सनातन धर्म में पूजा-पाठ के समय अनेक नियमों का पालन किया जाता है. इनमें से एक नियम है कलवे का यानी रक्षासूत्र जिसे कलाई पर तो बांधा जाता है. लेकिन क्या आप कलावे से जुड़े एक और नियम के बारे में जानते हैं कि पूजा के समय पंडित जी तांबे के लोटे पर भी कलावा बांधते हैं और यह परंपरा काफी पुरानी है.

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आइए इस बारे में विस्तार से जानें कि आखिर पूजा के समय कलावें को तांबे के लोटे पर बांधने की परंपरा क्यों निभाई जाती है, इसके पीछे का रहस्य क्या है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

मान्यताओं के अनुसार कलावा
कलावे को रक्षासूत्र और मौली के नाम से भी जाना जाता है जो लाल, सफेद, पीले और हरे रंग का हो सकता है. मान्यता है कि कलाई पर इसे बांधना शुभ होता है लेकिन पूजा के समय तांबे के कलश पर कलावा बाधने का भी बड़ा महत्व है. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, तांबा एक शुद्ध धातु है जिसको पूजा में उपयोग किया जा सकता है. सूर्य देव को अर्घ्य देते समय तांबे के लोटे का ही उपयोग किया जाता है.

पहला कारण- शुद्धता
ध्यान दें कि तांबा जितना शुद्ध होता है उसके जल्दी अशुद्ध होने की संभावना भी बहुत अधिक होती है. कलावा तांबे के लोटे पर बांधने का तो एक सबसे बड़ा कारण यही है कि इसकी शुद्धता बनी रहे और पूजा शुद्धता के साथ संपन्न हो.

दूसरा कारण- नवग्रह से संबंध
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवग्रह का वास तांबे के कलश में होता है और इसमें नवग्रह की सकारात्मक ऊर्जा युक्त होती है जिससे सभी ग्रहों के दोष या नकारात्मकता दूर हो जाती है और पूजा का शुभफल प्राप्त होता है.

तीसरा कारण- पूजा को मिलता है बल
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तांबे के कलश में कलावा बांधने से पूजा उपासना को बल मिलता है. कलावा बाधें लोटे के पूजा में होने से भूल-चूक का नकारात्मक प्रभाव खत्म हो जाता है. तांबे के कलश में कलावा बांधने से पूजा के समय कोई दोष उत्पन्न नहीं होता है.


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