पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज (04 मई) एक ऐसा मोड़ आता दिख रहा है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की थी। कभी ‘अजेय’ मानी जाने वाली ममता बनर्जी का जादू इस बार फीका पड़ गया है।

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भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बंगाल के सियासी मैदान में भगवा लहरा दिया है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक बीजेपी 191 सीटों पर बढ़त बनाकर बहुमत के जादुई आंकड़े 148 को काफी पीछे छोड़ चुकी है। वहीं सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) महज 96 सीटों पर सिमटती दिख रही है। अन्य दलों में AJUP और AISF 2-2 सीटों पर, जबकि कांग्रेस और लेफ्ट सिर्फ 1-1 सीट पर बढ़त बनाए हुए हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

आखिर ऐसा क्या हुआ कि ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा देने वाली दीदी अपने ही घर में घिर गईं? यह हार सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि उन रणनीतियों की विफलता है जिन्हें ममता बनर्जी ने अपना ब्रह्मास्त्र समझा था। अब सवाल यह है कि आखिर वो कौन से फैक्टर रहे, जिनकी वजह से ममता बनर्जी की रणनीति कमजोर पड़ती दिख रही है। आइए समझते हैं वो 5 बड़े कारण जिन्होंने दीदी का खेल बिगाड़ दिया।

1. बंगाली बनाम बाहरी: पुराना दांव इस बार पड़ा उल्टा (Bengali Vs Non-Bengali)

ममता बनर्जी ने 2021 के चुनाव में ‘बंगाली अस्मिता’ और ‘बाहरी-भीतरी’ का कार्ड खेलकर बड़ी जीत हासिल की थी। उस समय उन्होंने बीजेपी को ‘हिंदी पट्टी की पार्टी’ और ‘बाहरी’ बताकर बंगालियों को एकजुट कर लिया था। लेकिन 2026 के इस चुनाव में जनता ने इस नैरेटिव को पूरी तरह नकार दिया।

इस बार मतदाता यह समझ गया कि विकास और सुरक्षा के मुद्दे भाषाई राजनीति से ऊपर हैं। बीजेपी ने अपनी रणनीति बदलते हुए स्थानीय चेहरों को आगे किया, जिससे टीएमसी का ‘बाहरी’ वाला आरोप बेअसर हो गया। बंगाल के लोगों ने इस बार अपनी पहचान को खतरे में देखने के बजाय बेहतर प्रशासन और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार को चुना।

2. SIR का ‘सीक्रेट’ और रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग (The SIR Factor)

इस चुनाव में सबसे चौंकाने वाली बात रही 92.47% का रिकॉर्ड मतदान, जो आजादी के बाद से बंगाल के इतिहास में सबसे अधिक है। इस भारी वोटिंग के पीछे ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) की प्रक्रिया को एक बड़ी वजह माना जा रहा है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों से लगभग 90 लाख संदिग्ध या गलत नाम हटा दिए, जिससे लिस्ट छोटी हो गई और वोटिंग प्रतिशत में उछाल आया।

लेकिन इसका दूसरा पहलू ज्यादा डरावना था। सूचियों में हुई इस काट-छांट ने आम जनता के मन में यह डर पैदा कर दिया कि अगर उन्होंने इस बार वोट नहीं दिया, तो भविष्य में उनके नागरिक अधिकार छीने जा सकते हैं या उनका नाम लिस्ट से हमेशा के लिए गायब हो सकता है। इसी डर और अपने अधिकारों को बचाने की जद्दोजहद ने लोगों को पोलिंग बूथ तक खींच लाया। बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर भी दूसरे राज्यों से सिर्फ वोट डालने अपने गांव लौटे। टीएमसी जिस साइलेंट वोटर को अपना मान रही थी, उसी ने ‘SIR’ के डर से सत्ता के खिलाफ बटन दबा दिया।

3. I-PAC की साख और भ्रष्टाचार का साया (The I-PAC Setback and Corruption Allegations)

ममता बनर्जी की चुनावी जीत के पीछे अक्सर ‘आई-पैक’ (I-PAC) जैसी पेशेवर एजेंसियों का दिमाग होता था। लेकिन इस बार एजेंसी खुद विवादों के घेरे में आ गई। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कथित कोयला घोटाले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आई-पैक के सह-संस्थापक विनेश चंदेल को गिरफ्तार कर लिया।

इतना ही नहीं, ईडी ने दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई में एजेंसी से जुड़े अन्य दिग्गजों के ठिकानों पर छापेमारी की। जब कोलकाता में आई-पैक के ऑफिस पर छापा पड़ा, तो खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अधिकारियों के साथ वहां पहुंच गईं, जिससे यह मामला और ज्यादा राजनीतिक हो गया। जनता के बीच यह संदेश गया कि जो टीम चुनाव जिताने की रणनीति बना रही है, वह खुद भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी है। ममता बनर्जी ने इसे केंद्र की साजिश बताने की कोशिश तो की, लेकिन जनता ने इसे भ्रष्टाचार के सबूत के तौर पर देखा।

4. महिला सुरक्षा: ‘दीदी’ के राज में बेटियां असुरक्षित? (Women Safety Female Vote Bank)

महिलाएं हमेशा से ममता बनर्जी का सबसे मजबूत वोट बैंक रही हैं। ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं के दम पर उन्होंने महिलाओं को अपने साथ जोड़ा था। लेकिन इस बार आरजी कर मेडिकल कॉलेज में हुई रेप की जघन्य वारदात और संदेशखाली जैसे मुद्दों ने महिलाओं के भरोसे को तोड़ दिया।

आरजी कर पीड़िता के परिवार को कथित तौर पर पैसे देकर चुप कराने की कोशिश और संदेशखाली में महिलाओं के साथ हुए शोषण पर सरकार की शुरुआती चुप्पी ने आग में घी का काम किया। जिस प्रदेश की मुख्यमंत्री खुद एक महिला हो, वहां महिलाओं के खिलाफ अपराधों का राजनीतिकरण जनता को रास नहीं आया। बीजेपी ने इन मुद्दों को लेकर जो नैरेटिव बनाया, उसे काउंटर करने में ममता बनर्जी पूरी तरह विफल रहीं। बंगाल की मां-बहनों ने इस बार सुरक्षा को ‘मुफ्त योजनाओं’ से ऊपर रखा।

5. तुष्टीकरण और धु्रवीकरण का दोहरा वार (Failure to Counter the Communal Narrative)

ममता बनर्जी के चुनावी भाषणों में अक्सर एक खास समुदाय के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर और दूसरे के प्रति आक्रामक रुख देखा गया। इस चुनाव में उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा कि “अगर हम सत्ता में नहीं आए, तो एक समुदाय को खत्म करने में वक्त नहीं लगेगा”। इस तरह के बयानों ने बहुसंख्यक समाज के मन में असुरक्षा का भाव पैदा किया।

वहीं टीएमसी नेताओं का दोहरा रवैया भी जनता के सामने आ गया-मंच पर कभी ‘काबा-मदीना’ के गीत गाना और विरोध बढ़ने पर ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करना। इस तरह की राजनीति ने टीएमसी को न तो पूरी तरह अल्पसंख्यकों का मसीहा बने रहने दिया और न ही हिंदुओं का भरोसा जीतने दिया। बीजेपी ने इस ‘तुष्टीकरण’ को बड़ा मुद्दा बनाया और ममता बनर्जी इस बार इस चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाईं।

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बंगाल के ये रुझान साफ बताते हैं कि अब राज्य की राजनीति ‘भावनाओं’ से हटकर ‘जवाबदेही’ की ओर बढ़ रही है। ममता बनर्जी ने जिन दांव-पेंचों से सालों तक राज किया, वही हथियार इस बार कुंद पड़ गए। बंगाली अस्मिता, आई-पैक का मैनेजमेंट और महिला वोट बैंक-ये सब भ्रष्टाचार और सुरक्षा के बड़े मुद्दों के आगे ढेर हो गए। अगर ये रुझान नतीजों में बदलते हैं, तो यह भारतीय राजनीति के सबसे बड़े उलटफेरों में से एक होगा


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