्यों?
शहर में यह चर्चा लगातार तेज हो रही है कि इस बायपास मार्ग पर कई प्रभावशाली लोगों, भाजपा नेताओं, उनके करीबी रिश्तेदारों और राजनीतिक रूप से जुड़े लोगों की दुकानें स्थित हैं। यही कारण है कि प्रशासनिक कार्रवाई बार-बार ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। यदि यह केवल अफवाह है तो जनप्रतिनिधियों को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लेकिन यदि इसमें सच्चाई का अंश भी है तो यह लोकतंत्र और सुशासन दोनों के लिए चिंताजनक संकेत है।
सबसे बड़ा प्रश्न वर्तमान विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा की भूमिका पर उठ रहा है। जनता पूछ रही है कि जब अन्य क्षेत्रों में बुलडोजर कार्रवाई इतनी तेजी से हो सकती है, तो काशीपुर बायपास के मामले में यह नरमी क्यों दिखाई दे रही है? क्या विकास का पैमाना भी रिश्तेदारी और राजनीतिक समीकरणों से तय होगा?
रुद्रपुर में पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार बुलडोजर कार्रवाई हुई, उसने भी कई सवाल खड़े किए हैं। ट्रांजिट कैंप क्षेत्र में वर्षों से रह रहे लोगों पर कार्रवाई हुई। खेड़ा कॉलोनी में अतिक्रमण हटाने की बात हुई। इंदिरा कॉलोनी और अन्य बस्तियों पर भी प्रशासनिक तलवार लटकती रही। ऐसे कई परिवार हैं जो दशकों से वहां निवास कर रहे हैं, जिनका दावा है कि उन्हें पर्याप्त सुनवाई का अवसर तक नहीं मिला।
आरोप यह है कि जिनके पास राजनीतिक संरक्षण नहीं है, जिनकी सत्ता के गलियारों तक पहुंच नहीं है, उन पर प्रशासन बेहद सख्त हो जाता है। लेकिन जहां सत्ता से जुड़े नाम सामने आते हैं, वहां फाइलें धीमी पड़ जाती हैं, नोटिस ठंडे हो जाते हैं और बुलडोजर के पहिए रुक जाते हैं।
यह स्थिति केवल प्रशासनिक असमानता नहीं बल्कि सामाजिक असंतोष को जन्म देने वाली है। यदि जनता को यह संदेश जाएगा कि कानून गरीबों और कमजोरों के लिए अलग है तथा प्रभावशाली लोगों के लिए अलग, तो व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होगा।
यह लेख किसी समुदाय विशेष के खिलाफ नहीं है। मुद्दा पंजाबी, पहाड़ी, मुस्लिम या किसी अन्य समाज का नहीं है। मुद्दा केवल समान न्याय और निष्पक्ष प्रशासन का है। कानून का डंडा यदि चलना है तो सब पर समान रूप से चले। यदि सड़क चौड़ीकरण जरूरी है तो फिर यह कार्य बिना राजनीतिक दबाव के पूरा होना चाहिए। और यदि जनता को हटाया जा रहा है तो पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि प्रभावशाली लोगों पर क्या कार्रवाई हुई।
2027 को लेकर भी शहर में राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। लोग कह रहे हैं कि अभी जो हो रहा है वह केवल “ट्रेलर” है और आने वाले समय में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हो सकती है। ऐसे में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को और अधिक पारदर्शी होना होगा।

रुद्रपुर और काशीपुर में विकास, अतिक्रमण हटाने और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर जनता के बीच दोहरे मापदंड के आरोप तेज हो रहे हैं। पहली खबर में काशीपुर बायपास रोड चौड़ीकरण का मुद्दा उठाया गया, जहां वर्षों से लंबित परियोजना के पीछे सत्ता से जुड़े लोगों और जनप्रतिनिधियों के रिश्तेदारों की दुकानों को कारण बताया जा रहा है। आरोप है कि कई बार नापजोख और न्यायालयी निर्देशों के बावजूद सड़क चौड़ीकरण इसलिए अटका हुआ है क्योंकि इससे प्रभावशाली लोगों के व्यावसायिक हित प्रभावित होंगे। इस मामले में विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए।
दूसरी खबर में रुद्रपुर में बुलडोजर कार्रवाई की चयनात्मक नीति पर प्रश्न उठाया गया। आरोप है कि हाईकोर्ट के आदेशों की आड़ में ट्रांजिट कैंप, खेड़ा और अन्य क्षेत्रों में दशकों से रह रहे गरीब परिवारों पर तेजी से कार्रवाई की जाती है, जबकि प्रभावशाली लोगों के मामलों में नियम बदल दिए जाते हैं। काशीपुर बायपास में 75 फीट चौड़ीकरण को 60 फीट करने के आरोप भी इसी संदर्भ में उठे। दोनों खबरें यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या कानून गरीबों के लिए अलग और सत्ता से जुड़े लोगों के लिए अलग है।


विधायक शिव अरोड़ा और महापौर विकास शर्मा को जनता के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि काशीपुर बायपास चौड़ीकरण आखिर कब होगा? यदि बाधा है तो क्या है? क्या वास्तव में प्रभावशाली लोगों के प्रतिष्ठान इस विकास कार्य में रोड़ा बने हुए हैं?
जनता विकास चाहती है, लेकिन पक्षपातपूर्ण विकास नहीं। जनता कानून चाहती है, लेकिन चयनात्मक कानून नहीं। और सबसे बड़ी बात—जनता जवाब चाहती है। अब देखना यह है कि सत्ता जवाब देती है या फिर यह सवाल भी बाकी अधूरे वादों की तरह फाइलों में दब जाएगा।


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