

उत्तराखंड विधानसभा का मंगलवार को होने वाला विशेष सत्र “नारी शक्ति वंदन” को समर्पित बताया जा रहा है, लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह वास्तव में महिलाओं के सम्मान और अधिकारों के लिए है, या फिर यह केवल राजनीतिक मंचन बनकर रह गया है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
राज्य की महिलाएं आज भी पहाड़ों में पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, बेरोजगारी, महंगाई, शराब की बढ़ती समस्या और सुरक्षा जैसे गंभीर संकटों से जूझ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी महिलाएं पानी, जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रही हैं। अंकिता भंडारी जैसे मामलों ने महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए, लेकिन सरकार की संवेदनशीलता अक्सर केवल भाषणों तक सीमित नजर आई।
भाजपा सरकार विशेष सत्र बुलाकर कांग्रेस को घेरने की रणनीति बना रही है, जबकि विपक्ष भी राजनीतिक प्रतिरोध की तैयारी में है। दुखद यह है कि इस शोर-शराबे के बीच उत्तराखंड की आम महिला फिर से हाशिये पर खड़ी दिखाई दे रही है।
2015 में राष्ट्रपति आगमन, 2024 में समान नागरिक संहिता और 2025 में राज्य स्थापना के 25 वर्ष— अब 2026 में भी विशेष सत्र। लेकिन क्या इन विशेष सत्रों ने बेरोजगार युवाओं, बदहाल शिक्षा व्यवस्था, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे मूल प्रश्नों का समाधान दिया?
जनता समझ रही है कि सरकार प्रतीकात्मक राजनीति में अधिक रुचि रखती है, जबकि उत्तराखंड को घोषणाओं नहीं, ठोस नीतियों और ईमानदार जवाबदेही की आवश्यकता है। विशेष सत्र तभी सार्थक होगा, जब सत्ता राजनीतिक लाभ नहीं, जनहित को प्राथमिकता दे।




